INDIA Alliance: दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को हुई इंडिया गठबंधन की ‘चलो दिल्ली’ महारैली के आयोजन में राहुल गांधी की अग्रणी भूमिका रही। रैली में कांग्रेस नेताओं के साथ ही अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, फारूक अब्दुल्ला, तेजस्वी यादव और सुप्रिया सुले समेत कई दलों के बड़े नेताओं ने भाग लिया। इस आधार पर तर्क दिया जा सकता है कि रैली में इंडिया गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी साबित करती है कि गठबंधन में कोई आंतरिक मतभेद नहीं हैं और राहुल गांधी इंडिया गठबंधन के एकमात्र सर्वमान्य नेता हैं, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी मुद्दे को लेकर विपक्षी पार्टियों के एकजुट हो जाने भर से ही यह मान लिया जाए कि वे दिल से किसी को अपना नेता स्वीकार कर चुकी हैं?
सर्वोच्च नेता घोषित करेंगी पार्टियां?
राहुल गांधी वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई ‘इंडिया’ गठबंधन की महारैली तथा हाल में हुए विपक्षी दलों के कई अन्य विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व करते दिखाई दिये हैं।यही कारण है कि कांग्रेस के साथ ही उनके कई समर्थक उन्हें इंडिया गठबंधन का मुख्य चेहरा मानते हैं, लेकिन सच यही है कि आज तक तृणमूल कांग्रेस (TMC), समाजवादी पार्टी (SP) और अन्य क्षेत्रीय दलों ने उन्हें औपचारिक रूप से गठबंधन का सर्वोच्च नेता घोषित नहीं किया है। आज ममता बनर्जी के पास खोने को बहुत ज्यादा नहीं बचा हुआ है, लेकिन हाल में जब उनसे राहुल के नेतृत्व को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने बड़े राजनीतिक कौशल से उस सवाल को टाल दिया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव तो यूपी में कांग्रेस को अपनी शर्तों पर सीटें देना चाहते हैं? आम आदमी पार्टी (AAP) और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) जैसी विपक्षी पार्टियों ने तो रामलीला मैदान की रैली में शामिल होने की जरूरत ही महसूस नहीं की।कारण कि सबकी अपनी-अपनी राजनीतिक और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं हैं।
दोस्तों को संभाले रखने की जरूरत
आम आदमी पार्टी (AAP) का तो समझ में आता है कि वह कांग्रेस के ध्वज तले इसलिए किसी लड़ाई में इसलिए शामिल नहीं होना चाहती है कि कल पंजाब में उसे भाजपा की तरह ही कांग्रेस से भी मुकाबला करना होगा, लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) क्यों रैली से दूर रही, इस बारे में क्या राहुल गांधी कुछ अहसास कर सकेंगे? द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के पास कुल 22 लोकसभा सांसद हैं, जो संसद के निचले सदन में उसे चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनाते हैं। केंद्र में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन के लिए डीएमके के ये सांसद संख्या बल, विधायी रणनीति और राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से बेहद मददगार साबित हो सकते थे, लेकिन मई 2026 में तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस और डीएमके की दोस्ती टूट गयी। डीएमके के पास 10 राज्यसभा सांसद भी हैं, क्या राहुल गांधी को नहीं लगता कि वे इस ऊर्जा को संभाल पाने में असफल रहे? हिंदी के यशस्वी कवि रहीम दास जी का एक दोहा है कि-
‘टूटे सुजन मनाइए, जो टूटें सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥’
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥’
INDIA Alliance: कांग्रेस कुनबे को एकजुट रखने की चुनौती
क्या राहुल गांधी एक परिपक्व एवं दूरदर्शी नेता की तरह निकट भविष्य में डीएमके को अपने अभियान का हिस्सा बनाने में सफल हो पाएंगे ? राजनीति में माला के टूटे हुए मोतियों को समेटने में आखिर क्या हर्ज है? इसमें तो कोई दंभ नहीं होना चाहिए।एक समय तो स्वर्गीय इंदिरा गांधी को भी स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के पास जाना पड़ा था।क्या राहुल गांधी कोई ऐसी कोशिश कर पाएंगे? उनके कई होनहार दोस्त जो अब कांग्रेस में नहीं हैं, उनकी घर वापसी संभव है? राहुल गांधी को अपने राजनीतिक कौशल से न सिर्फ इंडिया गठबंधन का चेहरा बनना है, बल्कि उनके सम्मुख कांग्रेस कुनबे को एकजुट रखने की भी चुनौती है। उन्हें देखना है कि राज्यों में कांग्रेस नेताओं की आपसी गुटबाजी कैसे कार्यकर्ताओं को असहज करती रही है। अब देखना है कि राहुल गांधी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों की अपेक्षाओं के अनुसार कैसे इंडिया गठबंधन के सर्वमान्य नेता बन पाते हैं?








