Home » राजनीति » केरल में बुरी तरह फंस गई कांग्रेस, मुख्यमंत्री तय करने में छूटे आलाकमान के पसीने

केरल में बुरी तरह फंस गई कांग्रेस,  मुख्यमंत्री तय करने में छूटे आलाकमान के पसीने 

New Delhi: केरल में बुरी तरह फंस गई कांग्रेस, मुख्यमंत्री तय करने में छूटे आलाकमान के पसीने
New Delhi:  तमिलनाडु में टीवीके नेता विजय थलपति को समर्थन जुटाने के लिए दूसरी पार्टियों को मनाने में एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ गया। कभी कोई इस बात से नाराज हुआ कि वे WhatsApp से समर्थन मांग रहे हैं, तो किसी ने कहा कि उन्होंने राज्यपाल को हमारा फर्जी समर्थन पत्र सौंपा।एक बार तो शपथ ग्रहण समारोह तक रद्द हुआ। इतना सबकुछ होने के बावजूद आखिरकार विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ही ली। दूसरी तरफ केरल में कांग्रेस को शानदार बहुमत है, लेकिन सवाल यह है कि पार्टी आज तक वहां मुख्यमंत्री क्यों तय नहीं कर पाई है ?  क्या यह स्थिति कांग्रेस के भीतर की जबर्दस्त गुटबाजी और पार्टी आलाकमान की कमजोरी नहीं मानी जाएगी ?

जबर्दस्त गुटबाजी

राज्य में कांग्रेसनीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने वाम मोर्चा( एलडीएफ) को हराकर जीत तो हासिल कर ली, लेकिन अब कांग्रेस के सामने अहम चुनौती यह है कि राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर किसकी ताजपोशी की जाए? यह समस्या इसलिए खड़ी हुई है कि पार्टी में एक से अधिक दावेदरों के चलते जबर्दस्त गुटबाजी चल रही है। पार्टी नेतृत्व के लिए इन गुटों को संतुष्ट करना एक बड़ी चुनौती है।मुख्यमंत्री पद की दौड़ में तीन बड़े नाम-वी. डी. सतीशन, रमेश चेन्निथला और के. सी. वेणुगोपाल के चल रहे हैं। वीडी सतीशन के समर्थक कह रहे हैं कि उन्होंने चुनाव जितवाने में मुख्य भूमिका निभाई।उन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश जगाकर एलडीएफ को पटकनी दी। यूडीएफ के सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का समर्थन भी वी. डी. सतीशन को बताया जाता है। रमेश चेन्निथला के समर्थक कह रहे हैं कि पार्टी को उनके अनुभव और व्यवहारकुशलता का फायदा उठाना चाहिए। सभी गुटों में जबर्दस्त खींचतान मची हुई है।

 New Delhi: आलाकमान की समस्या

बताया जाता है कि कांग्रेस आलाकमान के.सी. वेणुगोपाल को वहां भेजना चाहता है। इसके अलावा केंद्र में पार्टी का एक गुट भी यही चाहता है कि वे दिल्ली की राजनीति से केरल शिफ्ट हो जाएं तो अच्छा है।दिक्कत यह है कि वेणुगोपाल को कमान सौंपी जाती है, तो पार्टी के वे नेता नाराज हो जाएंगे, जिनकी जमीनी पकड़ है और जिन्होंने जमीन पर काम किया है।

New Delhi: उठते सवाल

140 सीटों वाली केरल विधानसभा में UDF ने 102 सीटों पर रिकॉर्ड जीत हासिल की है, जबकि LDF 35 सीटों पर सिमट गई है।सरकार बनाने के लिए 71 सीटें चाहिए, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व अभी तक कोई फैसला नहीं ले पाया है। ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या कांग्रेस नेतृत्व इतना कमजोर हो चुका है कि गुटों में बंटे राज्य के अपने नेताओं को समझा नहीं पा रहा है?  जब वेणुगोपाल विधानसभा चुनाव जितवाने की भूमिका में नहीं रहे, तो फिर उन्हें कार्यकर्ताओं की भावना के विरुद्ध राज्य में क्यों थोपा जा रहा है? जिन्होंने जमीनी लड़ाई लड़ी स्वाभाविक तौर पर पहला अधिकार तो उन्हीं का माना जाना चाहिए।

New Delhi:  भूल करती रही कांग्रेस

दरअसल, कांग्रेस नेतृत्व की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वह जमीनी हकीकतों को नजरंदाज करके ऊपर से ऐसे नेताओं को थोप देता है।जिससे पार्टी का असंतोष खुलकर सामने आता है। वर्ष 2000 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस के तत्कालीन राज्य अध्यक्ष हरीश रावत ने जमीन पर लड़ाई लड़कर पार्टी को सत्ता में पहुंचाया, लेकिन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी बना दिये गये क्योंकि वे तब केंद्र में बेरोजगार थे, तो राज्य में खपा दिये गये। उस वक्त पार्टी विधायकों ने देहरादून में तिवारी के खिलाफ प्रदर्शन किया था। अपने चहेतों या बड़े नेताओं को राज्य में खपाने की आलाकमान की यह भूल पार्टी के लिए नुकसानदायक हुई है और निश्चित ही आगे भी होगी। केरल में वेणुगोपाल मुख्यमंत्री बना भी दिये गये, तो जमीन पर लड़ाई लड़कर पार्टी को जीत दिलवाने वाले नेता क्या चुप बैठे रहेंगे? वे बराबर मुख्यमंत्री के रास्ते में चुनौतियां खड़ी करते रहेंगे। बहरहाल कांग्रेस आलाकमान मुख्यमंत्री का चयन करने में बुरी तरह फंसा हुआ है। 
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments