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काला सागर में ड्रोन हमले का असर, भारत पर कितना खतरा? गेहूं, तेल और भारतीय नाविक क्यों हैं चिंता की वजह

काला सागर संकट से भारत की चिंता
काला सागर संकट से भारत की चिंता

Black Sea Crisis: रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग अब केवल जमीन तक सीमित नहीं है। काला सागर में हो रहे ड्रोन हमलों ने सैन्य ठिकानों के साथ-साथ व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए भी खतरा बढ़ा दिया है। इसी समुद्री रास्ते से दुनिया के कई देशों तक गेहूं, मक्का, तेल और खाद जैसी जरूरी चीजें पहुंचती हैं। हाल के हमलों में भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि काला सागर इतना महत्वपूर्ण क्यों है और यहां बढ़ते युद्ध का असर अफ्रीका, एशिया और भारत तक कैसे पहुंच सकता है।

काला सागर क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

काला सागर यूरोप और एशिया के बीच स्थित एक बड़ा समुद्री क्षेत्र है। इसके किनारे रूस, यूक्रेन, तुर्किये, बुल्गारिया, रोमानिया और जॉर्जिया हैं। हालांकि, इसका महत्व केवल इन छह देशों तक सीमित नहीं है। यहां से भेजे जाने वाले अनाज, तेल और अन्य जरूरी सामान हजारों किलोमीटर दूर अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के बाजारों तक पहुंचते हैं।यही वजह है कि अगर काला सागर में समुद्री आवाजाही बाधित होती है, तो उसका असर दूसरे देशों में खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

Black Sea Crisis: गेहूं की सप्लाई में बड़ी भूमिका

काला सागर के बंदरगाहों से हर साल करोड़ों टन अनाज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया में निर्यात होने वाले गेहूं का करीब एक चौथाई हिस्सा उपलब्ध कराते हैं। रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक है, जबकि यूक्रेन गेहूं और मक्का के प्रमुख सप्लायरों में शामिल है।अगर काला सागर के रास्ते जहाजों की आवाजाही रुकती है या धीमी पड़ती है, तो मिस्र, बेरूत और नैरोबी जैसे इलाकों में रोटी और दूसरे खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ सकता है जो अपनी खाद्य जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।

तेल के लिए भी अहम समुद्री रास्ता

काला सागर रूस के तेल कारोबार के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। रूस के समुद्री टर्मिनलों से हर दिन करीब 10 लाख बैरल कच्चा तेल गुजरता है। नोवोरोसिस्क रूस का प्रमुख दक्षिणी तेल निर्यात केंद्र है।इसके पास कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम का समुद्री टर्मिनल भी है। यह टर्मिनल कजाखस्तान के तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा संभालता है। अगर इन टर्मिनलों से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है, तो दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव एशिया की रिफाइनरियों तक पहुंचने वाली तेल सप्लाई पर भी पड़ सकता है।

Black Sea Crisis: काला सागर से बाहर निकलने का रास्ता सीमित

काला सागर की भौगोलिक स्थिति इसे और संवेदनशील बनाती है। यह सीधे खुले समुद्र से नहीं जुड़ा है। यहां से निकलने वाले जहाजों को पहले तुर्किये के बोस्फोरस जलडमरूमध्य से गुजरना पड़ता है। इसके बाद उन्हें मरमारा सागर पार करके डार्डानेल्स के रास्ते भूमध्यसागर तक पहुंचना होता है।इन जलडमरूमध्यों पर 1936 की मॉन्ट्रो कन्वेंशन लागू होती है। यही रास्ता काला सागर को बाहरी समुद्री दुनिया से जोड़ता है। इसलिए अगर यहां किसी तरह का संकट पैदा होता है, तो जहाजों के पास आसानी से इस्तेमाल किया जा सकने वाला कोई दूसरा समुद्री रास्ता नहीं है।

Black Sea Crisis: काला सागर संकट से दुनिया पर असर
काला सागर संकट से दुनिया पर असर
रूस-यूक्रेन युद्ध में कैसे बदला काला सागर?

2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद काला सागर भी संघर्ष का एक बड़ा क्षेत्र बन गया। शुरुआत में यहां पारंपरिक नौसैनिक युद्ध हुआ। इसमें युद्धपोत, मिसाइल फ्रिगेट, तटीय मिसाइल सिस्टम और समुद्री सुरंगों का इस्तेमाल किया गया।यूक्रेन के पास रूस जैसी बड़ी पारंपरिक नौसेना नहीं थी। इसलिए उसने छोटे, कम लागत वाले और दूर से नियंत्रित किए जा सकने वाले समुद्री ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाया। विस्फोटक ड्रोन ने रूस के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी। धीरे-धीरे इन ड्रोन के कारण काला सागर में युद्ध की रणनीति भी बदलने लगी।

