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सिर्फ 15 दिन में 3.41 लाख जल संरचनाएं, 31 करोड़ लीटर पानी का संरक्षण; महासमुंद की जल क्रांति बनी मिसाल

Water Conservation: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले ने गर्मियों की प्यास को मात देने के लिए जो किया, वो सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं थी। ये लाखों लोगों के एक साथ उठे कदमों की कहानी है। 15 दिन के अंदर जिले की तस्वीर बदल गई और पहली बारिश ने बता दिया कि मेहनत बेकार नहीं जाती।

महासमुंद में सालों से भू जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा था। खरीफ और रबी दोनों सीजन में धान की खेती के कारण पानी का दोहन बहुत बढ़ गया था। नतीजा ये कि गर्मी आते ही कई गांवों में बोरवेल 900 से 1000 फीट तक नीचे चले जाते थे। पीने के पानी के लिए भी लोगों को दिक्कत होती थी। साफ था कि अब इंतजार नहीं, काम करना होगा।

कलेक्टर ने कहा कि –

इस संकट से निपटने के लिए कलेक्टर विनय कुमार लंगेह और जिला पंचायत CEO हेमंत नंदनवार ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने “मोर गांव-मोर पानी 2.0” अभियान शुरू किया। इसका मकसद साफ था, बारिश के हर बूंद को रोकना और उसे जमीन में उतारना।

लेकिन इस बार तरीका अलग था। ये सिर्फ फाइलों और टेंडर तक सीमित नहीं रहा। दोनों अधिकारियों ने खुद गांव-गांव जाकर लोगों से बात की। छुट्टी के दिन भी मैदान में उतरे। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि पानी बचाना सरकार का नहीं, हम सबका काम है। बस फिर क्या था, पूरा जिला एक साथ खड़ा हो गया।

Water Conservation: 15 दिन में हुआ कमाल

14 मई से 30 मई तक जिले की 551 ग्राम पंचायतों के 1153 गांवों में एक साथ काम शुरू हुआ। लोगों ने अपने घरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए। खेतों और घरों के आसपास सोख्ता गड्ढे खोदे। गांव के बाहर जंगल, पहाड़ी और नालों के किनारे पानी रोकने वाली छोटी बड़ी संरचनाएं बनाई गईं।

मनरेगा, वन, कृषि, जल संसाधन और पंचायत विभाग की पहले से चल रही योजनाओं के साथ मिलाकर कुल 3 लाख 41 हजार जल संरक्षण संरचनाएं तैयार हुईं। ये 17 तरह की संरचनाएं थीं। इतनी बड़ी संख्या अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

अभियान की असली परीक्षा मानसून की पहली बारिश में हुई। और नतीजा सबके सामने था। प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक पहली ही बारिश में लगभग 31 करोड़ लीटर पानी रोक लिया गया। ये वही पानी था जो अब तक बहकर निकल जाता था। अब ये जमीन में जाएगा और आने वाले समय में भू जल स्तर को ऊपर लाएगा।

जलवीर कौन हैं?

इस कहानी के हीरो कोई एक व्यक्ति नहीं हैं। हीरो हैं महासमुंद के वो लाखों ग्रामीण जिन्होंने बिना रुके 15 दिन काम किया। हीरो हैं वो अधिकारी जिन्होंने टेबल छोड़कर खेत और गांव की मिट्टी चुनी। कलेक्टर लंगेह और CEO नंदनवार ने नेतृत्व किया, लेकिन असली ताकत बनी जनभागीदारी। महासमुंद ने दिखा दिया कि अगर इरादा पक्का हो और साथ मिलकर काम हो, तो पानी का संकट भी अवसर बन सकता है। 31 करोड़ लीटर पानी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। ये आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाई गई जिंदगी है।

REPORT BY- MANSI SHARMA

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