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गिरफ्तारियां बढ़ीं, ड्रग्स फिर भी नहीं रुका! पंजाब में 3 CM और 5 डेडलाइन के बाद भी क्यों कायम है नशे का कारोबार?

क्यों नही खत्म हो रही ड्रग्स का खेल

DRUGS FREE INDIA: पंजाब में नशे की समस्या सिर्फ तस्करी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सीमा पार से आने वाली खेप, ड्रोन नेटवर्क, स्थानीय स्तर पर मददगारों का कथित गठजोड़, ड्रग मनी और नशे के आदी लोगों का बढ़ता दायरा बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। ऐसे में सवाल है कि लगातार गिरफ्तारियों और सख्त कार्रवाई के बावजूद पंजाब से ड्रग्स का कारोबार खत्म क्यों नहीं हो पा रहा?

अमित शाह की 2029 डेडलाइन ने फिर खड़ा किया बड़ा सवाल

30 सितंबर 2026 को जालंधर में ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ के समापन कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब को ड्रग्स से मुक्त करने का लक्ष्य सामने रखा। उन्होंने कहा कि अगर पंजाब में बीजेपी की सरकार बनती है तो 31 दिसंबर 2029 तक राज्य से चिट्टे का कारोबार खत्म कर दिया जाएगा। अमित शाह ने इस दौरान आम आदमी पार्टी सरकार पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि जो खुद नशा करता है, वह पंजाब को नशामुक्त नहीं कर सकता।

इसी दिन पंजाब पुलिस की एसआईटी ने अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया और बर्खास्त पुलिस अधिकारी जगदीश भोला को कथित सिंथेटिक ड्रग्स मामले में पूछताछ के लिए समन किया। इससे एक बार फिर पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप दोनों चर्चा में आ गए।

DRUGS FREE INDIA: समस्या कितनी बड़ी है?

पंजाब में ड्रग्स की समस्या का अंदाजा अलग-अलग सरकारी और अध्ययन रिपोर्टों के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। संसदीय समिति के हवाले से राज्य में लाखों लोगों के किसी न किसी रूप में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से प्रभावित होने की बात सामने आई है। इनमें गांजा, अफीम आधारित ड्रग्स और नशीली गोलियों का इस्तेमाल करने वाले लोग शामिल हैं। AIIMS के पंजाब ओपिओइड डिपेंडेंस सर्वे में भी अफीम आधारित ड्रग्स पर निर्भर लोगों की बड़ी संख्या सामने आई थी। इनमें हेरोइन का इस्तेमाल प्रमुख रूप से दर्ज किया गया। यानी समस्या केवल सीमा से आने वाली खेप रोकने की नहीं है। इसके साथ नशे की मांग, इलाज और पुनर्वास भी उतना ही बड़ा मुद्दा है।ॉ

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DRUGS FREE INDIA: पंजाब में हेरोइन की जब्ती क्यों चिंता बढ़ाती है?

पंजाब की भौगोलिक स्थिति इसे ड्रग्स तस्करी के लिहाज से बेहद संवेदनशील बनाती है। पाकिस्तान से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा के कारण सीमा पार से नशीले पदार्थों की तस्करी लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की चुनौती रही है। NCB के आंकड़ों के मुताबिक 2025 में देश में हजारों किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई और पंजाब की हिस्सेदारी इसमें काफी बड़ी रही। यही वजह है कि पंजाब की ड्रग्स समस्या को सिर्फ राज्य के भीतर सक्रिय तस्करी नेटवर्क के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। सीमा, स्थानीय नेटवर्क और देश के दूसरे हिस्सों में सप्लाई- इन तीनों कड़ियों को तोड़ना चुनौती का बड़ा हिस्सा है।

₹95 हजार करोड़ के ड्रग मनी का दावा कितना बड़ा है?

पंजाब में ड्रग्स कारोबार की चर्चा केवल जब्त होने वाली खेप तक सीमित नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय के पूर्व अधिकारी निरंजन सिंह के हवाले से करीब 95 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के ड्रग मनी सर्कुलेशन का दावा किया गया है। यह आंकड़ा एक पूर्व अधिकारी द्वारा अलग-अलग अध्ययनों के आधार पर बताया गया है, इसलिए इसे आधिकारिक तौर पर प्रमाणित कारोबार का आंकड़ा मानने के बजाय उनके दावे के रूप में देखना जरूरी है। निरंजन सिंह ने समस्या में केवल तस्करों की भूमिका नहीं, बल्कि कथित ‘प्रोटेक्टर’ और ‘कोलैबोरेटर’ की मौजूदगी की ओर भी इशारा किया है। यही पहलू बताता है कि अगर ड्रग्स नेटवर्क में पैसा, स्थानीय मदद और प्रभावशाली लोगों की कथित भूमिका जुड़ जाए, तो केवल छोटे-बड़े तस्करों की गिरफ्तारी से पूरे नेटवर्क को खत्म करना आसान नहीं होता।

DRUGS FREE INDIA: तीन CM, पांच डेडलाइन और एक ही सवाल

पंजाब में नशे के खिलाफ राजनीतिक वादे नए नहीं हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2015 में चार सप्ताह में नशे की कमर तोड़ने का वादा किया था। 2017 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद भी ड्रग्स पंजाब की बड़ी समस्या बना रहा। इसके बाद भगवंत मान सरकार ने भी अलग-अलग मौकों पर नशे के खिलाफ समयबद्ध लक्ष्य घोषित किए। 2022 में सरकार बनने के बाद जल्द कार्रवाई का दावा किया गया। इसके बाद 2023, 2024 और 2025 में भी अलग-अलग समयसीमाएं सामने आईं। अब अमित शाह ने 31 दिसंबर 2029 की नई डेडलाइन सामने रखी है। यानी राजनीतिक नेतृत्व बदलता रहा, अभियान और समयसीमाएं बदलती रहीं, लेकिन मूल सवाल आज भी वही है- क्या केवल समयसीमा तय करने से ड्रग्स का नेटवर्क खत्म हो सकता है?

