Iran crisis: ईरान में जारी जंग का असर अब पूरी दुनिया के ऊर्जा सेक्टर पर साफ दिखने लगा है। तेल और गैस की सप्लाई बाधित होने से एशिया और अफ्रीका के कई देश गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। यही वजह है कि अब ये देश पारंपरिक ईंधन के बजाय नए विकल्पों की तलाश में जुट गए हैं, जिनमें परमाणु ऊर्जा (न्यूक्लियर एनर्जी) सबसे अहम विकल्प बनकर उभर रही है।
परमाणु ऊर्जा की ओर झुकाव
ऊर्जा संकट के बीच जिन देशों के पास पहले से न्यूक्लियर प्लांट हैं, वे अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रहे हैं ताकि तुरंत राहत मिल सके। वहीं जिन देशों के पास यह तकनीक नहीं है, वे भविष्य को ध्यान में रखते हुए परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम शुरू कर रहे हैं।
Iran crisis: लंबी प्रक्रिया लेकिन स्थायी समाधान
हालांकि, परमाणु ऊर्जा कोई तुरंत मिलने वाला समाधान नहीं है। इसे विकसित करने में कई साल लगते हैं, खासकर उन देशों के लिए जो इस क्षेत्र में नए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आज की प्लानिंग आने वाले समय में इन देशों की ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत आधार बनेगी।
Iran crisis: एशिया और अफ्रीका में तेज़ी
ईरान जंग के चलते दक्षिण कोरिया न्यूक्लियर उत्पादन बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि ताइवान अपने बंद पड़े रिएक्टरों को फिर से चालू करने पर विचार कर रहा है। अफ्रीका में केन्या, रवांडा और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी अब न्यूक्लियर एनर्जी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर ‘न्यूक्लियर रिवाइवल’
विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट ने दुनिया में एक तरह का ‘न्यूक्लियर पुनर्जागरण’ शुरू कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के मुताबिक, अभी 31 देश न्यूक्लियर एनर्जी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो दुनिया की करीब 10% बिजली की जरूरत पूरी करते हैं। वहीं करीब 40 देश इस दिशा में आगे बढ़ने की योजना बना रहे हैं।
अमेरिका-रूस के बीच बढ़ती होड़
ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव के साथ ही अफ्रीका में अमेरिका और रूस के बीच प्रभाव बढ़ाने की होड़ भी तेज हो गई है। रूस जहां मिस्र समेत कई देशों में न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, वहीं अमेरिका भी मॉड्यूलर रिएक्टर टेक्नोलॉजी के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
न्यूक्लियर एनर्जी के खतरे भी
Iran crisis: न्यूक्लियर एनर्जी जहां एक तरफ समाधान के रूप में देखी जा रही है, वहीं इसके जोखिम भी कम नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे देशों की निर्भरता यूरेनियम जैसे आयातित ईंधन पर बढ़ सकती है। साथ ही युद्ध के समय न्यूक्लियर प्लांट्स पर खतरा भी बना रहता है। इतिहास में हिरोशिमा और नागासाकी जैसी घटनाएं इसके खतरों की याद दिलाती हैं।
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