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एक्सप्लेनर: सहारनपुर मस्जिद पर क्यों बढ़ा विवाद? सरकार के फैसले के पीछे की पूरी कहानी

Saharanpur Mosque: सहारनपुर मस्जिद पर बवाल क्यों? समझिए पूरा गणित

Saharanpur Mosque: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित एक पुरानी मस्जिद को हटाए जाने के बाद विवाद बढ़ गया है। शनिवार 5 सितंबर की सुबह प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मस्जिद के हिस्से को ध्वस्त किया और मलबा हटाने की कार्रवाई शुरू की। प्रशासन के मुताबिक, यह निर्माण सरकारी जमीन पर अवैध रूप से किया गया था और कार्रवाई अदालत के आदेशों के बाद की गई। वहीं मस्जिद कमेटी और विपक्षी नेताओं का दावा है कि यह मस्जिद कई दशकों पुरानी है और जमीन को वक्फ संपत्ति बताया गया है। ऐसे में सवाल है कि आखिर पूरा विवाद क्या है और प्रशासन ने मस्जिद को क्यों हटाया?

कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद को लेकर विवाद कैसे शुरू हुआ?

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी इस मस्जिद को लेकर करीब डेढ़ साल से कानूनी विवाद चल रहा था। प्रशासन का कहना था कि जिस जमीन पर मस्जिद बनी है, वह सरकारी भूमि है। इसी आधार पर मामला सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत पहुंचा। यह मामला फरवरी 2025 में की गई शिकायत के बाद सामने आया था। शिकायत में सरकारी जमीन पर कथित अवैध निर्माण का आरोप लगाया गया था। इसके बाद राजस्व विभाग की जांच और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी।

Saharanpur Mosque: अदालत ने मस्जिद को अवैध क्यों माना?

सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने विवादित जमीन को सरकारी भूमि माना और मस्जिद के निर्माण को अनधिकृत बताया। आदेश में परिसर खाली करने के साथ सरकारी जमीन के इस्तेमाल के एवज में 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति भी तय की गई। अदालत की कार्यवाही उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत हुई थी।

मस्जिद कमेटी का क्या दावा है?

मस्जिद कमेटी ने अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि यह कोई नया निर्माण नहीं है। कमेटी का दावा है कि मस्जिद कई दशकों, बल्कि उसके अनुसार करीब 150 साल पुरानी है और यहां लंबे समय से नमाज होती रही है। मस्जिद पक्ष ने जमीन को वक्फ संपत्ति बताते हुए पुराने दस्तावेजों का हवाला दिया। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी दावा किया कि मस्जिद कमेटी ने 1911 तक के रिकॉर्ड अदालत में पेश किए थे। हालांकि प्रशासन और अदालत के आदेश के अनुसार इन दावों को पर्याप्त कानूनी साक्ष्य नहीं माना गया।

Saharanpur Mosque: 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति क्यों तय हुई?

इस मामले में सिर्फ मस्जिद हटाने का आदेश ही नहीं दिया गया था। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने सरकारी जमीन के कथित अनधिकृत इस्तेमाल के लिए 6,41,65,565 रुपये की क्षतिपूर्ति भी तय की। मस्जिद कमेटी ने इस आदेश के खिलाफ जिला अदालत में अपील की। 2 सितंबर 2026 को जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को आगे बढ़ाया।

सुबह 4 बजे क्यों शुरू हुई कार्रवाई?

5 सितंबर की सुबह करीब 4 बजे कलेक्ट्रेट परिसर में प्रशासन की कार्रवाई शुरू हुई। परिसर के गेट बंद कर दिए गए और बाहरी लोगों की आवाजाही रोक दी गई। करीब 6 बजे चार बुलडोजरों की मदद से मस्जिद के हिस्से को गिराने की कार्रवाई शुरू हुई। इसके बाद मलबा नगर निगम की गाड़ियों से हटाया गया। मौके पर भारी पुलिस बल और आरआरएफ की कंपनियां तैनात थीं। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था का कारण त्योहारों का समय बताया और सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी।

Saharanpur Mosque: सहारनपुर मस्जिद पर बवाल क्यों? समझिए पूरा गणित

Saharanpur Mosque: विवाद अब राजनीतिक क्यों बन गया?

मस्जिद पर कार्रवाई के बाद विपक्षी नेताओं ने प्रशासन के कदम पर सवाल उठाए। सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर पुलिस बल तैनात किया गया। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी कार्रवाई की आलोचना की और मस्जिद की पुरानी स्थिति तथा वक्फ से जुड़े दावों का मुद्दा उठाया। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मस्जिद की उम्र, पुराने दस्तावेज और वक्फ से जुड़े सवाल उठाए। वहीं प्रशासन का कहना है कि अदालत के आदेश के बाद ही कार्रवाई की गई है।

आखिर विवाद की असली वजह क्या है?

पूरे मामले का केंद्र धार्मिक पहचान से ज्यादा जमीन के मालिकाना हक और निर्माण की वैधता का कानूनी सवाल है। प्रशासन और अदालत के आदेश के मुताबिक जमीन सरकारी है और मस्जिद का निर्माण अनधिकृत था। दूसरी तरफ मस्जिद कमेटी इसे पुरानी मस्जिद और वक्फ संपत्ति बताते हुए पुराने दस्तावेजों का हवाला देती रही है। 2 सितंबर को जिला अदालत द्वारा सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखने के बाद प्रशासन ने 5 सितंबर को कार्रवाई की। हालांकि मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेता आगे भी कानूनी रास्ता अपनाने की बात कह रहे हैं। इसलिए सहारनपुर का यह विवाद फिलहाल सिर्फ एक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन के अधिकार, पुराने दस्तावेज, वक्फ दावे और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई सवालों के कारण चर्चा में है।

 

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