Police Detention Rights: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर नई दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी को बुधवार को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया में गड़बड़ियां हुई हैं।
Police Detention Rights: राहुल गांधी को लगातार दूसरे दिन हिरासत में लिया गया
दिल्ली पुलिस ने लगातार दूसरे दिन राहुल गांधी को हिरासत में लिया। इससे पहले मंगलवार को भी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और विपक्ष के अन्य नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था। ये नेता नई दिल्ली स्थित आकाशवाणी भवन परिसर में करीब आठ घंटे तक प्रदर्शन करते रहे थे।
बुधवार को राहुल गांधी को दोबारा हिरासत में लेने से पहले पुलिस ने आकाशवाणी भवन परिसर में बिना अनुमति प्रवेश करने के आरोप में मामला दर्ज किया। 2 अक्टूबर से दिल्ली पुलिस सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले चुकी है। इनमें वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी शामिल हैं।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कानून की नजर में हिरासत का क्या मतलब है? पुलिस किन परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है? हिरासत और गिरफ्तारी में क्या अंतर होता है? साथ ही, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को कानून के तहत कौन-कौन से अधिकार मिलते हैं?
हिरासत और गिरफ्तारी में क्या अंतर है?
कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। प्रदर्शन या विरोध के दौरान स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, कई बार पुलिस की कार्रवाई गिरफ्तारी जैसी दिखाई देती है, जबकि कुछ मामलों में इसे हिरासत की कार्रवाई बताया जाता है। इसी कारण आम बोलचाल में इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक-दूसरे के स्थान पर भी किया जाता है।
जब पुलिस किसी अपराध के संबंध में किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से अपने कब्जे में लेती है, तो इसे गिरफ्तारी कहा जाता है। गिरफ्तारी के बाद उस व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू हो सकती है। इसके साथ ही संविधान और कानून के तहत मिलने वाले कई सुरक्षा उपाय भी लागू हो जाते हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह ली है। बीएनएसएस में हिरासत को अलग से परिभाषित नहीं किया गया है। इसके बजाय, कानून कुछ परिस्थितियों में पुलिस को किसी व्यक्ति को रोकने, किसी स्थान से हटाने या कुछ समय के लिए अपने नियंत्रण में रखने की शक्तियां देता है। इनका इस्तेमाल अपराध होने या अपराध की आशंका पैदा होने पर किया जा सकता है।
यही वजह है कि प्रदर्शनों के बाद हिरासत को लेकर विवाद सामने आते हैं। कई बार पुलिस किसी व्यक्ति को अपने साथ ले जाती है, उसे कई घंटे तक रोककर रखती है और फिर बिना मामला दर्ज किए छोड़ देती है। ऐसे में संबंधित व्यक्ति को पुलिस की कार्रवाई गिरफ्तारी जैसी लग सकती है। वहीं, पुलिस इसे किसी अपराध के लिए की गई औपचारिक गिरफ्तारी के बजाय कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया निवारक कदम बता सकती है।
Police Detention Rights: पुलिस हिरासत को लेकर अधिवक्ताओं की क्या राय है?
