Home » एक्सप्लनेर » महंगाई घटाने के लिए क्यों बढ़ती है आपकी EMI? समझिए RBI का पूरा खेल

महंगाई घटाने के लिए क्यों बढ़ती है आपकी EMI? समझिए RBI का पूरा खेल

रेपो रेट बढ़ने से क्यों महंगी होती है EMI?
रेपो रेट बढ़ने से क्यों महंगी होती है EMI?

Repo Rate EMI: अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि अगर महंगाई कम करनी है, तो इसका असर उनकी जेब पर बढ़ी हुई EMI के रूप में क्यों पड़ता है? दरअसल, जब महंगाई रिजर्व बैंक के तय लक्ष्य और टोलरेंस बैंड से बाहर जाने लगती है, तो उसे नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का असर आम आदमी पर भी पड़ता है। इसका एक प्रमुख असर बढ़ी हुई EMI के रूप में दिखाई देता है। आखिर महंगाई, रेपो रेट और EMI एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं, इसे आसान भाषा में समझते हैं।

Repo Rate EMI: महंगाई आखिर क्या होती है?

आमतौर पर हम महंगाई को चीजों और सेवाओं की बढ़ती कीमतों से जोड़कर देखते हैं। यानी पहले जिस सामान के लिए कम पैसे देने पड़ते थे, अब उसी के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन महंगाई का एक दूसरा पहलू भी है। इसका मतलब यह भी है कि आपकी मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो रही है।उदाहरण के लिए, अगर पहले आपके 100 रुपये से जितना सामान खरीदा जा सकता था, उतना अब नहीं खरीदा जा रहा है, तो इसका अर्थ है कि रुपये की वास्तविक क्रय शक्ति घट गई है। इसी वजह से रोजमर्रा की चीजें महंगी महसूस होने लगती हैं, क्योंकि समान रकम में पहले की तुलना में कम सामान खरीदा जा सकता है।

डिमांड और सप्लाई से बढ़ती है महंगाई

महंगाई बढ़ने के पीछे अर्थव्यवस्था का बुनियादी डिमांड और सप्लाई का नियम काम करता है। जब किसी वस्तु या सेवा की मांग बढ़ जाती है, लेकिन उसकी आपूर्ति उस अनुपात में नहीं बढ़ती, तो उसकी कीमत ऊपर जाने लगती है।मान लीजिए आप पहले 40 रुपये किलो के हिसाब से चीनी खरीदते थे। किसी वजह से गन्ने की मांग बढ़ गई और इसके कारण चीनी का उत्पादन कम हो गया। अब बाजार में चीनी की उपलब्धता कम है, लेकिन उसकी मांग बनी हुई है। ऐसे में खरीदार ज्यादा कीमत देने के लिए तैयार हो सकते हैं और चीनी महंगी हो सकती है।महंगाई केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करती। उत्पादन की लागत, सप्लाई चेन, टैक्स और दूसरी कई चीजें मिलकर तय करती हैं कि कोई सामान ग्राहक तक पहुंचने के बाद कितने रुपये में मिलेगा।

Repo Rate EMI: महंगाई और रेपो रेट का क्या संबंध है?

महंगाई बढ़ने की एक वजह अर्थव्यवस्था में जरूरत से ज्यादा नकदी या लिक्विडिटी होना भी हो सकती है। जब बाजार में पर्याप्त या जरूरत से ज्यादा पैसा मौजूद होता है, तो लोग अपेक्षाकृत महंगी चीजें खरीदने में भी सक्षम होते हैं। कम कैपिटल कॉस्ट की वजह से खर्च और मांग बढ़ सकती है।इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक रेपो रेट यानी नीतिगत ब्याज दर को बढ़ा सकता है। रेपो रेट बढ़ने का असर बैंकों से लेकर आम लोगों तक कर्ज की लागत पर पड़ता है। यानी पैसा उधार लेना महंगा हो जाता है और पूंजी की उपलब्धता सीमित होने लगती है।आसान शब्दों में समझें तो अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कर्ज के सहारे चलता है। जब कर्ज महंगा होता है, तो लोग और कंपनियां कम उधार लेती हैं। इससे अर्थव्यवस्था में पैसे का प्रवाह कम होता है और रुपये की सप्लाई पर भी असर पड़ता है।

Repo Rate EMI: रेपो रेट बढ़ने से क्यों महंगी होती है EMI?
रेपो रेट बढ़ने से क्यों महंगी होती है EMI?
रेपो रेट बढ़ाकर महंगाई कैसे घटाई जाती है?

अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन पर चलती है। रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति के जरिए इस संतुलन को बनाए रखने की कोशिश करता है। हर वस्तु की कीमत सीधे तय करने के बजाय रिजर्व बैंक मुद्रा और पूंजी के प्रवाह को नियंत्रित करता है।जब महंगाई बढ़ती है, तो यह संकेत हो सकता है कि अर्थव्यवस्था में पैसे या पूंजी की उपलब्धता मांग की तुलना में ज्यादा है। ऐसे में रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाकर कर्ज को महंगा करता है। इससे बाजार में पैसे का प्रवाह कम करने में मदद मिलती है और मांग पर दबाव आता है। इस तरह महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है।

Repo Rate EMI: आलू और रुपये से समझिए पूरा खेल

इसे एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए एक किसान ने आलू की फसल उगाई है और वह उसे बेचकर रुपये कमाना चाहता है। वह बाजार में पहुंचता है, जहां कई लोग उसके आलू खरीदना चाहते हैं। ऐसे में वह सबसे ज्यादा कीमत देने वाले खरीदार को अपनी फसल बेच सकता है।अब मान लीजिए किसान अगली बार बाजार जाता है और वहां उसे उतने खरीदार नहीं मिलते। खरीदार कम होने के कारण उसे अपने आलू की कीमत कम करनी पड़ती है।इस उदाहरण में आलू की सप्लाई पहले जितनी ही रही, लेकिन रुपये की सप्लाई कम हो गई। इसका नतीजा यह हुआ कि आलू की तुलना में रुपये की क्रय शक्ति बढ़ गई।

CPI से कैसे मापी जाती है महंगाई?

CPI यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स को आसान भाषा में आम लोगों के इस्तेमाल की वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाले बदलाव को मापने का पैमाना कहा जा सकता है।इसमें खाने-पीने की चीजों के साथ कपड़े, घर, ईंधन और अलग-अलग सेवाओं जैसी चीजें शामिल होती हैं। जब CPI आधारित महंगाई बढ़ती है, तो इसका अर्थ है कि एक सामान्य उपभोक्ता बास्केट की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं।इसी को रिटेल इन्फ्लेशन यानी खुदरा महंगाई कहा जाता है और रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC इसी पर खास तौर पर नजर रखती है।

Repo Rate EMI: RBI का महंगाई को लेकर क्या लक्ष्य है?

भारत में रिजर्व बैंक का मीडियम टर्म इन्फ्लेशन टार्गेट 4% है। इसके लिए 2% से 6% तक का टोलरेंस बैंड तय किया गया है।अगस्त 2026 में रिटेल इन्फ्लेशन बढ़कर 4.82% हो गया। यानी महंगाई रिजर्व बैंक के 4% के लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई है। हालांकि, यह अभी 6% की ऊपरी टोलरेंस सीमा के अंदर है।इसका मतलब है कि महंगाई उस स्तर तक पहुंच चुकी है, जहां रिजर्व बैंक इसके प्रति सतर्क हो सकता है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक पॉलिसी रेट में बदलाव के जरिए आने वाले समय में महंगाई को और बढ़ने से रोकने के लिए कदम उठा सकता है।

अभी क्यों हो रही है इसकी चर्चा?

फिलहाल देश में खुदरा महंगाई यानी CPI रिजर्व बैंक के 4% के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। इसी बीच 5 से 7 अक्टूबर के बीच रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक चल रही है।7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक की MPC रेपो रेट को लेकर अपना फैसला सुनाएगी। चूंकि महंगाई लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई है, इसलिए ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि वैश्विक परिस्थितियों में भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दर यानी रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर सकता है।अगर रेपो रेट बढ़ता है, तो इसका असर कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। ऐसे में होम लोन, पर्सनल लोन या दूसरे कर्ज की EMI बढ़ सकती है। यही वजह है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का असर सीधे आम आदमी की जेब पर भी दिखाई दे सकता है।

ये भी पढ़ें…कानपुर में एल्विश यादव के शो में हंगामा, सेल्फी के लिए स्टेज पर पहुंचा फैन, बाउंसर ने दिया धक्का