Opinion: राजनीति में मुद्दों पर सहमति-असहमति और विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला सतत चला आ रहा है। लोकतंत्र में विपक्षी दलों, संगठनों या हर नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन इसमें थोड़ा संयम भी बरतना पड़ता है। राष्ट्र का जिम्मेदार नागरिक होने के नाते अपने देश में कितना ही विरोध-प्रदर्शन किया जाए, कोई हर्ज नहीं।इससे किसी को कोई दिक्कत नहीं, लेकिन कष्ट तब होता है जब हम कई बार देश की आंतरिक समस्याओं या मुद्दों को लेकर विदेशी धरती से बयानबाजी कर देते हैं। बयान बहादुर बनने के चक्कर में हम यह भूल जाते हैं कि इससे देश की छवि प्रभावित हो सकती है।हम ध्यान नहीं रखना चाहते हैं कि भारत के अंदरूनी मुद्दों पर देश के ही भीतर चर्चा होनी चाहिए, न कि विदेशी मंचों पर जाकर।
क्या इसका दुनिया में अच्छा संदेश जाएगा?
आश्चर्यजनक है कि इस बीच ध्रुव राठी नामक एक यूट्यूबर ने लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का आह्वान कर दिया। हालांकि प्रमुख समाचार माध्यमों के हवाले से इस प्रदर्शन को लेकर कोई बड़ा और सफल जनसमर्थन मिलने या इसका उद्देश्य पूरा होने जैसी कोई आधिकारिक या व्यापक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यूट्यूबर ने खुद की एवं अपनी समर्थक मित्रमंडली की नीयत तो जाहिर कर ही दी है। उन्होंने बता दिया है कि वे संवैधानिक संस्थाओं के विरोध में इस हद तक जा सकते हैं कि उन पर विदेशी धरती में भी कीचड़ उछालने से परहेज नहीं करेंगे। क्या भारत की चुनावी प्रक्रिया और आंतरिक मुद्दों को दूसरे देश की धरती पर उठाना उचित है? क्या इसका दुनिया में अच्छा संदेश जाएगा? क्या इससे राष्ट्र की छवि पर आंच नहीं आएगी।
Opinion: भारतीयों की भावनाओं का ध्यान रखें
ठीक है कोई व्यक्ति हीरो बनना चाहता है, सोशल मीडिया का बेताज बादशाह बननना चाहता है, लेकिन क्या इसके लिए उसे इतना भी अहसास नहीं रहना चाहिए कि विदेशी धरती पर भारत के आंतरिक मुद्दों को उछालने की जिद के चलते वहां रहने वाले भारतीयों की भावनाएं आहत हो सकती हैं? हुआ भी ऐसा ही।ध्रुव राठी ने जिस जगह विरोध प्रदर्शन की अपील की थी, उसी के आस-पास लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन ने एकत्र होकर ‘मोदी-मोदी’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। यूट्यूबर को समझना चाहिए कि विदेशों में किसी भी भ्रामक नैरेटिव को वहां रहने वाले भारतीय कैसे आसानी से स्वीकार कर लेंगे? ध्रुव राठी यह भी अच्छी तरह जान लें कि उनसे पहले भी कई बार विदेशी धरती पर भारत के अंदरूनी मुद्दों को उठाया गया, लेकिन जिन राजनेताओं ने इस तरह की कोशिशें की उन्हें अपने देश में बड़ी राजनीतिक सफलता मिली क्या? इसलिए विरोध के स्वर भारत की धरती पर ही उठें तो, बेहतर होगा।
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