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने औपचारिक गिरफ्तारी और प्रदर्शन के दौरान किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए हिरासत में रखने के बीच अंतर समझाया। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि ऐसी स्थिति में पुलिस किसी व्यक्ति को एक स्थान पर रोक सकती है और उसे वहां से जाने नहीं देती, लेकिन उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं करती।
अधिवक्ता सौतिक बनर्जी ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि पुलिस कई बार इस अंतर का इस्तेमाल औपचारिक गिरफ्तारी से जुड़ी कानूनी जांच से बचने के लिए करती है। उनके मुताबिक, पुलिस जानती है कि जब प्रदर्शनकारी ऐसा संज्ञेय अपराध नहीं करते, जिसमें सात साल से अधिक की सजा का प्रावधान हो, तो उन्हें मनमाने तरीके से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। गिरफ्तारी होने पर अदालत पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठा सकती है। इसलिए, उनके अनुसार, पुलिस कई बार लोगों को कुछ घंटों के लिए अपने साथ ले जाती है और बाद में छोड़ देती है।संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध होते हैं, जिनमें पुलिस कानून के तहत बिना वारंट के भी गिरफ्तारी कर सकती है।
बीएनएसएस पुलिस को हिरासत में लेने का क्या अधिकार देता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 पुलिस को अपराध होने से पहले निवारक कार्रवाई करने का अधिकार देती है। यदि किसी पुलिस अधिकारी को जानकारी मिलती है कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने की योजना बना रहा है और अधिकारी को लगता है कि उस अपराध को किसी अन्य तरीके से रोका नहीं जा सकता, तो वह मजिस्ट्रेट के आदेश और वारंट के बिना उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है।

वहीं, बीएनएसएस की धारा 172 पुलिस को एक अन्य शक्ति देती है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस के कानूनी निर्देश का विरोध करता है, उसे मानने से इनकार करता है या उसकी अनदेखी करता है, तो पुलिस उसे हिरासत में ले सकती है या वहां से हटा सकती है। ऐसे व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। छोटे मामलों में पुलिस उसे 24 घंटे के भीतर छोड़ सकती है।पुरानी सीआरपीसी में इस तरह का स्पष्ट प्रावधान नहीं था। बीएनएसएस ने पुलिस को कानूनी निर्देशों का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति को हिरासत में लेने या वहां से हटाने का स्पष्ट अधिकार दिया है।
Police Detention Rights: बीएनएसएस में कौन-सा प्रावधान नया है?
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े के मुताबिक, बीएनएसएस की धारा 172(2) एक नया प्रावधान है। सीआरपीसी में इसका कोई समान प्रावधान मौजूद नहीं था।उन्होंने बताया कि सीआरपीसी पुलिस को संज्ञेय अपराध रोकने और जरूरत पड़ने पर उसे रोकने के लिए गिरफ्तारी करने का अधिकार देता था। हालांकि, यह कानून नागरिकों को पुलिस के निर्देश मानने के लिए बाध्य नहीं करता था और न ही निर्देशों का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति को हिरासत में लेने का स्पष्ट अधिकार देता था।
संजय हेगड़े के अनुसार, बीएनएसएस में इन दोनों पहलुओं को शामिल किया गया है। यह प्रावधान सीआरपीसी के बजाय राज्य के पुलिस कानूनों से लिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि 24 घंटे की सीमा बाद में जोड़ी गई थी।अधिवक्ता के मुताबिक, ऐसी अल्पकालिक हिरासत के दौरान व्यक्ति को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने अब तक ऐसे किसी मामले में विस्तार से फैसला नहीं दिया है, जिसमें थोड़े समय के लिए हिरासत में रखने और कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन नहीं करने के परिणामों पर विचार किया गया हो।
निवारक हिरासत और निवारक नजरबंदी में अंतर
प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए अपने साथ ले जाने की कार्रवाई को निवारक नजरबंदी से अलग समझना चाहिए।निवारक नजरबंदी के तहत सरकार विशेष कानूनों के आधार पर किसी व्यक्ति को मुकदमा चलाए बिना हिरासत में रख सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) इसका एक उदाहरण है।अधिवक्ता सौतिक बनर्जी ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को थोड़े समय के लिए हिरासत में लेने की कार्रवाई को निवारक नजरबंदी के समान नहीं मानना चाहिए। उनके मुताबिक, कानून पुलिस को इस तरह की हिरासत की अनुमति नहीं देता। हालांकि, कानून में निवारक नजरबंदी का प्रावधान है, लेकिन इसके लिए पुलिस और प्रशासन को निर्धारित कानूनी शर्तों का सख्ती से पालन करना पड़ता है।
Police Detention Rights: पुलिस किन परिस्थितियों में किसी को हिरासत में ले सकती है?
प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लेने की ज्यादातर कार्रवाइयां तब होती हैं, जब पुलिस को कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका होती है। कई बार प्रशासन पहले ही किसी क्षेत्र में प्रतिबंधात्मक आदेश लागू कर देता है। 2 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू की थी।यदि प्रदर्शनकारी ऐसे आदेश के बावजूद वहां से हटने से इनकार करते हैं या प्रतिबंधित गतिविधियां जारी रखते हैं, तो पुलिस उन्हें वहां से हटा सकती है या कुछ समय के लिए हिरासत में ले सकती है।
ऐसे आदेश का उल्लंघन करना भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 223 के तहत अपराध है। बीएनएस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जगह ली है। ऐसी स्थिति में पुलिस हिरासत की कार्रवाई को आगे बढ़ाकर औपचारिक गिरफ्तारी कर सकती है और प्राथमिकी यानी एफआईआर दर्ज कर सकती है।हालांकि, पुलिस को यह कार्रवाई मनमाने तरीके से करने की अनुमति नहीं है। अदालतें कई बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि पुलिस को यह बताना होगा कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाना क्यों जरूरी था।
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर क्या कहा?
