UGC IN AMIT STATEMENT: समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान ने देश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। 13 सितंबर 2026 को मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP के नेतृत्व वाले NDA के सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य है। यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तराखंड में UCC लागू हो चुका है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है और कई राज्यों में अभी ड्राफ्ट तैयार करने का काम चल रहा है।
लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि 21 राज्यों में UCC कब तक पहुंचेगा। बड़ा सवाल यह है कि अगर UCC इतना महत्वपूर्ण है तो इसे पूरे देश में एक साथ क्यों नहीं लागू किया जा रहा? केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर कानून क्यों नहीं बनाती और राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने की रणनीति के पीछे क्या सियासी और संवैधानिक गणित है?
सवाल-1: अमित शाह ने 2029 को लेकर क्या कहा?
अमित शाह ने कहा कि कई राज्यों में UCC लागू किया जा चुका है और उन्हें भरोसा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू हो जाएगा। यानी BJP के सामने अगले तीन वर्षों में उन राज्यों तक भी UCC का मॉडल पहुंचाने की चुनौती है, जहां अभी कानून बनाने की प्रक्रिया शुरुआती चरण में है। उत्तराखंड इस दिशा में सबसे आगे है। वहीं गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में UCC से जुड़े विधायी कदम उठाए जा चुके हैं। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ड्राफ्टिंग कमेटियां गठित की जा चुकी हैं, लेकिन वहां अभी विधेयक विधानसभा में पेश होने बाकी हैं।
UGC IN AMIT STATEMENT: सवाल-2: पूरे देश में एक साथ UCC लागू क्यों नहीं हो रहा?
इसका जवाब संविधान में मिलता है। संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को नागरिकों के लिए पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने की बात कहता है। लेकिन अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है। अनुच्छेद 37 के मुताबिक इन प्रावधानों को अदालतों के जरिए सीधे लागू नहीं कराया जा सकता। यानी संविधान UCC की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है, लेकिन इसे लागू करने की कोई तत्काल कानूनी बाध्यता नहीं बनाता। यहीं से केंद्र और राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सवाल-3: क्या केंद्र सरकार खुद UCC नहीं ला सकती?
ऐसा कहना सही नहीं होगा कि केंद्र सरकार UCC पर कानून बना ही नहीं सकती। असल मुद्दा यह है कि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े कई विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं। विवाह और तलाक, शिशु एवं नाबालिग, गोद लेना, वसीयत, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची की एंट्री 5 से जुड़े हैं। इन पर संसद के साथ-साथ राज्य विधानसभाओं को भी कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। यही वजह है कि UCC को लेकर राज्य अपने-अपने कानून बना सकते हैं। उत्तराखंड ने इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए राज्य स्तर पर UCC लागू किया। हालांकि, अगर पूरे देश के लिए एक समान राष्ट्रीय कानून बनाना हो तो संसद में विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके लिए राजनीतिक सहमति और सहयोगी दलों का समर्थन भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
UGC IN AMIT STATEMENT: सवाल-4: फिर BJP राज्य-दर-राज्य क्यों बढ़ रही है?
यहीं से UCC का सियासी गणित सामने आता है।NDA एक गठबंधन है और उसके सभी सहयोगी दल UCC को लेकर एक जैसी राय नहीं रखते। बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में सहयोगी दलों की स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर UCC के रास्ते को जटिल बनाती है। UCC को लेकर विरोध करने वाले नेताओं का तर्क है कि व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों से भी जुड़ा विषय है। दूसरी ओर BJP इसे लैंगिक समानता और सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून की दिशा में बड़ा कदम बताती है। ऐसे में राज्य-दर-राज्य कानून बनाना BJP के लिए एक व्यावहारिक रास्ता भी माना जा सकता है।
सवाल-5: अभी UCC कहां तक पहुंचा?
UCC की मौजूदा तस्वीर एक जैसी नहीं है। उत्तराखंड फरवरी 2024 में UCC कानून पारित करने वाला पहला राज्य बना और जनवरी 2025 से इसे लागू किया गया। गुजरात में मार्च 2026 में UCC विधेयक विधानसभा से पारित हुआ। असम ने मई 2026 में UCC विधेयक पारित किया और यह पूर्वोत्तर का पहला राज्य बना जिसने इस दिशा में विधायी कदम उठाया। मध्य प्रदेश में भी UCC को लेकर विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ी है। वहीं महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ड्राफ्टिंग कमेटियां बनाई गई हैं। इन राज्यों में अभी विधेयक पेश होना बाकी है। इसका मतलब साफ है कि अमित शाह के 21 राज्यों वाले लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी कई राज्यों को विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
UGC IN AMIT STATEMENT: सवाल-6: जनजातीय इलाकों को UCC से बाहर क्यों रखा जा रहा है?
