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केरल पर 5.07 लाख करोड़ रुपये का कर्ज, नई सरकार को मिली भारी वित्तीय चुनौती: सीएम सतीशन

केरल सरकार को मिली भारी आर्थिक चुनौती

Kerala Debt Crisis: गुरुवार को विधानसभा में पेश किए गए राज्य के वित्तीय श्वेत पत्र में खुलासा हुआ है कि केरल की नई सरकार को गंभीर आर्थिक चुनौतियां विरासत में मिली हैं। राज्य पर कुल 5.07 लाख करोड़ रुपये की देनदारियां हैं। स्थिति इतनी कठिन है कि राज्य की कुल राजस्व आय का 77 प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य खर्चों में चला जाता है, जबकि लगभग 21 प्रतिशत राजस्व केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है।

स्थिति की सच्ची तस्वीर

मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन द्वारा पेश की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका उद्देश्य अतीत की आलोचना करना नहीं, बल्कि राज्य की मौजूदा वित्तीय स्थिति और आने वाली चुनौतियों का तथ्यों के आधार पर आकलन करना है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्र से मिलने वाले फंड में कमी, जीएसटी मुआवजे और राजस्व घाटा अनुदान का बंद होना, निजी निवेश की धीमी रफ्तार और लगातार बढ़ते खर्चों ने आर्थिक संकट को और गहरा कर दिया है।

बढ़ता राजकोषीय संकट

व्हाइट पेपर में कहा गया है कि राज्य उस मूल सिद्धांत से भटक गया है, जिसके तहत विकास कार्यों के लिए कर्ज लिया जाता है और फिर विकास से होने वाली आय से उसे चुकाया जाता है। देश में सबसे अधिक राजकोषीय घाटा होने के बावजूद केरल का पूंजीगत खर्च जीएसडीपी का केवल 1.3 प्रतिशत है, जो देश में सबसे कम स्तरों में से एक है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य के खजाने की स्थिति को संभालना है। जब राजस्व आय खर्चों को पूरा नहीं कर पाती, तो राज्य को भारतीय रिजर्व बैंक की उधार व्यवस्था पर निर्भर होना पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार केरल वर्ष 2015 से लगभग हर साल ‘वेज एंड मीन्स एडवांसेज’ का सहारा लेता रहा है।

Kerala Debt Crisis:  केरल सरकार को मिली भारी आर्थिक चुनौती
केरल सरकार को मिली भारी आर्थिक चुनौती

Kerala Debt Crisis: 2025 में बिगड़े हालात

हाल के वर्षों में स्थिति और ज्यादा खराब हुई है। वर्ष 2025 में राज्य ने 262 दिनों तक वेज एंड मीन्स एडवांसेज का उपयोग किया और 84 दिनों तक ओवरड्राफ्ट की स्थिति में रहा। कोविड महामारी के दौरान भी केरल को ऐसे अस्थायी उधारों पर काफी निर्भर रहना पड़ा था। वर्ष 2020 में राज्य 234 दिनों तक और 2021 में 195 दिनों तक इस व्यवस्था का उपयोग करता रहा।

बकाया भुगतानों का दबाव

रिपोर्ट में बताया गया है कि नई सरकार को 48,733 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान की जिम्मेदारी भी मिली है। इसमें 21,670 करोड़ रुपये का लंबित महंगाई भत्ता (डीए), 14,387 करोड़ रुपये की महंगाई राहत (डीआर) और 3,431 करोड़ रुपये की वह राशि शामिल है, जो बिल डिस्काउंटिंग के माध्यम से बैंकों और ठेकेदारों को चुकानी है। रिपोर्ट के अनुसार यह राशि राज्य के एक साल के शुद्ध उधार के लगभग बराबर है।

घाटे में सरकारी कंपनियां

व्हाइट पेपर में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (पीएसई) को भी बड़ी चिंता बताया गया है। केरल में देश के सबसे अधिक सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रम हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश लगातार घाटे में चल रहे हैं। इनका कुल संचित घाटा 2021-22 में 31,571 करोड़ रुपये था, जो बढ़कर 2024-25 में 78,851 करोड़ रुपये हो गया।

रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कुल शुद्ध घाटे का 72 प्रतिशत हिस्सा केवल केएसआरटीसी, केएसएसपीएल और केरल जल प्राधिकरण से आया। इससे राज्य की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा है।

केआईआईएफबी पर चिंता

रिपोर्ट में केआईआईएफबी जैसी संस्थाओं को लेकर भी चिंता जताई गई है। हालांकि इन संस्थाओं ने राज्य में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद की है, लेकिन इनके कारण अतिरिक्त देनदारियां बढ़ी हैं और भविष्य के राजस्व पर भी दबाव पड़ा है।

राज्य का जीएसटी प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से नीचे बना हुआ है। वहीं पिछले दो वर्षों में केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता में भी भारी कमी आई है, जिससे केरल की वित्तीय चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

सुधार की राह

रिपोर्ट में आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इनमें राजस्व बढ़ाने के बेहतर उपाय अपनाना, सरकारी उपक्रमों में कार्यकुशलता बढ़ाना और उत्पादन आधारित सब्सिडी के बजाय उपभोग आधारित सहायता व्यवस्था लागू करना शामिल है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे।

यह व्हाइट पेपर ऐसे समय में आया है जब सरकार को कल्याणकारी वादों और वित्तीय सुधारों के बीच संतुलन बनाना है। साथ ही उसे उन लोगों की उम्मीदों पर भी खरा उतरना है, जिन्होंने बेहतर विकास और प्रगति की उम्मीद के साथ सरकार को जनादेश दिया है।

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