Delhi Building Collapse: दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को हुए बिल्डिंग हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर 7 हो गई है। यहां एक पांच मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई थी। हादसे के बाद कई लोग मलबे के नीचे दब गए। घटना का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जिसमें इमारत गिरने के बाद चारों तरफ धूल का गुबार उठता दिखाई दे रहा है।
आखिर सत्य निकेतन में इमारत गिरने के पीछे जिम्मेदारी किसकी थी? हादसे के करीब 22 घंटे बाद दिल्ली सरकार ने इस सवाल का पहला जवाब कार्रवाई के रूप में दिया है। MCD के साउथ जोन के पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। कार्रवाई की खास बात यह है कि इसमें जोन के प्रशासनिक अधिकारी से लेकर बिल्डिंग विभाग के फील्ड स्तर के अधिकारी तक शामिल हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के निर्देश के बाद हुई इस कार्रवाई ने दिल्ली में इमारतों की निगरानी और बिल्डिंग नियमों के पालन को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कौन-कौन से अधिकारी हुए सस्पेंड?
MCD कमिश्नर के आदेश पर पांच अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई है। इनमें- राकेश कुमार – डिप्टी कमिश्नर, रणवीर सिंह – सुपरिटेंडिंग इंजीनियर (SE)
ललित कुमार गोयल- एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, बिल्डिंग विभाग (EE), सुनील चौहान- असिस्टेंट इंजीनियर, बिल्डिंग विभाग (AE) और आशीष कुमार – जूनियर इंजीनियर (JE) इन अधिकारियों का निलंबन अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी होने तक जारी रहेगा। MCD विजिलेंस विभाग की ओर से अलग-अलग सस्पेंशन ऑर्डर जारी किए गए हैं।
Delhi Building Collapse: रेखा गुप्ता सरकार ने इतनी जल्दी एक्शन क्यों लिया?
हादसे के बाद सवाल सिर्फ राहत और बचाव का नहीं था। सवाल यह भी था कि क्या इमारत की स्थिति पर नजर रखने में कहीं प्रशासनिक चूक हुई? मुख्यमंत्री कार्यालय के मुताबिक, रेखा गुप्ता के निर्देश पर डिप्टी कमिश्नर, SE, EE, AE और JE को निलंबित किया गया है। इससे सरकार की ओर से यह संकेत जरूर गया है कि हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हालांकि, निलंबन अपने आप में अधिकारियों की व्यक्तिगत लापरवाही साबित नहीं करता। उनकी भूमिका और किसी संभावित चूक का अंतिम निर्धारण जांच के निष्कर्षों से ही होगा।

इन पांचों अफसरों की आखिर क्या जिम्मेदारी थी?
यह समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि कार्रवाई सिर्फ एक विभागीय स्तर पर नहीं हुई है। JE और AE आमतौर पर मौके पर निर्माण गतिविधियों की निगरानी, शुरुआती निरीक्षण और नियमों के उल्लंघन की जानकारी से जुड़े होते हैं। वहीं EE और SE के स्तर पर संबंधित क्षेत्र में बिल्डिंग संबंधी निगरानी और जरूरी कार्रवाई की जिम्मेदारी होती है। डिप्टी कमिश्नर जोन के प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण अधिकारी होते हैं। यानी पांचों अधिकारियों पर कार्रवाई से यह संकेत मिलता है कि जांच में फील्ड से लेकर प्रशासनिक स्तर तक की जिम्मेदारी को देखा जा सकता है।
Delhi Building Collapse: MCD कमिश्नर के बयान से क्यों बढ़े सवाल?
हादसे के बाद MCD कमिश्नर संजीव खिरवार ने बताया कि गिरी हुई इमारत के बगल वाली इमारत भी कमजोर हो गई है। उसे रातभर मजबूत करने का काम किया गया और अगले एक-दो दिनों में उसे योजनाबद्ध तरीके से गिराने की बात कही गई। कमिश्नर के मुताबिक, हादसे में सात लोगों की मौत हुई। अब सवाल यह है कि अगर हादसे के बाद आसपास की इमारत भी कमजोर पाई गई, तो क्या इलाके की दूसरी इमारतों की सुरक्षा स्थिति की पहले से जांच होनी चाहिए थी?
1970 के दशक की इमारत, लेकिन कभी नहीं मिला नोटिस?
इस पूरे मामले का एक और पहलू जांच के लिहाज से बेहद अहम है। MCD कमिश्नर के मुताबिक, हादसे वाली इमारत 1970 के दशक में बनी थी। प्रॉपर्टी टैक्स के रिकॉर्ड से मालिक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। बताया गया कि मालिक ने पिछले साल प्रॉपर्टी टैक्स जमा किया था और 2007 में कन्वर्जन चार्ज भी दिया था।
लेकिन कमिश्नर के मुताबिक, इमारत को कभी नोटिस नहीं दिया गया और न ही सील किया गया। इसके संबंध में कोई शिकायत मिलने की बात भी सामने नहीं आई। यही वजह है कि अब जांच का एक बड़ा सवाल यह हो सकता है कि इतने पुराने भवन की स्थिति की निगरानी कैसे की जा रही थी? हादसा सिर्फ इमारत गिरने का मामला या सिस्टम की भी परीक्षा? सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली के पुराने और जर्जर भवनों की सुरक्षा पर फिर बहस छेड़ दी है। क्या इमारत की संरचनात्मक स्थिति कमजोर थी? क्या निर्माण या मरम्मत के दौरान नियमों का उल्लंघन हुआ? क्या किसी स्तर पर निरीक्षण में चूक हुई? क्या आसपास के भवनों की भी समय रहते जांच होनी चाहिए थी? फिलहाल इन सवालों के जवाब सामने नहीं आए हैं।
Delhi Building Collapse: तो क्या 5 अफसरों का सस्पेंशन ही काफी है?
सरकार ने शुरुआती कार्रवाई जरूर कर दी है, लेकिन असली सवाल अब आगे की जांच का है। अगर जांच में अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है तो उनके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई होती है? और अगर किसी निर्माणकर्ता, मालिक या दूसरे पक्ष की भूमिका सामने आती है तो क्या उनके खिलाफ भी जिम्मेदारी तय होगी?
सत्य निकेतन से निकला सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या हर हादसे के बाद कुछ अधिकारियों का निलंबन ही समाधान है, या दिल्ली की पुरानी इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था को ही नए सिरे से जांचने की जरूरत है? यही तय करेगा कि यह कार्रवाई सिर्फ हादसे के बाद की तत्काल प्रतिक्रिया है या दिल्ली में बिल्डिंग सेफ्टी को लेकर किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।
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