Saudi Death Penalty: सऊदी अरब के मक्का शहर की एक मस्जिद में कथित तौर पर अश्लील हरकत करने के आरोप में बांग्लादेश के दो नागरिकों को मौत की सजा दी गई है। हालांकि, उन्हें फांसी दी गई, सिर कलम किया गया या गोली मारकर मौत की सजा दी गई, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। इस मामले में सबसे ज्यादा सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि सजा दिए जाने से पहले बांग्लादेश के दूतावास को भी इसकी सूचना नहीं दी गई थी। आखिर पूरा मामला क्या है, सऊदी अरब में किस कानून के तहत ऐसी सजा दी जाती है और इस फैसले पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? आइए, इस पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
Saudi Death Penalty: क्या है बांग्लादेशी जोड़े को मौत की सजा देने का पूरा मामला?
सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के मुताबिक, बांग्लादेश के दो नागरिकों नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर को मक्का की एक मस्जिद में कथित तौर पर अनैतिक हरकत करते हुए पकड़ा गया था। जांच के बाद दोनों के खिलाफ आरोप तय किए गए। बांग्लादेश के अखबार प्रोथोम आलो ने सऊदी सूत्रों के हवाले से बताया कि जेद्दा की एक अदालत में इस मामले की सुनवाई कई महीनों तक चली। सुनवाई के दौरान बांग्लादेश के दो अन्य नागरिकों ने अनुवादक के तौर पर मदद की।अदालत ने दोनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई। फैसला सुनाते हुए जज ने कहा कि दोनों ने न केवल सामाजिक नियमों का उल्लंघन किया, बल्कि मस्जिद जैसी पवित्र जगह और समय की मर्यादा का भी गंभीर रूप से अपमान किया। इसके बाद ऊपरी अदालत ने भी फैसले को बरकरार रखा। सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्दुलअजीज अल सऊद की ओर से शाही आदेश जारी होने के बाद 14 अक्टूबर को मक्का में दोनों को मौत की सजा दे दी गई।हालांकि, सऊदी सरकार ने इस मामले से जुड़ी कई अहम जानकारियां सार्वजनिक नहीं की हैं। यह स्पष्ट नहीं किया गया कि दोनों आरोपी पति-पत्नी थे या नहीं, उन्होंने वास्तव में क्या हरकत की थी, उन्हें कब गिरफ्तार किया गया और अदालत में सुनवाई कब शुरू हुई थी। मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर है। यहां अल-हरम मस्जिद स्थित है, जिसे इस्लाम की सबसे पवित्र मस्जिद माना जाता है।
Saudi Death Penalty: क्या है ‘ताजीर’, जिसके तहत दी गई मौत की सजा?
सऊदी अरब की अदालतें इस्लामी कानून यानी शरिया के आधार पर काम करती हैं। वहां जज शरिया की व्याख्या के अनुसार तय करते हैं कि कौन-सा काम अपराध है और उसके लिए कितनी सजा दी जानी चाहिए। शरिया के तहत अपराधों और सजाओं को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है।
पहली श्रेणी हद्द है, जिसमें ऐसे अपराध आते हैं जिनकी सजा कुरान या हदीस में निर्धारित मानी जाती है। हथियारों के साथ डकैती और शादीशुदा व्यक्ति द्वारा व्यभिचार जैसे अपराध इसके उदाहरण हैं। निर्धारित शर्तें पूरी होने पर इनमें मौत की सजा भी हो सकती है। ऐसे मामलों में अपराध साबित करने के लिए चश्मदीद गवाह या अपराध स्वीकार करने जैसे सबूतों की जरूरत होती है।
दूसरी श्रेणी किसास है, जिसका अर्थ अपराध के बदले सजा देना है। इसमें हत्या जैसे मामलों में ‘जान के बदले जान’ का सिद्धांत लागू हो सकता है। हालांकि, पीड़ित का परिवार आरोपी को माफ कर सकता है या ब्लड मनी यानी आर्थिक मुआवजा स्वीकार करके मौत की सजा से राहत देने का विकल्प चुन सकता है।
तीसरी श्रेणी ताजीर है। इसमें ऐसे अपराध आते हैं, जिनकी सजा कुरान और हदीस में स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है। कुछ ऐसे मामले भी इसमें शामिल होते हैं, जिनमें हद्द के तहत सजा देने के लिए जरूरी सबूतों की शर्तें पूरी नहीं होतीं। ऐसे मामलों में जज अपराध की गंभीरता, परिस्थितियों और समाज पर उसके प्रभाव को देखते हुए अपने विवेक से सजा तय करता है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, सऊदी अरब में ज्यादातर आपराधिक मामले ताजीर के तहत आते हैं।

Saudi Death Penalty: सऊदी अरब पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
