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गोहत्या पर उम्रकैद क्यों? गुजरात कोर्ट ने मनुस्मृति-वेदों का दिया हवाला, जानिए क्या कहता है कानून और धर्मग्रंथ

Cow slaughter law: गुजरात की गांधीनगर कोर्ट ने गोहत्या के मामले में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में मनुस्मृति, वेदों और हिंदू धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए गाय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का जिक्र किया। कोर्ट की टिप्पणी थी कि अगर ऐसे अपराधों में कानून के मुताबिक सजा नहीं दी गई तो समय के साथ धरती से गोमाता विलुप्त हो सकती हैं। लेकिन सवाल है कि गोहत्या पर उम्रकैद की सजा किस कानून के तहत दी गई? क्या पूरे देश में गोहत्या पर एक जैसा कानून है? मनुस्मृति और वेदों में गाय और गोमांस को लेकर क्या उल्लेख मिलता है? आइए, समझते हैं पूरा मामला।

कई राज्यों में गोहत्या और गोवंश के संरक्षण को लेकर अलग-अलग कानून

गाय को लेकर भारत में धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। अलग-अलग राज्यों में गोहत्या और गोवंश के संरक्षण को लेकर अलग-अलग कानून हैं। इसी बीच गुजरात की एक अदालत का फैसला चर्चा में है। अदालत ने गोहत्या के मामले में तीन लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई और अपने फैसले में प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का भी उल्लेख किया। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें अदालत ने धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ राज्य के कानून के तहत सजा सुनाई है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अदालत का फैसला किन तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर आधारित है।

Cow slaughter law: गुजरात में गोहत्या पर उम्रकैद का पूरा मामला क्या है?

जवाब: यह मामला गुजरात के गांधीनगर जिले के जामला गांव का है। 22 अगस्त 2024 को पुलिस ने गांव के एक घर पर छापा मारा था। पुलिस के मुताबिक, वहां से 277 किलो गोमांस, पशुओं को काटने में इस्तेमाल होने वाले हथियार और मांस ले जाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली गाड़ी बरामद की गई थी। इस मामले में पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कुछ आरोपी कमजोर या दूध नहीं देने वाली गायों और भैंसों को खरीदते थे। इसके बाद जानवरों को काटकर मांस बेचने की तैयारी की जाती थी। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 54 गवाहों और 18 दस्तावेजी साक्ष्यों को पेश किया। सुनवाई पूरी होने के बाद गांधीनगर जिले की कलोल स्थित अतिरिक्त सत्र अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराया।

26 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए फैसले में वसीम कुरैशी, मोहम्मद रफीक कुरैशी और असफाक बहेलिम को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। तीनों पर कुल तीन-तीन लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। बाकी आरोपियों के मामले में अदालत ने दो को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, जबकि एक आरोपी की मुकदमे के दौरान मौत हो गई थी।

Cow slaughter law
                                                             Cow slaughter law
कोर्ट ने मनुस्मृति और वेदों का हवाला देते हुए क्या कहा?

जवाब: अदालत ने अपने फैसले में गाय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को समझाने के लिए मनुस्मृति, वेदों और दूसरे हिंदू धर्मग्रंथों का उल्लेख किया। फैसले में मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा गया कि गाय को केवल एक पशु नहीं, बल्कि धर्म और समृद्धि से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक माना गया है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि ऋषि मनु ने पशुओं की देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी वैश्य वर्ग को सौंपी थी। अदालत ने वैदिक परंपरा के आर्ष विवाह में गाय और बैल की जोड़ी के महत्व का भी जिक्र किया। इसके अलावा कामधेनु से जुड़ी धार्मिक मान्यता का उल्लेख करते हुए गाय को सभी गोवंश की माता बताया गया।

Cow slaughter law: ऋग्वेद में ‘अघ्न्या’ शब्द का उल्लेख

अदालत ने ऋग्वेद में गाय के लिए इस्तेमाल किए गए ‘अघ्न्या’ शब्द का भी हवाला दिया। इसका अर्थ ऐसी गाय से लगाया जाता है, जिसे मारा नहीं जाना चाहिए। फैसले में एक संस्कृत श्लोक भी उद्धृत किया गया, जिसमें गाय को सभी देवताओं की माता और यज्ञ का आधार बताया गया है। अदालत ने इन धार्मिक संदर्भों के जरिए गाय के प्रति भारतीय परंपरा में मौजूद सम्मान को रेखांकित किया।

गोहत्या पर उम्रकैद की सजा किस कानून के तहत दी गई?

