Shivalik crosses Hormuz: भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के 15वें दिन भारत का एलपीजी (रसोई गैस) ले जाने वाला जहाज ‘शिवालिक’ सुरक्षित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर गया। जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने वाली वेबसाइट समुद्री यातायात के अनुसार यह जहाज शुक्रवार रात सुरक्षित रूप से इस अहम समुद्री मार्ग से निकल गया।
कतर से अमेरिका के लिए रवाना हुआ था जहाज
जानकारी के मुताबिक यह जहाज 7 मार्च को कतर से रवाना हुआ था और इसका गंतव्य संयुक्त राज्य अमेरिका था. यह जहाज भारत की सरकारी कंपनी शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की है और इसमें 50,000 टन से अधिक एलपीजी ले जाने की क्षमता है।
Shivalik crosses Hormuz: भारत के लिए क्यों अहम है यह खबर
मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों का गुजरना जोखिम भरा माना जा रहा है, क्योंकि यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस आपूर्ति मार्गों में से एक है। ऐसे में भारतीय जहाज का सुरक्षित निकलना ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
एलपीजी को लेकर घबराहट में बुकिंग बढ़ी
हालांकि सरकार का कहना है कि देश में फिलहाल एलपीजी की कोई कमी नहीं है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि गलत सूचनाओं के कारण लोग घबराहट में सिलेंडर बुक कर रहे हैं और कुछ जगहों पर जमाखोरी की भी कोशिश हो रही है। उन्होंने बताया कि घरेलू एलपीजी की औसत डिलीवरी अवधि लगभग ढाई दिन है। जमाखोरी रोकने के लिए डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (DAC) प्रणाली लागू की गई है, जिसमें उपभोक्ता को सिलेंडर प्राप्त करने के लिए डिलीवरी कर्मी को एक कोड देना होता है।
Shivalik crosses Hormuz: बुकिंग के नियम में अस्थायी बदलाव
सरकार ने अस्थायी तौर पर एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग के बीच न्यूनतम अंतराल 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया है, ताकि अनावश्यक बुकिंग और जमाखोरी को रोका जा सके।
होर्मुज को लेकर बढ़ा वैश्विक तनाव
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिकी सेना ने फारस की खाड़ी में स्थित खर्ग द्वीप पर ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर इस क्षेत्र के तेल ढांचे को भी निशाना बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान के 80 से 90 प्रतिशत कच्चे तेल का निर्यात इसी द्वीप के जरिए होता है, इसलिए यहां किसी भी सैन्य कार्रवाई का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
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