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हर महीने 17 लाख टन प्याज की खपत, उत्पादन उससे कहीं ज्यादा; फिर क्यों आम आदमी को चुकाने पड़ रहे महंगे दाम?

प्याज की कीमतें क्यों बढ़ती हैं? समझें वजह

Onion Price Rise: दिल्ली, चेन्नई, भोपाल और लखनऊ समेत देश के कई बड़े शहरों में प्याज के दाम 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंच गए हैं। बढ़ती कीमतों को काबू में रखने के लिए केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सरकार ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए बड़े शहरों तक प्याज पहुंचा रही है और खुद भी कम कीमत पर प्याज बेच रही है।हर कुछ साल में प्याज की कीमतों में ऐसी तेजी देखने को मिलती है। कभी इसके दाम बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो कभी किसानों को बेहद कम कीमत पर प्याज बेचनी पड़ती है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्याज की कीमतों में बार-बार इतना बड़ा उतार-चढ़ाव क्यों आता है?

Onion Price Rise: सिर्फ प्याज की कमी वजह नहीं

आम तौर पर माना जाता है कि बाजार में किसी चीज की कमी होने पर उसके दाम बढ़ जाते हैं। प्याज के मामले में भी पहली नजर में यही वजह लगती है। लेकिन स्थिति इतनी सीधी नहीं है।केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में प्याज का उत्पादन बहुत ज्यादा कम नहीं हुआ है। साल 2024-25 में देश में करीब 307.67 लाख मीट्रिक टन यानी LMT प्याज का उत्पादन हुआ था। इस बार उत्पादन करीब 307.37 LMT रहने का अनुमान है।

वहीं, देश में सालाना प्याज की घरेलू खपत करीब 200 LMT है। यानी कागज पर देखें तो उत्पादन खपत से काफी ज्यादा है। इसके बावजूद बाजार में प्याज महंगा हो रहा है।इस पूरी स्थिति को समझने के लिए देश में होने वाली प्याज की तीन प्रमुख फसलों और उनकी सप्लाई को समझना जरूरी है।

Onion Price Rise: प्याज की तीन प्रमुख फसलें
रबी की प्याज

मार्च से मई के बीच तैयार होने वाली रबी की फसल देश के कुल प्याज उत्पादन का लगभग 70 फीसदी हिस्सा देती है। खास बात यह है कि प्याज की यही फसल करीब 4 से 5 महीने तक स्टोर की जा सकती है।

खरीफ की प्याज

खरीफ की फसल अक्टूबर से दिसंबर के बीच आती है। देश के कुल उत्पादन में इसका हिस्सा करीब 20 फीसदी है। हालांकि, इस प्याज को लंबे समय तक सुरक्षित रखना मुश्किल होता है।

लेट-खरीफ की प्याज

जनवरी से मार्च के बीच आने वाली लेट-खरीफ फसल का कुल उत्पादन में करीब 10 फीसदी योगदान है। यह सामान्य खरीफ प्याज की तुलना में थोड़ी बेहतर होती है, लेकिन इसे भी ज्यादा समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता।

Onion Price Rise: प्याज की कीमतें क्यों बढ़ती हैं? समझें वजह
प्याज की कीमतें क्यों बढ़ती हैं? समझें वजह
मांग पूरे साल, लेकिन सप्लाई असमान

भारत में बड़ी संख्या में लोगों के खाने में प्याज रोजाना इस्तेमाल होता है। देश में हर महीने लगभग 17 LMT प्याज की खपत होती है। इसे अगर 50 किलो की बोरियों में देखें तो करीब 3.4 करोड़ बोरियां हर महीने खप जाती हैं।प्याज की मांग लगभग पूरे साल बनी रहती है, लेकिन इसकी सप्लाई हर महीने एक जैसी नहीं होती।

मई-जून से लेकर अक्टूबर-नवंबर तक बाजार में प्याज की उपलब्धता काफी हद तक रबी की फसल पर निर्भर रहती है। जब तक नई खरीफ फसल बाजार में नहीं आती, तब तक रबी की प्याज का स्टॉक ही मांग पूरी करता है।इसका मतलब है कि देश की प्याज की सप्लाई का बड़ा हिस्सा एक ही फसल के स्टोरेज, उसकी गुणवत्ता और उसके सुरक्षित रहने पर निर्भर करता है।

Onion Price Rise: मौसम से लेकर स्टोरेज तक बड़ी चुनौती

प्याज की फसल के दौरान अगर भारी बारिश, सूखा या दूसरी मौसमी परेशानियां आ जाएं, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। बुवाई, रोपाई और खुदाई के समय खराब मौसम का सीधा असर प्याज की पैदावार पर पड़ता है।लेकिन अच्छी पैदावार होने के बाद भी किसानों की परेशानी खत्म नहीं होती। इसके बाद सबसे बड़ी चुनौती प्याज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की होती है।