जवाब: गुजरात में गोहत्या से जुड़े मामलों में गुजरात एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1954 लागू होता है। इस कानून में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं। वर्ष 2011 में गुजरात सरकार ने इस कानून में बदलाव करते हुए गाय, बछड़े, बैल और बैलगाड़ी में इस्तेमाल होने वाले बैलों के वध पर प्रतिबंध से जुड़े प्रावधानों को सख्त किया था। इसके बाद 2017 में कानून में एक और बड़ा संशोधन किया गया। इसके तहत गोहत्या के अपराध में सजा बढ़ाकर 10 साल से लेकर उम्रकैद तक कर दी गई। साथ ही एक लाख से पांच लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया।

गोमांस के अवैध परिवहन, भंडारण और बिक्री जैसे अपराधों के लिए भी सात से दस साल तक की कैद और एक लाख से पांच लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया। इसी कानून के तहत गुजरात की अदालत ने तीनों दोषियों को सजा सुनाई। गुजरात ऐसा कानून बनाने वाला पहला राज्य बना, जिसमें गोहत्या के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया।

Cow slaughter law: क्या पूरे देश में गोहत्या पर एक जैसा कानून है?

जवाब: नहीं। भारत में गोहत्या को लेकर कोई एक समान केंद्रीय कानून नहीं है। अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गोवंश के वध, परिवहन और मांस की बिक्री को लेकर अलग-अलग नियम हैं।

इसका संवैधानिक आधार भी है। संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीके से व्यवस्थित करने तथा गायों, बछड़ों और दूध देने वाले व खेती में काम आने वाले पशुओं की नस्लों के संरक्षण और उनके वध पर रोक लगाने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल है। इसका अर्थ है कि यह सरकारों के लिए नीति संबंधी दिशा देता है। इसके आधार पर राज्यों ने अपने-अपने कानून बनाए हैं।

देश में कानूनों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में समझ सकते हैं:

1. गोहत्या पर व्यापक प्रतिबंध वाले राज्य: गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक सहित कई राज्यों में गोवंश के वध पर सख्त प्रतिबंध हैं। हालांकि किन पशुओं पर प्रतिबंध है और उल्लंघन पर कितनी सजा मिलेगी, यह राज्य के कानून के अनुसार अलग-अलग है।

2. शर्तों के साथ वध की अनुमति वाले राज्य: कुछ राज्यों में पशु की उम्र, स्वास्थ्य, प्रजनन क्षमता या सक्षम अधिकारी से मिले प्रमाणपत्र के आधार पर वध की अनुमति दी जाती है। असम, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में अलग-अलग शर्तें लागू हैं।

3. अलग-अलग प्रावधान वाले राज्य: कुछ राज्यों में गाय, बैल और भैंस को लेकर अलग-अलग नियम हैं। केरल, पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों और अन्य क्षेत्रों में भी पशु वध से जुड़े नियम दूसरे राज्यों से अलग हैं।

Cow slaughter law: मनुस्मृति में गाय और गोमांस खाने को लेकर क्या लिखा है?

जवाब: मनुस्मृति में गाय और मांसाहार से जुड़े उल्लेखों को लेकर इतिहासकारों और विद्वानों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। इसलिए किसी एक श्लोक के आधार पर पूरे ग्रंथ का निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा। मनुस्मृति के पांचवें अध्याय में खाने योग्य और अखाद्य पशुओं का उल्लेख मिलता है। वहीं, अध्याय 11 में गोहत्या को पाप की श्रेणी में रखने से जुड़ा उल्लेख भी मिलता है। कुछ विद्वानों ने मनुस्मृति के श्लोकों की व्याख्या करते हुए कहा है कि प्राचीन ग्रंथों में कुछ विशेष परिस्थितियों में पशुओं के मांस के सेवन की अनुमति के संकेत मिलते हैं। वहीं, दूसरे विद्वान गाय की धार्मिक और सामाजिक भूमिका तथा गोहत्या के विरोध से जुड़े संदर्भों पर जोर देते हैं।

Cow slaughter law
                                                                      Cow slaughter law

इतिहासकार डीएन झा ने अपनी पुस्तक ‘द मिथ ऑफ द होली काऊ’ में प्राचीन भारत में पशुबलि और मांसाहार की परंपराओं पर चर्चा की है। दूसरी ओर, माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक ने भी मनुस्मृति के कुछ श्लोकों की अलग व्याख्या प्रस्तुत की है। इससे स्पष्ट है कि प्राचीन ग्रंथों में गाय और मांसाहार से जुड़े संदर्भों को समझने के लिए उनके समय, संदर्भ और अलग-अलग टीकाकारों की व्याख्याओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

वैदिक काल से मध्यकाल तक गाय को लेकर सोच कैसे बदली?

