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मातृभाषा का अपमान’ vs ‘तुष्टिकरण’- बंगाल में मोदी के बयान पर TMC का जोरदार पलटवार, बोली- ‘भ्रामक और बेतुका’!

Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाषा, पहचान और इतिहास को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। नरेंद्र मोदी के कूचबिहार में दिए गए बयान के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने तीखा पलटवार किया है। ‘इश्तेहार’ शब्द को लेकर शुरू हुआ विवाद अब चुनावी मुद्दा बन गया है।

PM मोदी का आरोप

प्रधानमंत्री मोदी ने टीएमसी के घोषणापत्र को ‘इश्तेहार’ कहे जाने पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि “तुष्टिकरण की राजनीति में बंगाल की पहचान को बदला जा रहा है।” उन्होंने इस शब्द को 1905 के ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ते हुए इसे गंभीर मुद्दा बताया और जनता से अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने की अपील की।

Bengal Election 2026: टीएमसी का तीखा जवाब

टीएमसी नेताओं ने इस बयान को “भ्रामक और गैर-जरूरी” बताया। पार्टी सांसद सागरिका घोष ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह प्रधानमंत्री का “पूरी तरह बेतुका बयान” है। उन्होंने कहा कि ‘इश्तेहार’ एक सामान्य शब्द है, जो ‘मेनिफेस्टो’ के रूप में कई भाषाओं में इस्तेमाल होता है और इसे विवाद बनाना गलत है।

कुणाल घोष का हमला

टीएमसी उम्मीदवार कुणाल घोष ने भी प्रधानमंत्री पर हमला बोलते हुए कहा कि “उन्हें मातृभाषा का सम्मान नहीं आता” और यह बयान बंगाली भाषा का अपमान है। उन्होंने इसे बंगाल की अस्मिता पर हमला बताया। इस मुद्दे पर विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी प्रधानमंत्री को घेरा। कीर्ति आजाद ने इसे “अज्ञानता और बौद्धिक दिवालियापन” करार दिया और कहा कि इस तरह के बयान राजनीति को भटकाने वाले हैं।

Bengal Election 2026: भाजपा का पलटवार

वहीं भाजपा की ओर से सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि ‘इश्तेहार’ शब्द सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि इतिहास से जुड़ा संकेत है। उन्होंने सवाल उठाया कि टीएमसी ने अपने घोषणापत्र के लिए यह शब्द क्यों चुना और इसका सांस्कृतिक संदर्भ क्या है।

1905 के इतिहास से जुड़ा मामला

भाजपा इस विवाद को 1905 के बंगाल विभाजन और ‘लाल इश्तेहार’ से जोड़ रही है, जिसे उस दौर में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ाने वाला दस्तावेज बताया जाता है। अब इसी ऐतिहासिक संदर्भ को मौजूदा चुनावी राजनीति में मुद्दा बनाया जा रहा है।

Bengal Election 2026: चुनाव से पहले गरमाई सियासत

बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले ‘इश्तेहार’ पर छिड़ा विवाद अब भाषा बनाम राजनीति की बहस में बदल गया है। एक ओर भाजपा इसे सांस्कृतिक पहचान और तुष्टिकरण से जोड़ रही है, तो दूसरी ओर टीएमसी इसे बंगाली भाषा और अस्मिता का मुद्दा बता रही है। इससे चुनावी माहौल और अधिक गरमा गया है।

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