High Court Reprimands Centre: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से जारी ‘पॉश’ हैंडबुक में यौन उत्पीड़न की पीड़िता की पहचान उजागर होने पर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है और सरकार भी इससे ऊपर नहीं है।
High Court Reprimands Centre: ‘आप भारत सरकार हैं, ऐसा कैसे कर सकते हैं-’
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने केंद्र सरकार के वकील से सवाल किया कि हैंडबुक में पीड़िता का नाम कैसे प्रकाशित किया गया। उन्होंने कहा कि सरकार खुद ऐसी पुस्तिका प्रकाशित और प्रसारित कर रही है, जिसमें पीड़िता की पहचान उजागर हो रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यौन अपराध का सामना करने वाली महिलाओं और किशोरियों की पहचान उजागर करना कानूनन प्रतिबंधित है और ऐसा करना दंडनीय अपराध है।
High Court Reprimands Centre: अधिकारियों के नाम लेकर आने का निर्देश-
मामले की अगली सुनवाई बुधवार को तय करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार के वकील से उन अधिकारियों के नाम बताने को कहा जो इस सामग्री के लिए जिम्मेदार हैं। दरअसल, अदालत एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि मामला अब सुलझ चुका है और इसलिए हैंडबुक से उसका नाम हटाने का निर्देश दिया जाना चाहिए।
‘शैक्षिक उद्देश्य के लिए पीड़िता का नाम जरूरी कहीं-
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि कथित घटना से जुड़े श्रम न्यायाधिकरण के आदेश को मंत्रालय की ‘पॉश’ हैंडबुक में उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया है। इसमें आरोपी के साथ-साथ पीड़ित महिला का नाम भी उजागर किया गया है। केंद्र के वकील ने बताया कि हैंडबुक नवंबर 2015 में शैक्षिक उद्देश्यों के लिए प्रकाशित की गई थी। इस पर अदालत ने सवाल किया कि शैक्षिक उद्देश्य के लिए पीड़िता का नाम बताने की जरूरत ही क्या है।
‘समझौते के बाद भी पहचान उजागर नहीं की जा सकती
अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाने के बावजूद पीड़िता की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि फैसलों में भी पीड़िता की पहचान छिपाने के लिए ‘X’ जैसे नामों का इस्तेमाल किया जाता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि पीड़िता का नाम उजागर नहीं किया जा सकता और अब ऐसा करना दंडनीय है।
‘सरकार कानून का पालन करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकती
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की पहचान सुरक्षित रखने के लिए न्यायिक निर्देश 2015 से पहले भी मौजूद थे। इसलिए अधिकारी कानून का पालन करने की अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। अदालत ने कहा कि किसी पक्ष को अदालत का रुख करने में देर हो जाने से सरकार की कानून का पालन करने की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून सभी के लिए समान है, चाहे वह आम व्यक्ति हो या सरकार।
गूगल से सामग्री हटाने की मांग-
याचिकाकर्ता ने गूगल को भी संबंधित सामग्री हटाने का निर्देश देने की मांग की है। वकील के मुताबिक, कथित घटना वर्ष 2001 की है और इन आरोपों को लेकर दिल्ली में संबंधित महिला के खिलाफ मानहानि का मामला भी दायर किया गया था। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
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