Black Sea Crisis: सेवस्तोपोल से नोवोरोसिस्क तक पहुंची रूसी नौसेना

यूक्रेन ने रूस के ऐतिहासिक नौसैनिक केंद्र सेवस्तोपोल के आसपास लगातार समुद्री ड्रोन हमले किए। इन हमलों के बाद रूसी नौसेना को अपने कई बड़े युद्धपोत पूर्व की ओर नोवोरोसिस्क ले जाने पड़े।यह बदलाव केवल सैन्य तैनाती तक सीमित नहीं था। नोवोरोसिस्क रूस का एक बड़ा व्यावसायिक केंद्र भी है। यहां से तेल और कई दूसरे महत्वपूर्ण सामान का कारोबार होता है।इसका नतीजा यह हुआ कि जिस समुद्री क्षेत्र में रूसी युद्धपोत ड्रोन हमलों से बचने की कोशिश कर रहे थे, उसी रास्ते से तेल, खाद और गेहूं लेकर व्यापारी जहाज भी गुजर रहे थे।

व्यापारी जहाज भी बनने लगे निशाना

युद्ध शुरू होने के बाद से ही काला सागर में व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा बना हुआ था, लेकिन अक्टूबर की शुरुआत में स्थिति और गंभीर हो गई।अक्टूबर की शुरुआत में यूक्रेनी मक्का लेकर जा रहे तुर्किये के एक कार्गो जहाज पर सीधा हमला हुआ। यह जहाज रोमानिया के विशेष आर्थिक क्षेत्र में डूब गया और 2 नाविकों की मौत हो गई।इसके 48 घंटे बाद बुल्गारिया के जलक्षेत्र में 2 वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया। नाटो के किसी सदस्य देश के समुद्री क्षेत्र में इस तरह का हमला पहली बार हुआ था। इस घटना में एक जहाज डूब गया, जबकि 10 नाविक लापता हो गए।

Black Sea Crisis: बुल्गारिया हमले में 7 भारतीय नाविक भी थे

बुल्गारिया के जलक्षेत्र में हमले का शिकार हुए दूसरे जहाज पर 18 चालक दल के सदस्य मौजूद थे। सभी को बचा लिया गया। इनमें 7 भारतीय नाविक भी शामिल थे।यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के समुद्री व्यापार में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। युद्ध वाले इलाकों में बढ़ती असुरक्षा सीधे उनकी जान को खतरे में डाल सकती है।लाल सागर और अदन की खाड़ी में ड्रोन और मिसाइल हमलों के बीच काम कर चुके भारतीय नाविक अब काला सागर में भी इसी तरह के खतरे का सामना कर रहे हैं।

सोची के पास तेल टैंकर पर हमला

इसके बाद रूस के पर्यटन शहर सोची के तट के पास लाइबेरिया के झंडे के नीचे चल रहे कच्चे तेल के टैंकर ‘अफ्रामैक्स रियो’ को समुद्री ड्रोन ने निशाना बनाया।हमले के बाद जहाज के डेक पर तेज आग लग गई। आपातकालीन टग बोट ने आग बुझाने की कोशिश की और जहाज पर मौजूद सभी 23 चालक दल के सदस्यों को बचा लिया गया।इस घटना ने युद्ध और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संबंध को साफ तौर पर सामने ला दिया। जहाज लाइबेरिया के झंडे के नीचे था, उसके सभी चालक दल के सदस्य भारतीय थे और वह रूसी तट से कच्चा तेल लेकर जा रहा था।

Black Sea Crisis: युद्ध की अग्रिम सीमा से भी दूर पहुंचा खतरा

‘अफ्रामैक्स रियो’ पर हमला सक्रिय युद्ध क्षेत्र की अग्रिम सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर हुआ। इसका मतलब है कि खतरा केवल उन जगहों तक सीमित नहीं है जहां रूस और यूक्रेन की सेनाएं सीधे आमने-सामने हैं।समुद्री ड्रोन काफी दूर तक जाकर उन जहाजों को भी निशाना बना सकते हैं जो सीधे युद्ध में शामिल नहीं हैं। समुद्र में किसी जहाज का झंडा किस देश का है, उसमें कौन सा सामान है या उसके चालक दल के लोग किस देश से हैं, इन बातों के बावजूद ड्रोन हमले का खतरा बना रह सकता है।

दोनों देश जहाजों और सप्लाई लाइनों पर क्यों कर रहे हैं हमला?

रूस और यूक्रेन दोनों के लिए समुद्री सप्लाई लाइनें युद्ध की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।रूस यूक्रेन के डेन्यूब बंदरगाहों और तटीय भंडारण केंद्रों पर हमले करता है। रूस का कहना है कि इन जगहों पर हथियारों की सप्लाई होती है।वहीं, यूक्रेन तेल टैंकरों और ईंधन से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाता है। उसका उद्देश्य रूस की तेल से होने वाली कमाई को प्रभावित करना है, क्योंकि इसी आय से युद्ध के लिए संसाधन जुटाए जाते हैं।हालांकि, इन हमलों के बीच सबसे बड़ा खतरा उन नागरिक नाविकों पर है जिनका युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं है।

