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खाकी और साहस का नया चेहरा, दुधवा की ‘लेडी रेस्क्यूअर’ नज़रून निशा ने थामी अजगर की लगाम, नारी शक्ति की दहाड़ से थर्राया तराई

Lakhimpur Kheri: जब हम वन्यजीव संरक्षण और खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन्स की बात करते हैं, तो अक्सर ज़हन में पुरुषों की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित दुधवा टाइगर रिजर्व की धरती आज एक अलग ही कहानी बयां कर रही है। यहाँ ‘नारी शक्ति’ केवल नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ज़मीन पर उतरकर मौत से दो-दो हाथ कर रही है। शनिवार को पलिया रेंज के अजीतनगर में जो हुआ, वह देश की हर उस महिला के लिए मिसाल है जो मानती है कि कोई भी काम उनकी शक्ति से बाहर है। नज़रून निशा, एक ऐसा नाम जो अब दुधवा के जंगलों में साहस का पर्याय बन चुका है।

जब अजीतनगर में पसरा सन्नाटा

दुधवा टाइगर रिजर्व के पलिया रेंज से सटे अजीतनगर गाँव में शनिवार की सुबह रोज़ाना की तरह शुरू हुई थी। लेकिन अचानक गाँव के बाहरी हिस्से में एक भारी सरसराहट ने लोगों का ध्यान खींचा। झाड़ियों के बीच करीब 10 से 12 फीट लंबा एक विशालकाय इंडियन रॉक पाइथन (भारतीय अजगर) कुंडली मारे बैठा था। अजगर का आकार इतना बड़ा था कि उसे देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट गए। ग्रामीणों में दहशत फैल गई, लाठी-डंडे निकलने लगे और वन विभाग को सूचित किया गया। आमतौर पर ऐसी स्थिति में लोग वन विभाग की भारी-भरकम टीम का इंतज़ार करते हैं, लेकिन मौके पर पहुँची बाघ संरक्षण फाउंडेशन (Tiger Conservation Foundation) की सदस्य नज़रून निशा।

Lakhimpur Kheri: सूझबूझ, तकनीक और बेखौफ जज्बा

नज़रून निशा जब मौके पर पहुँचीं, तो वहाँ तमाशबीनों की भारी भीड़ थी, जो अजगर को डराने की कोशिश कर रही थी। नज़रून ने सबसे पहले भीड़ को पीछे हटाया, क्योंकि वन्यजीवों के रेस्क्यू में सबसे बड़ी बाधा ‘मानवीय शोर’ होता है। बिना किसी डर के, उन्होंने अजगर की गतिविधियों को भांपा। भारतीय अजगर (Python molurus) जहरीला नहीं होता, लेकिन उसकी पकड़ और उसका ‘कॉन्स्ट्रिक्शन’ (दबाव) इतना शक्तिशाली होता है कि वह बड़े से बड़े शिकार की हड्डियाँ तोड़ सकता है। नज़रून निशा ने अपनी पेशेवर ट्रेनिंग का परिचय देते हुए अजगर की गर्दन को सुरक्षित तरीके से पकड़ा और उसे बिना चोट पहुँचाए काबू में किया। यह नज़ारा देखकर ग्रामीण हतप्रभ थे—एक महिला, एक विशालकाय अजगर को इतनी सहजता से संभाल रही थी, जैसे वह कोई मामूली खेल हो।

नज़रून निशा का यह रेस्क्यू ऑपरेशन केवल एक सांप को पकड़ना भर नहीं था; यह ‘नारी शक्ति’ के उस वैश्विक संदेश को मजबूती देता है जहाँ महिलाएं अब चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरे क्षेत्रों (Field Operations) में नेतृत्व कर रही हैं। दुधवा टाइगर रिज़र्व के बाघ संरक्षण फाउंडेशन में उनकी भूमिका दर्शाती है कि वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच होने वाले संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को सुलझाने में महिलाएं पुरुषों से कहीं पीछे नहीं हैं। उनके हाथों में सिर्फ ममता ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों की जान बचाने वाली सुरक्षा भी है। रेस्क्यू के बाद सबसे बड़ी चुनौती होती है जानवर को सही सलामत उसके घर पहुँचाना। नज़रून निशा ने पाइथन को एक सुरक्षित बैग में रखा और उसे पलिया रेंज के घने जंगलों के बीच ले गईं। वहाँ उन्होंने उसे धीरे से ज़मीन पर छोड़ा। जैसे ही वह विशालकाय जीव रेंगते हुए अपनी दुनिया में वापस लौटा, नज़रून के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। यह मुस्कान उस ‘संरक्षण’ की जीत थी, जिसके लिए भारत का वन विभाग और बाघ संरक्षण फाउंडेशन दिन-रात काम कर रहा है।

रेस्क्यू के बाद नज़रून निशा वहीं नहीं रुकीं। उन्होंने स्थानीय लोगों को इकट्ठा कर उन्हें वन्यजीवों के महत्व के बारे में समझाया। उन्होंने बताया कि इंडियन रॉक पाइथन पारिस्थितिकी तंत्र में चूहों और छोटे जीवों की आबादी को नियंत्रित रखता है। ये जीव तब तक हमला नहीं करते जब तक इन्हें छेड़ा न जाए। इन्हें मारना कानूनन अपराध है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सजा का प्रावधान है।

राष्ट्रीय फलक पर लखीमपुर की पहचान

लखीमपुर खीरी के दुधवा का नाम अक्सर बाघों और हाथियों के लिए लिया जाता है, लेकिन नज़रून निशा जैसे फील्ड वर्कर इसे ‘मानवीय साहस’ के लिए नई पहचान दिला रहे हैं। आज जब भारत सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और महिला सशक्तिकरण के बड़े अभियान चला रही है, तो नज़रून निशा जैसे व्यक्तित्व इन अभियानों के ‘ब्रांड एंबेसडर’ के रूप में उभरते हैं। दुधवा प्रशासन और बाघ संरक्षण फाउंडेशन के उच्चाधिकारियों ने नज़रून निशा के इस कार्य की सराहना की है। अधिकारियों का मानना है कि महिलाओं के इस क्षेत्र में आने से ग्रामीणों के बीच संवाद करना आसान होता है और संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है।

Report BY: संजय कुमार 

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