उच्चतम न्यायालय ने जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (1994) मामले में कहा था कि पुलिस के पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति होना अलग बात है और उस शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए उचित कारण होना अलग बात है।इसके बाद अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार (2014) मामले में उच्चतम न्यायालय ने पुलिस को निर्देश दिया कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में हर मामले में अपने-आप गिरफ्तारी न की जाए।वहीं, मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत सरकार (2018) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रदर्शनों पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है, लेकिन विरोध करने के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती।
Police Detention Rights: हिरासत या गिरफ्तारी में लिए गए व्यक्ति के क्या अधिकार हैं?
जब सरकार किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाती है, तो संविधान और कानून उसे कई तरह की सुरक्षा प्रदान करते हैं।भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े मामलों में व्यक्ति को सुरक्षा देता है। इसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। पुलिस को उसे गिरफ्तारी का कारण भी बताना होता है। इसके अलावा, व्यक्ति को वकील से कानूनी सलाह लेने और उसके माध्यम से अपना बचाव करने का अधिकार मिलता है।उच्चतम न्यायालय ने कई मामलों में कहा है कि पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में बताने चाहिए। पिछले महीने ही अदालत ने कहा था कि यदि पुलिस गिरफ्तारी के दौरान अनुच्छेद 22 के तहत दिए गए सुरक्षा उपायों का पालन नहीं करती, तो ऐसी गिरफ्तारी असंवैधानिक होगी।संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और उसके माध्यम से अपना बचाव करने का अधिकार दिया गया है।
पूछताछ के दौरान वकील से मिलने का अधिकार
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिल सकता है। हालांकि, वकील को पूरी पूछताछ के दौरान उसके साथ मौजूद रहने का अधिकार नहीं है।यदि कोई व्यक्ति वकील की फीस देने में सक्षम नहीं है, तो सरकार की ओर से उसे मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
Police Detention Rights: महिलाओं की गिरफ्तारी को लेकर क्या नियम हैं?
बीएनएसएस की धारा 43(5) में महिलाओं की गिरफ्तारी को लेकर विशेष सुरक्षा दी गई है। इसके तहत पुलिस सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले किसी महिला को गिरफ्तार नहीं कर सकती। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में न्यायिक मजिस्ट्रेट से पहले अनुमति लेकर रात के समय भी महिला की गिरफ्तारी की जा सकती है।
डीके बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या सुरक्षा दी?
उच्चतम न्यायालय ने डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार (1997) मामले में गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान पालन किए जाने वाले कई सुरक्षा उपाय निर्धारित किए थे।इन निर्देशों के अनुसार, पुलिस अधिकारियों को अपनी पहचान बताने वाली पट्टी पहननी होती है। गिरफ्तारी मेमो पर कम से कम एक गवाह के हस्ताक्षर होने चाहिए। पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर पर मौजूद चोटों का रिकॉर्ड तैयार करना होता है। इसके साथ ही, गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार के सदस्यों को उसकी गिरफ्तारी की जानकारी देना भी जरूरी है।उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पुलिस इन सुरक्षा उपायों को केवल सलाह मानकर नजरअंदाज नहीं कर सकती। इनका पालन नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। कुछ मामलों में अदालत की अवमानना से जुड़ी कार्रवाई भी हो सकती है।
Police Detention Rights: राहुल गांधी और अन्य सांसदों के खिलाफ एफआईआर दर्ज
दिल्ली पुलिस ने बुधवार को कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और विपक्षी गठबंधन इंडिया के अन्य सांसदों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। पुलिस के मुताबिक, इन सांसदों पर मंगलवार को चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान बिना अनुमति आकाशवाणी भवन परिसर में प्रवेश करने का आरोप है।