जवाब: इतिहासकारों और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्याओं के आधार पर गाय के प्रति सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण में आए बदलावों को मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण: वैदिक काल से मौर्यकाल तक

वैदिक काल में पशुपालन भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। उस समय धार्मिक अनुष्ठानों में पशुबलि और मांसाहार के उल्लेख मिलते हैं। इतिहासकार डीएन झा ने अपनी पुस्तक में वैदिक साहित्य के आधार पर प्राचीन भारत में पशुओं के वध और मांसाहार की परंपराओं पर चर्चा की है। हालांकि इस दौर में गाय के मांस के सेवन को लेकर सभी ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भ एकमत नहीं हैं।

दूसरा चरण: मौर्यकाल से शुरुआती मध्यकाल तक

इस दौर में पशुपालन, कृषि और धार्मिक परंपराओं में गाय का महत्व बढ़ता दिखाई देता है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों में पशुओं, भोजन और धार्मिक कर्तव्यों को लेकर अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। मनुस्मृति में कुछ पशुओं के मांस के सेवन से संबंधित नियम मिलते हैं। वहीं, गोहत्या को पाप से जोड़ने वाले उल्लेख भी मौजूद हैं। इसी कारण इस ग्रंथ की व्याख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं।

तीसरा चरण: मध्यकाल और उसके बाद

मध्यकाल में गाय का धार्मिक और सामाजिक महत्व और अधिक मजबूत हुआ। महाभारत और पुराणों में गोदान को पुण्य का कार्य बताया गया। कई धर्मशास्त्रों और स्मृतियों में गोहत्या के विरोध तथा प्रायश्चित से जुड़े नियमों का उल्लेख मिलता है। मुगल काल में अकबर और जहांगीर के शासन के दौरान भी कुछ अवसरों पर गाय और अन्य पशुओं के वध पर रोक लगाने से जुड़े आदेश दिए गए थे। आगे चलकर 19वीं शताब्दी में गोसंरक्षण आंदोलन ने सामाजिक और राजनीतिक रूप लिया। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1882 में गोरक्षिणी सभा की स्थापना की। इसके बाद गोसंरक्षण का मुद्दा सामाजिक और राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनता गया।

Cow slaughter law: आजादी के बाद गोहत्या को लेकर कानून कैसे बने?

जवाब: आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने पशुधन के संरक्षण को महत्व दिया। इसी सोच के तहत संविधान के अनुच्छेद 48 में गायों और अन्य उपयोगी पशुओं की नस्लों के संरक्षण तथा उनके वध पर रोक लगाने के लिए राज्यों को प्रयास करने का निर्देश दिया गया।

इसके बाद अलग-अलग राज्यों ने अपनी परिस्थितियों और नीतियों के अनुसार कानून बनाए। कुछ राज्यों ने गोहत्या पर व्यापक प्रतिबंध लगाया, जबकि कुछ ने उम्र, स्वास्थ्य और प्रमाणपत्र जैसी शर्तों के आधार पर पशु वध की अनुमति दी। यही कारण है कि आज देश के अलग-अलग हिस्सों में गोहत्या से जुड़े कानून और सजा के प्रावधान अलग-अलग हैं।

गुजरात कोर्ट के फैसले से क्या संदेश निकलता है?

जवाब: गुजरात की अदालत का यह फैसला दो वजहों से चर्चा में है। पहली वजह है गोहत्या के मामले में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा। दूसरी वजह है फैसले में मनुस्मृति, वेदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख। हालांकि, इस फैसले को समझते समय एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि अदालत ने दोषियों को गुजरात के कानून के तहत सजा दी है। धर्मग्रंथों का उल्लेख गाय के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करने के लिए किया गया। इस मामले से यह भी साफ होता है कि भारत में गोहत्या को लेकर कानून राज्य के हिसाब से अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक राज्य में दी गई सजा को पूरे देश का नियम नहीं माना जा सकता।

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