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मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर क्यों उठ रहे सवाल? 2023 के कानून में ऐसा क्या है, जिस पर हो रहा विवाद

CEC Appointment:

CEC Appointment: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों विपक्षी दलों के निशाने पर हैं। मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कथित गड़बड़ियों को लेकर विपक्ष लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है। इसी सिलसिले में दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी दलों ने बड़ी रैली भी आयोजित की थी। इससे पहले विपक्षी सांसदों ने उनके खिलाफ अनौपचारिक ‘जन महाभियोग’ प्रस्ताव भी पारित किया था। इस पूरे विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े साल 2023 के कानून पर भी सवाल उठ रहे हैं। दिसंबर 2023 में बने इस कानून के तहत ही मार्च 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। ऐसे में सवाल है कि इस कानून में ऐसा क्या है, जिस पर विपक्ष और कानून के जानकार आपत्ति जता रहे हैं? आइए समझते हैं।

CEC Appointment: क्या है मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का कानून?

साल 2023 में संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम बनाया था। इस कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति का प्रावधान किया गया है। इस समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। समिति की सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। इस कानून को लेकर विवाद इसलिए है क्योंकि चयन समिति में सरकार के दो सदस्य और विपक्ष का एक सदस्य होता है। ऐसे में विपक्ष का आरोप है कि नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव अधिक रहता है। इससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

CEC Appointment: अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया था। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त रखना जरूरी है। अदालत ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की समिति की सिफारिश पर की जाएगी। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक लागू रहने वाली अंतरिम व्यवस्था बताया था।

2023 के कानून पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

इस पूरे विवाद की मुख्य वजह चयन समिति की संरचना है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति में शामिल किया था। हालांकि, बाद में संसद द्वारा बनाए गए 2023 के कानून में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस बदलाव से चयन समिति में सरकार का बहुमत हो गया है। ऐसे में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है। उनका कहना है कि यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल मामले में दिए गए फैसले की भावना और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के सिद्धांत के विपरीत है। इसी वजह से इस कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

कैसे हुई थी ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति?

साल 2024 में 2023 के नए कानून के तहत ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इन नियुक्तियों के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में चयन समिति की बैठक हुई थी। इस समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता अधीर रंजन चौधरी भी शामिल थे। हालांकि, नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अधीर रंजन चौधरी ने अपनी असहमति दर्ज कराई थी। उन्होंने चयन प्रक्रिया और समिति में सरकार के बहुमत को लेकर सवाल उठाए थे। इसके बाद 19 फरवरी 2025 को ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पदभार संभाला। इसी दिन विवेक जोशी को भी चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। ज्ञानेश कुमार 2023 के कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने।

अगर कानून असंवैधानिक घोषित हुआ तो क्या होगा?

इस पूरे विवाद में एक अहम सवाल यह भी है कि अगर सुप्रीम कोर्ट 2023 के कानून को असंवैधानिक घोषित कर देता है, तो पिछले कुछ वर्षों में हुई नियुक्तियों और लिए गए फैसलों पर क्या असर पड़ेगा? इसका जवाब अदालत के अंतिम फैसले और उसमें दिए गए निर्देशों पर निर्भर करेगा। किसी कानून को असंवैधानिक घोषित किए जाने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि उसके तहत पहले लिए गए सभी फैसले और नियुक्तियां अपने आप रद्द हो जाएं। अदालत यह तय कर सकती है कि फैसले का प्रभाव पहले से हुई नियुक्तियों पर पड़ेगा या नहीं। ऐसे में ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और चुनाव आयोग के पिछले फैसलों पर इसका क्या असर होगा, यह न्यायालय के संभावित फैसले और उसके निर्देशों से ही स्पष्ट हो सकेगा।

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