UCC की बहस में जनजातीय समुदाय एक महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत कई जनजातीय क्षेत्रों और समुदायों को उनकी परंपराओं और स्थानीय व्यवस्थाओं के लिए विशेष संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है। असम में भी जनजातीय समुदायों और छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों को UCC के दायरे से बाहर रखने की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि UCC के नाम पर जनजातीय समुदायों की पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। हालांकि, आलोचक सवाल उठाते हैं कि अगर समान नागरिक कानून का उद्देश्य एकरूपता है तो अलग-अलग समुदायों को अलग-अलग छूट देने से इसकी परिभाषा कितनी समान रह जाती है?
सवाल-7: मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर विवाद क्यों?
UCC का सबसे बड़ा विवाद मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत कई मुस्लिम संगठन इसका विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क है कि धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के सवाल खड़े कर सकता है। दूसरी ओर UCC के समर्थकों का कहना है कि व्यक्तिगत कानूनों में लैंगिक असमानता या भेदभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए और सभी नागरिकों को समान कानूनी अधिकार मिलना चाहिए। यानी बहस सिर्फ कानून की नहीं है। इसके केंद्र में समानता, धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकार और सांस्कृतिक पहचान जैसे संवैधानिक सवाल भी हैं।
UGC IN AMIT STATEMENT: सवाल-8: क्या अलग-अलग राज्यों के UCC से ‘समान’ नागरिक संहिता का उद्देश्य कमजोर होगा?
यह UCC की सबसे दिलचस्प चुनौतियों में से एक है। अगर उत्तराखंड, गुजरात, असम या दूसरे राज्य अपने-अपने UCC में अलग-अलग प्रावधान रखते हैं, तो तकनीकी तौर पर सभी राज्यों में UCC होने के बावजूद कानून एक जैसा नहीं रह सकता। यहीं से सवाल उठता है कि क्या देश में अलग-अलग राज्य UCC बनाएंगे या भविष्य में इन सभी मॉडलों को मिलाकर कोई राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया जाएगा? अमित शाह के 2029 के लक्ष्य के बाद यह सवाल आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है।
2029 तक 21 राज्यों का लक्ष्य कितना आसान?
अमित शाह का बयान राजनीतिक रूप से एक स्पष्ट रोडमैप जरूर देता है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। पहली चुनौती है- विधायी प्रक्रिया। जिन राज्यों में अभी सिर्फ ड्राफ्टिंग कमेटियां बनी हैं, वहां पहले मसौदा तैयार होगा, फिर कैबिनेट और विधानसभा की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। दूसरी चुनौती है- संवैधानिक और कानूनी विवाद। UCC के प्रावधानों को धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों के साथ संतुलित करना होगा। तीसरी और सबसे बड़ी चुनौती है – राजनीतिक सहमति। NDA के भीतर ही UCC को लेकर अलग-अलग राय है। ऐसे में 21 राज्यों तक इसे पहुंचाना केवल BJP की चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि गठबंधन प्रबंधन की भी परीक्षा होगी।
UGC IN AMIT STATEMENT: आगे क्या?
अमित शाह के बयान से इतना साफ है कि BJP ने UCC को 2029 तक के राजनीतिक और विधायी एजेंडे में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। अब असली परीक्षा उन राज्यों की होगी जहां अभी UCC केवल ड्राफ्टिंग या चर्चा के स्तर पर है। आने वाले समय में यह भी देखना होगा कि अलग-अलग राज्यों के UCC मॉडल कितने समान होते हैं, जनजातीय और विशेष संवैधानिक क्षेत्रों के लिए क्या प्रावधान रखे जाते हैं और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर अदालतों का रुख क्या रहता है। यानी 2029 तक 21 राज्यों में UCC का लक्ष्य सिर्फ संख्या का खेल नहीं है। इसके पीछे संविधान, संघीय ढांचे, गठबंधन की राजनीति और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा भी छिपी है।