Black Sea Crisis: हमलों से जहाजों का किराया भी बढ़ सकता है

काला सागर में बढ़ते खतरे की समस्या केवल जहाजों पर हमले तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे जोखिम बढ़ता है, समुद्री बीमा कंपनियां युद्ध जोखिम के लिए लिया जाने वाला प्रीमियम बढ़ा देती हैं।हर नए हमले के साथ काला सागर में जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है। बुल्गारिया के नेतृत्व ने भी चेतावनी दी है कि बढ़ती बीमा लागत सामान्य व्यापारिक जहाजों के संचालन को मुश्किल बना रही है।इसके बाद जहाज मालिक अधिक जोखिम भत्ता मांग सकते हैं और माल ढुलाई का किराया बढ़ सकता है। बड़ी शिपिंग कंपनियां जोखिम वाले समुद्री रास्तों से पीछे हट सकती हैं। इससे पुराने जहाजों पर निर्भरता बढ़ने की संभावना भी बन सकती है।

काला सागर संकट से दुनिया पर असर
काला सागर संकट से दुनिया पर असर
आम लोगों की जेब पर कैसे पड़ेगा असर?

समुद्र में बढ़ते जोखिम का असर आखिरकार आम लोगों की जेब तक पहुंच सकता है। अगर जहाजों का बीमा और माल ढुलाई महंगी होती है, तो डीजल, तेल और आटे जैसी चीजों की कीमत बढ़ सकती है।अगर स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि कंपनियां काला सागर को प्रतिबंधित क्षेत्र मानने लगें, तो सामान की सप्लाई और महंगी हो सकती है।सबसे ज्यादा चिंता अनाज को लेकर है। 28 सितंबर को न्यूयॉर्क में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आने वाले महीनों में बड़े खाद्य संकट की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि कुछ बड़े अनाज निर्यातकों को खासकर काला सागर के रास्ते सामान भेजने में परेशानी हो सकती है।

Black Sea Crisis: भारत ने रूस और यूक्रेन से बातचीत क्यों बढ़ाई?

जयशंकर ने यह भी बताया था कि खाद की कमी बढ़ रही है। भारत सुरक्षित काला सागर शिपिंग को फिर से बहाल करने के लिए रूस और यूक्रेन दोनों से बातचीत कर रहा है।इसका मतलब है कि भारत की भूमिका केवल चिंता जताने तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली दोनों पक्षों से सीधे संपर्क कर रही है। भारत के लिए यह मामला खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ अपने नागरिकों की सुरक्षा से भी जुड़ा है।दुनिया के वाणिज्यिक समुद्री कर्मचारियों में भारतीय नाविकों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में काला सागर में बढ़ता खतरा भारत के लिए आर्थिक और मानवीय, दोनों तरह की चिंता पैदा करता है।

भारत की कूटनीतिक कोशिशों का दायरा बढ़ा

भारत की कोशिशों की शुरुआत व्यापारिक जहाजों पर काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा से हुई थी। बाद में इसका दायरा बढ़कर अनाज और ऊर्जा से जुड़े ढांचे तक पहुंच गया।यूक्रेन ने भारत, अमेरिका, तुर्किये और मिस्र की ओर से दिए गए 4 अलग-अलग युद्धविराम प्रस्ताव मिलने की पुष्टि की है। यूक्रेन के अनुसार, भारत का प्रस्ताव सबसे व्यापक था, क्योंकि इसमें समुद्री स्थिरता के साथ ऊर्जा से जुड़े ढांचे को भी शामिल किया गया था।हालांकि, इन प्रस्तावों को जमीन पर लागू करना आसान नहीं है। रूस समुद्री हमलों पर औपचारिक रोक लगाने का विरोध कर रहा है, क्योंकि व्यापारिक ढांचे पर दबाव बनाना उसके लिए युद्ध में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन है।

Black Sea Crisis: एक ही समुद्र में युद्ध और बातचीत

काला सागर में इस समय एक अलग तरह की स्थिति दिखाई दे रही है। जिस समुद्र में ड्रोन सैन्य जहाजों और तेल टैंकरों को निशाना बना रहे हैं, उसी समुद्र में सुरक्षित व्यापार के लिए कूटनीतिक बातचीत भी जारी है।यानी सैन्य कार्रवाई और कूटनीति, दोनों का केंद्र एक ही समुद्र बना हुआ है। इसी वजह से काला सागर अब सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध का हिस्सा नहीं रह गया है।यहां वैश्विक खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सप्लाई, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ गई है।

काला सागर का असर पूरी दुनिया पर क्यों पड़ेगा?

रूस और यूक्रेन जमीन और संप्रभुता को लेकर लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार का संबंध पूरी दुनिया से है।काला सागर से भेजा जाने वाला गेहूं अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के देशों तक पहुंचता है। इसी समुद्री रास्ते से जाने वाला तेल वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है। भारतीय नाविक भी इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और अब उनकी सुरक्षा भी खतरे में है।इसलिए काला सागर में होने वाला हर ड्रोन हमला केवल किसी एक जहाज या एक देश की समस्या नहीं है। वहां की स्थिति आगे चलकर दुनिया के खाद्य बाजार, ईंधन की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर असर डाल सकती है।