Dhaka: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर ब्रेक नहीं लग रहा है। निर्वासित जीवन जी रही लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने इस पर चिंता जताई है। उन्होंने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को पत्र लिखकर ऐसी करतूतों पर नकेल लगाने की अपील की है। उन्होंने प्रधानमंत्री से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखने और “धार्मिक उग्रवाद और मॉब टेरर” के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की अपील की है।
पुलिस का रवैया पीड़ितों के ही खिलाफ
बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, “आपने कहा था कि बांग्लादेश में धर्म या जाति की परवाह किए बिना सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाएंगे। लेकिन वास्तविकता में हम फिर से हिंदुओं पर हमले, उनकी जमीन पर कब्जा, अफवाहों और आरोपों के आधार पर उनके जीवन का नाश होते देख रहे हैं।” उन्होंने हाल की कुछ घटनाओं का भी जिक्र किया, जिनमें कई हिंदू युवकों पर “इस्लाम का अपमान” करने के आरोप में कथित रूप से चरमपंथी समूहों द्वारा हमले किए गए।
नसरीन ने कहा, “सतखीरा के स्कूल शिक्षक गौरांग सरकार, गोपालगंज के एक स्कूल के कंप्यूटर लैब ऑपरेटर मिथु मंडल और गौरिपुर कॉलेज के शाओन चंद्र दास पर ‘इस्लाम का अपमान’ करने के आरोप में हिंदू विरोधी चरमपंथियों ने हमला किया। लेकिन हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने पीड़ितों को ही गिरफ्तार कर लिया।”
नसरीन ने कहा, “सतखीरा के स्कूल शिक्षक गौरांग सरकार, गोपालगंज के एक स्कूल के कंप्यूटर लैब ऑपरेटर मिथु मंडल और गौरिपुर कॉलेज के शाओन चंद्र दास पर ‘इस्लाम का अपमान’ करने के आरोप में हिंदू विरोधी चरमपंथियों ने हमला किया। लेकिन हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने पीड़ितों को ही गिरफ्तार कर लिया।”
Dhaka: झूठे आरोप लगाकर बना रहे निशाना
तसलीमा ने सवाल उठाया, “जेल से बाहर आने के बाद ये लोग क्या करेंगे? अपनी नौकरी खोकर, सामाजिक बहिष्कार झेलकर और अत्यधिक असुरक्षा में ये कैसे जीवित रहेंगे? क्या उन्हें भी आखिरकार देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा?”
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 19 मई को पुलिस ने सतखीरा जिले में हिंदू शिक्षक गौरांग सरकार को कथित रूप से कक्षा में दिए गए एक बयान को लेकर हिरासत में लिया। उन पर मुस्लिम धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया गया।
उसी दिन मयमनसिंह जिले के गौरीपुर उपजिला के शाओन चंद्र दास को भी एक इस्लामिक धार्मिक ग्रंथ का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से पहले कथित रूप से एक इस्लामिक समूह “तौहीदी जनता” ने गौरीपुर में विरोध मार्च निकाला और शाओन को फांसी देने की मांग की।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 19 मई को पुलिस ने सतखीरा जिले में हिंदू शिक्षक गौरांग सरकार को कथित रूप से कक्षा में दिए गए एक बयान को लेकर हिरासत में लिया। उन पर मुस्लिम धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया गया।
उसी दिन मयमनसिंह जिले के गौरीपुर उपजिला के शाओन चंद्र दास को भी एक इस्लामिक धार्मिक ग्रंथ का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से पहले कथित रूप से एक इस्लामिक समूह “तौहीदी जनता” ने गौरीपुर में विरोध मार्च निकाला और शाओन को फांसी देने की मांग की।
Dhaka: एक भयावह साजिश
इन घटनाओं की निंदा करते हुए नसरीन ने कहा कि यह केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि “एक भयावह साजिश” का हिस्सा हैं, जिसका मकसद धीरे-धीरे बांग्लादेश को हिंदू-रहित बनाना है।
उन्होंने आगे कहा कि इससे पहले रसराज दास, टिटू रॉय, उत्सव मंडल, और दीपू दास सहित कई हिंदुओं का जीवन इसी तरह के आरोपों और अफवाहों के कारण बर्बाद हुआ। उनके घर जलाए गए, मंदिर तोड़े गए, पीड़ितों को जेल भेजा गया, और कई लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या अधिकारियों ने उन लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई की है जो देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाते हैं और मॉब अटैक्स को बढ़ावा देते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि इससे पहले रसराज दास, टिटू रॉय, उत्सव मंडल, और दीपू दास सहित कई हिंदुओं का जीवन इसी तरह के आरोपों और अफवाहों के कारण बर्बाद हुआ। उनके घर जलाए गए, मंदिर तोड़े गए, पीड़ितों को जेल भेजा गया, और कई लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या अधिकारियों ने उन लोगों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई की है जो देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाते हैं और मॉब अटैक्स को बढ़ावा देते हैं।
Dhaka: हिंदू-रहित देश बनाना चाहते हैं
नसरीन ने कहा कि “ब्लास्फेमी” के आरोप अब असहमति को दबाने, अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और सामाजिक आतंक फैलाने का हथियार बन गए हैं। उन्होंने कहा, “यदि राज्य उन लोगों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाता जो बांग्लादेश को धीरे-धीरे हिंदू-रहित देश बनाना चाहते हैं, तो यह चुप्पी उन्हें और बढ़ावा देगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल स्तंभ है, लेकिन आज बांग्लादेश में यह लगभग समाप्त हो चुकी है।”
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