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107 साल बाद फिरंगियों से करोड़ों की वसूली करेगा पोता!

English Sehore News: 107 साल बाद फिरंगियों से करोड़ों की वसूली करेगा पोता!

Sehore News: मध्य प्रदेश के सीहोर जिले से एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जो सीधा प्रथम विश्व युद्ध के दौर की याद दिलाता है। यहाँ के एक व्यापारी परिवार ने दावा किया है कि ब्रिटिश हुकूमत ने उनसे हजारों रुपये उधार लिए थे, जो आज तक नहीं चुकाए गए। अब यह परिवार कानूनी रास्ते से ब्रिटेन से अपना पैसा वापस माँगने की तैयारी कर रहा है।

Sehore News: क्या है पूरा मामला?

यह कहानी शुरू होती है साल 1917 में, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। सीहोर के तत्कालीन प्रसिद्ध व्यापारी सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने उस समय की ब्रिटिश सरकार को 35,000 रुपये बतौर कर्ज दिए थे। बताया जा रहा है कि उस वक्त ब्रिटिश अधिकारियों ने बाकायदा लिखित दस्तावेज सौंपकर यह राशि वापस करने का वादा किया था।

ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा दिया गया लिखित दस्तावेज
                                                        ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा दिया गया लिखित दस्तावेज

Sehore News: वसीयत और दस्तावेजों में मिला खजाना

सेठ जुम्मा लाल के पोते विवेक रूठिया का दावा है कि उनके पास इस लेन-देन के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं। विवेक के अनुसार, उनके परिवार के पुराने कागजातों और पूर्वजों की वसीयत में इस वित्तीय मदद का पूरा विवरण दर्ज है। इन दस्तावेजों के आधार पर ही अब परिवार अपने हक की लड़ाई लड़ने जा रहा है।

करोड़ों में पहुँच गई है रकम

1917 के 35 हजार रुपये की कीमत आज के दौर में मामूली लग सकती है, लेकिन यदि इस पर एक सदी से अधिक का ब्याज जोड़ा जाए, तो यह राशि करोड़ों रुपये में पहुँच जाती है। विवेक रूठिया अब ब्याज सहित इस पूरी रकम की वसूली के लिए ब्रिटिश सरकार को कानूनी नोटिस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं।

क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?

कानूनी विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के हवाले से विवेक का कहना है कि:

कोई भी संप्रभु राष्ट्र (Sovereign Nation) अपने पुराने वित्तीय वादों या कर्ज से पीछे नहीं हट सकता।

सत्ता बदलने या समय बीतने के बावजूद ‘देनदारी’ खत्म नहीं होती।

यदि ब्रिटिश सरकार इस पर ध्यान नहीं देती, तो मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (हेग) तक ले जाया जा सकता है।

राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं

हालाँकि, यह कानूनी लड़ाई इतनी आसान नहीं है। जानकारों का मानना है कि 100 साल से भी पुराने दस्तावेजों की कानूनी वैधता साबित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी। साथ ही, इतने लंबे समय बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे दावों को स्वीकार करवाना एक जटिल प्रक्रिया है।

 

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