Rishi Panchami: भारत को प्राचीन समय से ही ऋषि-मुनियों की तपोभूमि माना जाता है। हिंदू धर्म में संतों और ऋषियों को देवताओं के समान सम्मान दिया जाता है। इन्हीं महान सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी मनाई जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज यानी 15 सितंबर, मंगलवार को ऋषि पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन सात महान ऋषियों के सम्मान के साथ आध्यात्मिक शुद्धि से भी जुड़ा है। इस दिन विशेष रूप से महिलाओं के व्रत रखने की परंपरा है।
Rishi Panchami: विधि-विधान से की जाती है पूजा
ऋषि पंचमी के व्रत में सप्तऋषियों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन नियमों का पालन करते हैं और अगले दिन व्रत खोलते हैं। आइए जानते हैं कि ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों की पूजा क्यों की जाती है, इसका धार्मिक महत्व क्या है और इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं क्या कहती हैं।
सप्तऋषियों की पूजा क्यों होती है?
ऋषि पंचमी का दिन देवी-देवताओं के साथ ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने की विशेष परंपरा है। इसे अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगने और ऋषियों के प्रति आभार जताने का दिन भी माना जाता है।ऋषि पंचमी पर मुख्य रूप से वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगने के उद्देश्य से यह व्रत किया जाता है। मान्यता है कि सप्तऋषियों की पूजा करने से दोष दूर होते हैं और ऋषियों के साथ देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है।
Rishi Panchami: सप्तऋषियों से जुड़ी पौराणिक कथा
एक राज्य में सुमित्र नाम का किसान अपनी पत्नी जयश्री के साथ रहता था। जयश्री बहुत पतिव्रता महिला थी। एक दिन उसने कुछ ऋषियों को भोजन के लिए अपने घर बुलाया। उसी दिन उसे मासिक धर्म शुरू हो गया। इस कारण वह काफी परेशान हो गई।उसने अपनी पड़ोसन की सलाह ली और सात बार स्नान किया तथा सात बार कपड़े बदले। इसके बाद उसने ऋषियों के लिए भोजन तैयार किया। जब ऋषि भोजन करने के लिए पहुंचे, तो उन्हें पता चल गया कि भोजन ऐसी स्थिति में तैयार किया गया है, जिसे उस समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अशुद्ध माना जाता था।इस बात से नाराज होकर ऋषियों ने सुमित्र और जयश्री को अगले जन्म में बैल और कुतिया के रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। इसके बाद दोनों उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के घर इन रूपों में रहने लगे।

व्रत से मिली माता-पिता को मुक्ति
अपने माता-पिता को इस स्थिति से मुक्त कराने के लिए सुचित्र ने ऋषियों से इसका कारण पूछा। तब ऋषियों ने उसे बताया कि इस जीवन से मुक्ति पाने के लिए क्या करना होगा। उन्होंने ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा और व्रत करने का विधान बताया।इसके बाद सुचित्र ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर विधि-विधान से ऋषि पंचमी का व्रत और पूजन किया। इस व्रत से प्राप्त पुण्य उसने अपने माता-पिता को समर्पित कर दिया। इसके बाद उसके माता-पिता को उस योनि से मुक्ति मिली और वे दोबारा मनुष्य योनि में जन्म लेने में सक्षम हुए।इसी मान्यता के आधार पर आज भी ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इस व्रत से मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा प्राप्त होती है और सप्तऋषियों का आशीर्वाद मिलता है।
Rishi Panchami: ब्रह्मांड पुराण में भी मिलता है उल्लेख
ऋषि पंचमी के महत्व से जुड़ी एक अन्य कथा का वर्णन ब्रह्मांड पुराण में भी मिलता है। इसके अनुसार, प्राचीन समय में विदर्भ देश में सुमति नाम का एक धर्मनिष्ठ राजा शासन करता था। वह अपनी प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करता था।उसके राज्य में सुधर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुषीला और पुत्री का नाम सुमति था। सुमति का विवाह एक योग्य ब्राह्मण से हुआ, लेकिन विवाह के कुछ समय बाद ही उसके पति की मृत्यु हो गई।

पति की मृत्यु के बाद सुमति ने विधवा आश्रम में साध्वी का जीवन अपनाया और धर्म के अनुसार अपना जीवन बिताने लगी। एक दिन उसे अचानक तेज शारीरिक पीड़ा होने लगी। उसकी मां सुषीला उसे लेकर एक संत के पास गईं।संत ने ध्यान के माध्यम से उसकी परेशानी का कारण जाना। उन्होंने बताया कि पिछले जन्म में सुमति ने मासिक धर्म के दौरान अज्ञानता के कारण रसोई में काम किया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी कारण उस पर शारीरिक अशुद्धता का दोष लगा, जिसका परिणाम उसे इस जन्म में शारीरिक पीड़ा के रूप में भुगतना पड़ रहा था।संत ने बताया कि इस दोष से मुक्ति पाने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सप्तऋषियों की विधिपूर्वक पूजा, व्रत, स्नान और निर्धारित नियमों का पालन करने से इस दोष से मुक्ति मिल सकती है। यह व्रत मुख्य रूप से महिलाओं के लिए किया जाता है।
Rishi Panchami: कौन हैं सप्तऋषि?
सप्तऋषि उन सात महान ऋषियों को कहा जाता है, जिन्हें वैदिक ज्ञान, आध्यात्मिक परंपरा और धार्मिक अधिकार का प्रतीक माना जाता है। विष्णु पुराण में भी इन सात ऋषियों के नाम बताए गए हैं। ऋषि पराशर ने सप्तऋषियों का उल्लेख करते हुए लिखा है:
वशिष्ठ-कश्यपो-अत्रि-जमदग्नि-स-गौतमः,
विश्वामित्र-भरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽभवन्।
इसका अर्थ है कि वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज सप्तऋषि हैं।धार्मिक मान्यता के अनुसार, ये सात ऋषि आध्यात्मिक प्रकाश की सात किरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। माना जाता है कि ये किरणें सृष्टि को बनाए रखने और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।इसी कारण ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि इस दिन पूजा और व्रत करने वाली महिलाओं को ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके दोष दूर होते हैं।
Disclaimer: इस लेख में बताए गए उपाय, लाभ, सलाह और कथन केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं।








