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नर्मदा के बाद अब ‘सनातन’ की राह पर दिग्विजय सिंह, क्या MP से UP तक दिखेगा यात्रा का असर?

दिग्विजय सिंह की सनातन यात्रा
दिग्विजय सिंह की सनातन यात्रा

Sanatan Swabhiman Padyatra: मध्य प्रदेश की राजनीति में एक और लंबी पदयात्रा की तैयारी हो रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह 20 अक्टूबर यानी विजयादशमी के दिन ‘सनातन स्वाभिमान यात्रा’ शुरू करने जा रहे हैं। यह यात्रा उज्जैन से शुरू होकर उत्तर प्रदेश के रास्ते अयोध्या तक जाएगी। मौजूदा रिपोर्टों में यात्रा की दूरी करीब 930 से 950 किलोमीटर बताई जा रही है।दिग्विजय सिंह इसे राजनीतिक यात्रा नहीं बता रहे हैं। उनके मुताबिक इसका मकसद धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की मांग करना है। हालांकि, उनकी राजनीति को करीब से देखने वालों के लिए इस यात्रा की तुलना 2017-18 की नर्मदा परिक्रमा से होना स्वाभाविक है।

Sanatan Swabhiman Padyatra: नर्मदा परिक्रमा से हो रही तुलना

दिग्विजय सिंह ने 2017 में करीब 3,300 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा शुरू की थी। उस समय उन्होंने इसे आध्यात्मिक और गैर-राजनीतिक यात्रा बताया था। हालांकि, यात्रा के अलग-अलग चरणों में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भी उनके साथ जुड़े थे, जिसके चलते इसका राजनीतिक असर भी चर्चा में रहा।2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 15 साल के बीजेपी शासन के बाद सरकार बनाई थी। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि कांग्रेस की जीत केवल नर्मदा परिक्रमा की वजह से हुई। चुनावी नतीजों के पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक कारण थे।अब सवाल यह है कि क्या दिग्विजय सिंह एक बार फिर लंबी पदयात्रा के जरिए लोगों के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या इस यात्रा का प्रभाव केवल मध्य प्रदेश तक सीमित रहेगा या अयोध्या पहुंचने के बाद उत्तर प्रदेश में भी इसकी राजनीतिक चर्चा बढ़ेगी?

‘सनातन’ के नाम से यात्रा क्यों अहम?

इस यात्रा के नाम को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका नाम ‘सनातन स्वाभिमान यात्रा’ रखा गया है। दिग्विजय सिंह का कहना है कि यह यात्रा धर्म के नाम पर होने वाले कथित शोषण और आस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता के लिए आवाज उठाने के उद्देश्य से है। उन्होंने राम मंदिर के लिए मिले चंदे और चढ़ावे के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए हैं। ये दिग्विजय सिंह के आरोप हैं और इन्हें किसी न्यायिक निष्कर्ष के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।भारतीय राजनीति में ‘सनातन’, ‘हिंदू’, ‘राम’ और धार्मिक आस्था जैसे मुद्दे पहले से ही महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का ‘सनातन स्वाभिमान’ के नाम से उज्जैन से अयोध्या तक पैदल यात्रा करना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है।

Sanatan Swabhiman Padyatra: दिग्विजय सिंह की सनातन यात्रा
दिग्विजय सिंह की सनातन यात्रा
Sanatan Swabhiman Padyatra: मध्य प्रदेश में कितना असर?

मध्य प्रदेश में इस यात्रा का एक बड़ा पहलू जनसंपर्क और कांग्रेस संगठन से जुड़ा हो सकता है। प्रस्तावित रास्ते में उज्जैन, आगर-मालवा, शाजापुर, राजगढ़, गुना, टीकमगढ़ और ओरछा जैसे इलाके शामिल बताए जा रहे हैं। ऐसे में यात्रा के दौरान दिग्विजय सिंह को स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों से सीधे संवाद करने का मौका मिलेगा।लंबी पदयात्राओं का महत्व केवल लोगों की भीड़ जुटाने तक सीमित नहीं होता। ऐसी यात्राओं के दौरान नेता गांव, पंचायत और स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं से मिल सकते हैं। साथ ही स्थानीय समस्याओं को सुनने और पुराने राजनीतिक संपर्कों को फिर सक्रिय करने का अवसर भी मिलता है।इसी नजरिए से देखें तो यह यात्रा कांग्रेस के जमीनी संगठन को समझने और अपनी राजनीतिक सक्रियता दिखाने का माध्यम भी बन सकती है।