असली चुनौती सीमा से ज्यादा नेटवर्क की है?

पंजाब में ड्रग्स नेटवर्क का एक अहम हिस्सा सीमा पार से जुड़ा है, लेकिन इसकी पूरी तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। मार्च 2026 में तरनतारन में एक सरपंच की कथित तौर पर हेरोइन के साथ गिरफ्तारी ने यह सवाल उठाया कि क्या स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी संभालने वाले कुछ लोग भी तस्करी नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं। अमृतसर में एक परिवार के तीन लोगों की गिरफ्तारी और सीमा के पास बागान से कथित तौर पर ड्रग्स की खेप इकट्ठा करने का मामला भी इसी चुनौती की ओर इशारा करता है। इन मामलों को पूरे सिस्टम का प्रतिनिधि मानना सही नहीं होगा, लेकिन ये जांच एजेंसियों के सामने मौजूद एक अहम जोखिम जरूर दिखाते हैं—स्थानीय स्तर पर नेटवर्क को मदद मिलने की संभावना।

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DRUGS FREE INDIA: ड्रोन ने बढ़ाई सीमा सुरक्षा की मुश्किल

पंजाब-पाकिस्तान सीमा पर ड्रोन के जरिए ड्रग्स गिराए जाने के मामले सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ड्रोन के जरिए सीमा पार से छोटी-छोटी खेप भेजना पारंपरिक तस्करी के मुकाबले अलग तरह की चुनौती पैदा करता है। सुरक्षा एजेंसियों को ड्रोन का पता लगाने, उसे गिराने और उसके जरिए पहुंचाई गई खेप को बरामद करने के साथ यह भी पता लगाना होता है कि जमीन पर उस खेप को कौन रिसीव कर रहा है। यही वजह है कि सीमा पर ड्रोन पकड़ना कार्रवाई का सिर्फ एक हिस्सा है। असली चुनौती उस नेटवर्क तक पहुंचना है जो ड्रोन से पहुंची खेप को आगे सप्लाई करता है।

हजारों गिरफ्तारियां, फिर भी क्यों नहीं खत्म हुआ कारोबार?

पंजाब सरकार की ओर से ड्रग्स के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई के आंकड़े सामने रखे जाते रहे हैं। हजारों एफआईआर, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां, संपत्ति जब्ती और नशीले पदार्थों की बरामदगी इसका हिस्सा हैं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। जब्ती बढ़ना हमेशा यह साबित नहीं करता कि नशे की समस्या कम हो रही है। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि पुलिस और एजेंसियां ज्यादा प्रभावी ढंग से खेप पकड़ रही हैं या सप्लाई नेटवर्क पहले की तुलना में बड़ा है। इसी तरह बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां यह नहीं बतातीं कि नशे की मांग कम हो गई है। जब तक नशे की मांग, इलाज, पुनर्वास और रोजगार जैसे सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर समानांतर काम नहीं होगा, तब तक केवल सप्लाई रोकने की कार्रवाई का असर सीमित रह सकता है।

DRUGS FREE INDIA: नशामुक्ति का दूसरा पहलू भी समझना होगा

पंजाब में सरकारी डी-एडिक्शन सेंटरों में भर्ती होने वालों की संख्या बढ़ना एक तरफ चिंता का संकेत है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी दिखाता है कि ज्यादा लोग इलाज की व्यवस्था तक पहुंच रहे हैं। NDPS मामलों में सजा और इलाज के बीच भी कानून अलग-अलग रास्ते उपलब्ध कराता है। नशे के आदी लोगों को केवल अपराधी मानकर जेल भेजना और उन्हें उपचार से दूर रखना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। यही कारण है कि पंजाब की ड्रग्स समस्या को तीन स्तरों पर देखना जरूरी है—सप्लाई रोकना, नशे की मांग कम करना और नशे की गिरफ्त में आए लोगों का पुनर्वास।

2029 तक नशामुक्त पंजाब की राह कितनी कठिन?

अमित शाह की 31 दिसंबर 2029 की डेडलाइन ने पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ राजनीतिक बहस को फिर तेज कर दिया है। लेकिन इस लक्ष्य की सफलता केवल गिरफ्तारियों की संख्या से तय नहीं होगी। सीमा पार से आने वाली खेप रोकना, ड्रोन नेटवर्क तोड़ना, ड्रग मनी पर कार्रवाई करना, कथित स्थानीय मददगारों तक पहुंचना, बड़े नेटवर्क के वित्तीय स्रोतों को खत्म करना और नशे के आदी लोगों को प्रभावी इलाज उपलब्ध कराना- इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। पंजाब में पिछले वर्षों के अनुभव से एक बात साफ है कि ड्रग्स की समस्या किसी एक सरकार, एक पार्टी या एक अभियान से खत्म होने वाली चुनौती नहीं है। तीन मुख्यमंत्रियों के अलग-अलग वादों और कई समयसीमाओं के बाद अब 2029 की नई डेडलाइन सामने है। असली परीक्षा इस बात की होगी कि इस बार कार्रवाई केवल गिरफ्तारियों और बरामदगी के आंकड़ों तक सीमित रहती है या फिर उस पूरे नेटवर्क पर चोट होती है, जो सीमा पार से लेकर स्थानीय स्तर और ड्रग मनी तक फैला हुआ है।

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