Bankipur By-Election: एक साल पहले तक जिस जन सुराज पार्टी का बिहार विधानसभा चुनाव में खाता तक नहीं खुल पाया था, उसी पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के गढ़ में बड़ी जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों को चौंका दिया। कभी भाजपा के रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने अपने पहले चुनाव में भाजपा की पारंपरिक सीट जीतकर बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।
2025 में मिली थी करारी हार
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 243 में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। पार्टी के 236 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे संगठन की कमजोरी और मजबूत स्थानीय नेतृत्व के अभाव से जोड़कर देखा था।
Bankipur By-Election: रणनीतिकार से नेता तक का सफर
प्रशांत किशोर ने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए चुनावी रणनीति बनाई थी। बाद में उन्होंने आई-पैक (I-PAC) की स्थापना की और कई राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीतिकार के रूप में काम किया। 2018 में वे जदयू में शामिल हुए, लेकिन सीएए-एनआरसी समेत कई मुद्दों पर मतभेद के बाद पार्टी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने ‘जन सुराज’ अभियान शुरू किया और 2024 में इसे राजनीतिक दल का रूप दिया।
बांकीपुर में कैसे बदला समीकरण?
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर खुद उम्मीदवार थे। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुशासन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। लगातार जनसंपर्क, पदयात्रा से बनी पहचान और खुद मैदान में उतरने का उन्हें सीधा लाभ मिला। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि युवाओं के बीच बढ़ती स्वीकार्यता और विकल्प की तलाश कर रहे मतदाताओं ने भी उनकी जीत में अहम भूमिका निभाई।
Bankipur By-Election: भाजपा और राजद दोनों को झटका
बांकीपुर सीट भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। यह सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई थी। उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार को पीछे छोड़ दिया, जबकि राजद प्रत्याशी भी मुकाबले में प्रभाव नहीं छोड़ सके। इसे बिहार की राजनीति में नए समीकरणों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
2026 चुनाव से पहले बढ़ा आत्मविश्वास
बांकीपुर में मिली जीत ने जन सुराज को नई राजनीतिक ऊर्जा दी है। इस जीत के बाद प्रशांत किशोर ने संकेत दिया है कि उनकी पार्टी बिहार की राजनीति में खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। हालांकि, यह देखना बाकी होगा कि उपचुनाव की यह सफलता आगामी बड़े चुनावों में कितनी प्रभावी साबित होती है।
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