भारत में आज भी ज्यादातर किसान प्याज के लिए आधुनिक कोल्ड स्टोरेज का इस्तेमाल नहीं करते। आमतौर पर खुले और हवादार शेड में जमीन पर प्याज के ढेर लगाए जाते हैं।लंबे समय तक इस तरह प्याज रखने से वह सड़ने और खराब होने लगती है। साथ ही प्याज का वजन भी धीरे-धीरे कम होता जाता है। अगर इस दौरान मौसम भी खराब हो जाए, तो नुकसान और बढ़ सकता है।

महाराष्ट्र में बारिश का असर

देश में करीब 40 फीसदी प्याज का उत्पादन महाराष्ट्र में होता है। वहां के किसानों का कहना है कि इस साल अप्रैल में हुई बेमौसम बारिश ने फसल को नुकसान पहुंचाया।किसानों के मुताबिक, बारिश की वजह से उत्पादन पर असर पड़ा और स्टोर की गई प्याज की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।

जमाखोरी और कालाबाजारी भी बड़ी वजह

प्याज की कीमत बढ़ने के पीछे सिर्फ उत्पादन और मौसम ही जिम्मेदार नहीं हैं। जमाखोरी और कालाबाजारी भी बाजार को प्रभावित करती है।अगस्त से नवंबर के बीच कुछ व्यापारी जानबूझकर प्याज की सप्लाई को रोक देते हैं। इसके बाद बाजार में कमी का फायदा उठाकर यही प्याज ज्यादा कीमत पर बेची जाती है।कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया की एक स्टडी में भी कीमतों के इस अंतर का पता चला था। स्टडी के मुताबिक, किसानों से 34 रुपये प्रति किलो के भाव पर खरीदी गई प्याज उपभोक्ताओं को 80 रुपये प्रति किलो तक में बेची जा रही थी।

Onion Price Rise: कीमतों का ‘कॉबवेब साइकिल’

प्याज के बाजार में एक और दिलचस्प आर्थिक सिद्धांत काम करता है, जिसे ‘कॉबवेब साइकिल’ कहा जाता है।इसमें किसान पिछली फसल की कीमतों को देखकर अगली बार यह तय करते हैं कि कितनी जमीन पर प्याज बोनी है।मान लीजिए, पिछले साल बाजार में प्याज की सप्लाई बहुत ज्यादा थी और इसकी वजह से कीमतें काफी गिर गईं। ऐसी स्थिति में किसान नुकसान से परेशान होकर अगली बार कम प्याज उगाने का फैसला कर सकते हैं।कम बुवाई का मतलब कम उत्पादन और फिर बाजार में प्याज की कमी। जब प्याज कम उपलब्ध होगी, तो कीमत तेजी से बढ़ सकती है।

इसके बाद बढ़े हुए दाम देखकर किसान अगली फसल में ज्यादा प्याज लगाने लगते हैं। लेकिन अगर ज्यादातर किसान ऐसा ही करते हैं, तो अगले सीजन में बाजार में प्याज की सप्लाई जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है और कीमतें फिर नीचे आ जाती हैं।इस तरह कम कीमत, कम उत्पादन, कमी, ज्यादा कीमत और फिर ज्यादा उत्पादन का चक्र चलता रहता है।

कब कम हो सकते हैं प्याज के दाम?

एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी मानी जाने वाली लासलगांव कृषि उपज बाजार समिति के डायरेक्टर जयदत्ता होलकर के मुताबिक, पिछले 4-5 महीनों में प्याज की कीमत करीब दोगुनी हो चुकी है।उनका कहना है कि आने वाले कुछ हफ्तों तक प्याज की कीमतों में तेजी बनी रह सकती है, क्योंकि इस समय मंडी में प्याज की आवक कम है।हालांकि, अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में खरीफ की नई प्याज बाजार में पहुंचना शुरू हो जाती है। इससे सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतों में कमी आने की संभावना रहती है। इस बार भी ऐसा होने की उम्मीद है।

उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने भी कहा है कि देश में प्याज के स्टॉक को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। आने वाले महीनों में नई प्याज बाजार में आने लगेगी, जिससे सप्लाई बढ़ने के साथ कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।

वहीं, प्याज विशेषज्ञ और नेशनल हॉर्टिकल्चरल रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (NHRDF) के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर सतीश भोंडे के अनुसार, आम तौर पर रबी की प्याज दीपावली तक बाजार में उपलब्ध रहती है और इसके बाद खरीफ की प्याज की आवक शुरू हो जाती है।हालांकि, मौजूदा खरीफ सीजन में प्याज की खेती कम होने के कारण उनका मानना है कि कीमतों में बहुत बड़ी गिरावट के बजाय केवल मामूली कमी देखने को मिल सकती है।

Onion Price Rise: सरकार ने क्या कदम उठाए?

बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड के तहत इस साल 2 LMT रबी प्याज का बफर स्टॉक तैयार करने का लक्ष्य रखा था।सरकार इस बफर स्टॉक का इस्तेमाल तब करती है, जब बाजार में प्याज के दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं। ऐसे समय में सरकारी एजेंसियों के जरिए कम कीमत पर प्याज बाजार में उतारी जाती है।लेकिन सरकार की एजेंसियां नेशनल एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी NAFED और नेशनल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी NCCF मिलकर केवल 1.21 LMT प्याज ही खरीद पाईं। यह तय लक्ष्य से करीब 40 फीसदी कम है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि सरकारी बफर स्टॉक में रखी करीब 30 फीसदी प्याज सड़ गई या खराब हो गई। सामान्य तौर पर स्टोरेज के दौरान प्याज खराब होने की दर करीब 20 फीसदी मानी जाती है। हालांकि, सरकार ने 30 फीसदी प्याज खराब होने की बात को खारिज किया है।

प्याज की कीमत और चुनावी राजनीति

प्याज का मामला सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। भारत में इसकी कीमतों का राजनीति पर भी काफी असर रहा है।पिछले पांच दशकों में कई बार प्याज की बढ़ी कीमतों ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया है। 1980 के लोकसभा चुनाव को तो इंदिरा गांधी ने ‘प्याज चुनाव’ तक कहा था। उस समय जनता पार्टी की चौधरी चरण सिंह सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी।

इसके बाद 1998 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान प्याज करीब 40-50 रुपये किलो तक पहुंच गया था। उस चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा।2013 में एक बार फिर प्याज की कीमतें करीब 100 रुपये किलो तक पहुंच गई थीं। इसके अगले साल हुए लोकसभा चुनाव में करीब 10 साल से केंद्र की सत्ता में रही कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार को हार मिली।यही वजह है कि प्याज की कीमतें किसी भी सरकार और राजनीतिक पार्टी के लिए बेहद अहम मानी जाती हैं।

Onion Price Rise: सरकार ने दो मोर्चों पर शुरू किया काम

मौजूदा स्थिति में केंद्र की बीजेपी सरकार ने प्याज की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए मुख्य रूप से दो कदम उठाए हैं।

1. सस्ती प्याज की सीधी बिक्री

दिल्ली-NCR में NAFED, NCCF और केंद्रीय भंडारों के जरिए सब्सिडी वाली प्याज बेची जा रही है। इसकी कीमत 35 रुपये प्रति किलो रखी गई है।तमिलनाडु, बिहार और उत्तर प्रदेश समेत दूसरे राज्यों के उन शहरों में भी ऐसी बिक्री शुरू की जाने वाली है, जहां प्याज की खपत ज्यादा है।

2. शुरू हुई ‘कांदा एक्सप्रेस’

सरकार ने प्याज की सप्लाई बढ़ाने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम से विशेष मालगाड़ियां चलाना शुरू किया है।इन ट्रेनों के जरिए नासिक स्थित सरकारी भंडार से प्याज देश के पांच बड़े शहरों दिल्ली, चेन्नई, मदुरै, कोच्चि और गुवाहाटी तक पहुंचाई जा रही है।28 अगस्त को ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए 453.65 टन प्याज दिल्ली पहुंचाई गई। इसके बाद 31 अगस्त को 840 टन प्याज चेन्नई पहुंची।इसके अलावा NAFED और NCCF ट्रकों के जरिए भी अलग-अलग शहरों तक करीब 1000 टन प्याज पहुंचा रहे हैं।

पिछले साल भी चला था बड़ा अभियान

प्याज की सप्लाई बनाए रखने के लिए सरकार ने पिछले साल भी मालगाड़ियों का इस्तेमाल किया था। तब 86 मालगाड़ियों के जरिए 16 शहरों में करीब 88 हजार टन प्याज भेजी गई थी।इससे पहले 2024 में सिर्फ 14 मालगाड़ियों के जरिए करीब 12 हजार टन प्याज की सप्लाई की गई थी।इससे साफ है कि प्याज की कीमतों को नियंत्रित करना सरकार के लिए सिर्फ महंगाई से जुड़ा मुद्दा नहीं है। इसमें खेती, मौसम, स्टोरेज, सप्लाई, व्यापारियों की भूमिका, किसानों के फैसले और चुनावी राजनीति सभी का असर शामिल है।

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