UP Elections 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित समुदाय हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। जब भी राज्य में दलित राजनीति की बात होती है, तो सबसे पहले मायावती का नाम सामने आता है। लंबे समय तक मायावती दलित समाज की सबसे बड़ी नेता मानी जाती रहीं। हालांकि, 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार आने के बाद उनकी राजनीतिक पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में नेतृत्व का एक खालीपन पैदा हो गया। अब इस जगह को भरने के लिए कई नेता अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। इनमें लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान भी शामिल हैं, जो बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे हैं।
UP Elections 2027: कांग्रेस और सपा पर चिराग का निशाना
चिराग पासवान की नजर उत्तर प्रदेश के बड़े दलित वोटबैंक पर है। राज्य की राजनीति में करीब 22 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाला दलित समुदाय इस समय नेतृत्व के नए विकल्पों की तलाश में है। चिराग इसी स्थिति को अपने लिए एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। इसी रणनीति के तहत गुरुवार को वह वाराणसी के जगतपुर इंटर कॉलेज मैदान में आयोजित रैली में पहुंचे और दलित समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की।रैली के दौरान चिराग ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने हमेशा दलितों को गुमराह करने का काम किया है। पार्टी ने आरक्षण को लेकर भ्रम फैलाया और संविधान खत्म होने का झूठा नैरेटिव तैयार किया। चिराग ने कहा कि कांग्रेस का दलितों के प्रति प्रेम केवल दिखावा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने कभी डॉ. भीमराव आंबेडकर का उचित सम्मान नहीं किया।
दलित वोटबैंक पर चिराग की नजर
वाराणसी की रैली में चिराग पासवान ने सपा और कांग्रेस को निशाने पर लिया, लेकिन मायावती के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। इसके पीछे उत्तर प्रदेश के दलित वोटबैंक का राजनीतिक समीकरण अहम माना जा रहा है। दरअसल, राज्य में दलित समुदाय मुख्य रूप से जाटव और गैर-जाटव दो बड़े वर्गों में बंटा हुआ है। जाटव समुदाय की आबादी करीब 12 फीसदी है और इसे बीएसपी का पारंपरिक वोटबैंक माना जाता रहा है। वहीं, गैर-जाटव दलितों की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी है। इस वर्ग में पासी, खटीक, वाल्मीकि और कोरी समुदाय शामिल हैं।चिराग पासवान खुद भी गैर-जाटव दलित समाज से आते हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद गैर-जाटव दलितों का एक बड़ा हिस्सा बीएसपी से दूर हो गया। वहीं, जाटव वोटबैंक का समर्थन भी पहले की तरह मायावती को नहीं मिल पा रहा है। इस राजनीतिक खालीपन को भरने के लिए नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी कोशिश की, लेकिन उनका प्रभाव अभी कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है। ऐसे में चिराग पासवान खुद को दलित राजनीति के एक मजबूत और आक्रामक चेहरे के रूप में पेश करने में जुटे हैं।
UP Elections 2027: मायावती पर सीधे हमले से क्यों बच रहे चिराग?
चिराग पासवान की राजनीतिक रणनीति में मायावती को लेकर खास सावधानी दिखाई दे रही है। वह बीएसपी सुप्रीमो के खिलाफ सीधे बयान देने से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि जाटव समुदाय के एक बड़े हिस्से में आज भी मायावती के प्रति राजनीतिक लगाव है। ऐसे में मायावती से टकराव उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसके बजाय चिराग दलितों की मौजूदा स्थिति के लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को जिम्मेदार ठहराकर इन दोनों दलों को घेर रहे हैं।इसके साथ ही चिराग खुद को दिल्ली के सत्ता केंद्र तक पहुंच रखने वाले एक मजबूत दलित नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री का पद, एनडीए में उनकी भूमिका और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नजदीकी को वह अपनी राजनीतिक ताकत के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी रणनीति के तहत दलित समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश है कि उनकी पहुंच सीधे केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व तक है।
क्या ट्रिपल P फॉर्मूले से बनेगी बात?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने के लिए लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने ट्रिपल P का नया नारा दिया है। इस फॉर्मूले के केंद्र में गैर-जाटव दलित समुदाय, खासकर पासी समाज को रखा गया है। इसके साथ ही पार्टी ब्राह्मण समुदाय को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है। यानी चिराग पासवान की रणनीति दलित और ब्राह्मण वोटबैंक को एक साथ लाने की है। पार्टी को उम्मीद है कि इन दोनों समुदायों का समर्थन उसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत स्थिति दिला सकता है।
UP Elections 2027: चिराग पासवान के सामने क्या हैं चुनौतियां?
उत्तर प्रदेश में चिराग पासवान के लिए अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना आसान नहीं होगा। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA समीकरण के जरिए नए राजनीतिक गठजोड़ की कोशिश की थी। चुनाव में दलित समुदाय के एक बड़े वर्ग ने अखिलेश यादव पर भरोसा जताया और समाजवादी पार्टी का समर्थन किया। ऐसे में चिराग के सामने उन दलित मतदाताओं का विश्वास जीतने की चुनौती होगी, जो पहले ही अखिलेश के साथ जुड़ चुके हैं।इसके अलावा नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद भी चिराग के लिए मजबूत प्रतिद्वंद्वी साबित हो सकते हैं। युवाओं के बीच चंद्रशेखर की लोकप्रियता बढ़ रही है। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटव समुदाय में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। ऐसे में दलित वोटबैंक में अपनी जगह बनाने के लिए चिराग को चंद्रशेखर से भी मुकाबला करना होगा।
चिराग पासवान के सामने तीसरी बड़ी चुनौती बीजेपी है। साल 2014 के बाद से बीजेपी गैर-जाटव दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल रही है। ऐसे में चिराग को एनडीए का हिस्सा रहते हुए भी इसी वोटबैंक में अपनी अलग पहचान बनानी होगी। उनके लिए यह राजनीतिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।कुल मिलाकर, चिराग पासवान उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के एक नए चेहरे के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, उनके सामने मायावती का पारंपरिक प्रभाव, अखिलेश यादव का PDA समीकरण, चंद्रशेखर आजाद की बढ़ती लोकप्रियता और बीजेपी की मजबूत मौजूदगी जैसी कई चुनौतियां हैं। अब यह देखना अहम होगा कि चिराग का ट्रिपल P फॉर्मूला उत्तर प्रदेश में उन्हें कितनी राजनीतिक सफलता दिला पाता है।








