POK CRISIS: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन लगातार तेज होते जा रहे हैं। महंगाई और बढ़ती बिजली दरों के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन अब राजनीतिक अधिकारों और स्वायत्तता की मांग तक पहुंच चुका है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन ने पाकिस्तान सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। प्रदर्शनकारी अब पीओके विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं और सरकार पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं।
महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन बना राजनीतिक अभियान
जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का गठन वर्ष 2023 में व्यापारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने किया था। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। 2024 और 2025 के प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को बिजली दरों में राहत और आटे पर सब्सिडी देने का फैसला करना पड़ा। इन सफलताओं के बाद संगठन का जनाधार तेजी से बढ़ा और आंदोलन राजनीतिक मुद्दों तक पहुंच गया।
POK CRISIS: 12 आरक्षित सीटें खत्म करने की मांग
प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी मांग पीओके विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करना है। ये सीटें पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। JAAC का कहना है कि जो लोग पीओके में नहीं रहते, उन्हें वहां की सरकार बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। संगठन का आरोप है कि इन सीटों का फायदा अक्सर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को मिलता है और स्थानीय मतदाताओं की राजनीतिक ताकत कमजोर पड़ जाती है।

2019 के बाद बढ़ी लोगों की नाराजगी
विशेषज्ञों का मानना है कि 2019 में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किए जाने के बाद पीओके में राजनीतिक माहौल बदलने लगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि पाकिस्तान सरकार ने उस समय कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा। इसके बाद स्थानीय समस्याओं और राजनीतिक अधिकारों को लेकर लोगों की आवाज और मुखर होती गई।
POK CRISIS: सरकारी कार्रवाई और बढ़ता तनाव
आंदोलन को रोकने के लिए पाकिस्तान सरकार ने 5 जून को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद रावलकोट और अन्य क्षेत्रों में धरना-प्रदर्शन जारी रहे। सरकार ने कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं, सड़कों पर सुरक्षा चौकियां बढ़ा दीं और आवाजाही पर निगरानी कड़ी कर दी।
30 से अधिक लोगों की मौत, हालात गंभीर
स्थानीय अधिकारियों के अनुसार जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहे पाकिस्तान के लिए अब पीओके का यह आंदोलन भी बड़ी चिंता बन गया है। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान लंबे समय तक शांत बताता रहा, वहीं अब राजनीतिक असंतोष खुलकर सड़कों पर दिखाई दे रहा है।