नर्मदा यात्रा और इस यात्रा में बड़ा अंतर

दोनों यात्राओं के बीच सबसे बड़ा अंतर समय और दूरी का है। 2017 में दिग्विजय सिंह 70 वर्ष के थे और उन्होंने लगभग 3,300 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा पूरी की थी। यह यात्रा करीब 6 महीने चली थी।उस दौरान उन्हें मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय तक रहने और लोगों से सीधे संपर्क करने का मौका मिला। कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता भी यात्रा के अलग-अलग हिस्सों में उनके साथ जुड़े थे।

अब 79 वर्ष की उम्र में दिग्विजय सिंह करीब 950 किलोमीटर की नई यात्रा की तैयारी कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यात्रा से पहले वह रोज करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर अभ्यास कर रहे हैं। प्रस्तावित यात्रा के दौरान रोज लगभग 15 किलोमीटर पैदल चलने की योजना है।दूरी के लिहाज से यह यात्रा नर्मदा परिक्रमा से काफी छोटी है, लेकिन इसके बावजूद इतनी लंबी पदयात्रा एक बड़ी चुनौती होगी। इस बार यात्रा का राजनीतिक संदेश भी अलग नजर आ सकता है, क्योंकि इसके साथ राम मंदिर के चंदे और चढ़ावे से जुड़े सवाल भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में बीजेपी और अन्य राजनीतिक दल इस यात्रा को अपने-अपने राजनीतिक नजरिए से देख सकते हैं।

दिग्विजय सिंह की 950 किमी पदयात्रा
दिग्विजय सिंह की 950 किमी पदयात्रा
Sanatan Swabhiman Padyatra: अयोध्या पहुंचने के बाद क्या होगा?

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव अयोध्या होगा। मध्य प्रदेश से निकलकर जब यात्रा उत्तर प्रदेश में प्रवेश करेगी तो इसकी राजनीतिक और मीडिया चर्चा बढ़ने की संभावना है। खासतौर पर अयोध्या पहुंचने के दौरान राम मंदिर और ‘सनातन’ से जुड़े मुद्दे फिर चर्चा में आ सकते हैं।हालांकि, उत्तर प्रदेश की राजनीति मध्य प्रदेश से काफी अलग है। यहां जातीय समीकरण, क्षेत्रीय दलों की भूमिका, बीजेपी का मजबूत संगठन और कांग्रेस की सीमित राजनीतिक मौजूदगी जैसे कई पहलू किसी भी राजनीतिक यात्रा के प्रभाव को तय करते हैं।इसलिए केवल अयोध्या तक पदयात्रा करने से उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आएगा, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।

क्या नर्मदा यात्रा जैसा असर दिखेगा?

नर्मदा परिक्रमा के दौरान दिग्विजय सिंह को लंबे समय तक जनता के बीच रहने, लोगों से संपर्क बढ़ाने और कांग्रेस संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करने का अवसर मिला था। 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले इस यात्रा के राजनीतिक महत्व पर भी चर्चा हुई थी।लेकिन 2026 की परिस्थितियां 2017-18 से अलग हैं। इस बार यात्रा की दूरी कम है, इसका गंतव्य अयोध्या है और ‘सनातन’ के साथ राम मंदिर के चंदे और चढ़ावे का मुद्दा भी जुड़ा है। इसके अलावा दिग्विजय सिंह की उम्र भी पिछली यात्रा के मुकाबले अधिक है।इसलिए इस यात्रा का असर केवल कितने लोग इसमें शामिल हुए या कितने किलोमीटर की दूरी तय हुई, इससे तय नहीं होगा।

Sanatan Swabhiman Padyatra: यात्रा से कांग्रेस को क्या मिल सकता है?

कुल मिलाकर इस यात्रा के जरिए कांग्रेस को कुछ स्तरों पर फायदा मिल सकता है। पहला, पार्टी नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता बढ़ सकती है। दूसरा, मध्य प्रदेश के रास्ते में पुराने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से सीधे संपर्क के जरिए संगठन से जुड़ाव मजबूत करने का मौका मिल सकता है। तीसरा, धार्मिक मुद्दों को लेकर पार्टी की राजनीतिक भाषा में एक अलग तरह का संदेश सामने आ सकता है।नर्मदा परिक्रमा का केंद्र मध्य प्रदेश और नर्मदा की धार्मिक परंपरा थी। वहीं, इस बार यात्रा उज्जैन से शुरू होकर अयोध्या तक जाएगी। यानी इसका दायरा मध्य प्रदेश से निकलकर उत्तर प्रदेश तक पहुंचेगा। इसी वजह से आने वाले समय में इस यात्रा को लेकर मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा देखने को मिल सकती है।