इस मामले में सऊदी अरब पर सवाल उठने की पहली बड़ी वजह बांग्लादेश के दूतावास को जानकारी नहीं देना है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में वियना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस, 1963 एक महत्वपूर्ण समझौता है। इसके अनुच्छेद 36 के तहत विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी और कानूनी कार्यवाही से जुड़े मामलों में उनके देश के वाणिज्य दूतावास को जानकारी देने और संबंधित नागरिक को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के प्रावधान हैं।जेद्दा स्थित बांग्लादेशी दूतावास ने कहा कि उसे न तो मुकदमे की जानकारी दी गई और न ही मौत की सजा दिए जाने के बारे में बताया गया। इसके विरोध में बांग्लादेश ने सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय को औपचारिक राजनयिक संदेश यानी ‘नोट वर्बल’ भेजा है। प्रोथोम आलो ने बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से बताया कि सऊदी अरब आमतौर पर बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार करने के बाद इतनी जल्दी सजा नहीं देता। इसलिए इस मामले में अपनाई गई प्रक्रिया को असामान्य बताया जा रहा है। बांग्लादेश पिछले पांच दशकों से जेद्दा में अपना दूतावास चला रहा है।
दूसरी वजह आरोपों और सबूतों की जानकारी सार्वजनिक नहीं करना है। सऊदी अरब ने यह स्पष्ट नहीं किया कि दोनों आरोपियों ने वास्तव में क्या किया था, उनके खिलाफ कौन-से सबूत पेश किए गए और क्या उन्हें वकील रखने का पूरा अवसर मिला था। अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकार समझौते तथा संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति के मानकों के अनुसार, मौत की सजा केवल सबसे गंभीर अपराधों के लिए ही दी जानी चाहिए।
इस मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, आरोप सार्वजनिक स्थान या धार्मिक स्थल पर अश्लील हरकत करने से संबंधित हैं। दूसरे देशों में ऐसे अपराधों के लिए अपेक्षाकृत कम सजा का प्रावधान है। भारत में संबंधित अपराध और परिस्थितियों के आधार पर अधिकतम तीन साल की जेल और जुर्माना हो सकता है। बांग्लादेश में दो साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान बताया गया है, जबकि पाकिस्तान में ऐसे अपराध के लिए 10 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। इसी अंतर के कारण सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस मामले में अपराध की तुलना में सजा बहुत ज्यादा गंभीर थी।
सऊदी अरब में लिखित दंड संहिता का अभाव
सऊदी अरब पर सवाल उठने की तीसरी वजह वहां व्यापक लिखित दंड संहिता का अभाव है। भारत में भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता जैसे लिखित कानूनी दस्तावेज मौजूद हैं, जिनसे अपराधों और उनसे जुड़ी कानूनी कार्रवाई को समझने में मदद मिलती है। इसके विपरीत, सऊदी अरब में आपराधिक कानून का बड़ा हिस्सा शरिया की व्याख्या और न्यायिक फैसलों पर आधारित है।ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2022 में कहा था कि लिखित दंड संहिता नहीं होने के कारण सऊदी अरब में मनमाने आरोपों और फैसलों की आशंका बनी रहती है। जब अपराधों और उनकी सजाओं को स्पष्ट रूप से लिखित रूप में निर्धारित नहीं किया जाता, तो लोगों के लिए पहले से यह जानना मुश्किल हो सकता है कि किसी खास काम के लिए कितनी सजा मिल सकती है। वहीं, एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, सऊदी अरब में न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के कारण विदेशी नागरिकों को निष्पक्ष सुनवाई पाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
Saudi Death Penalty: सऊदी अरब में किन अपराधों के लिए मौत की सजा दी जाती है?
मौत की सजा देने के मामले में सऊदी अरब दुनिया में तीसरे स्थान पर है। वहां हत्या, बलात्कार, डकैती, आतंकवाद, वेश्यावृत्ति, इस्लाम छोड़ने, ईशनिंदा, ड्रग्स लेने और ड्रग्स की तस्करी जैसे अपराधों के लिए मौत की सजा दी जा सकती है। इसके अलावा, ताजीर के तहत जज अपने विवेक के आधार पर भी मौत की सजा सुना सकते हैं। इस श्रेणी में पवित्र स्थलों का अपमान करने, जासूसी और देशद्रोह जैसे मामलों को भी शामिल किया जा सकता है।सऊदी अरब में मौत की सजा मुख्य रूप से तीन तरीकों से दी जाती है। पहला तरीका सिर कलम करना है, जिसमें तलवार से गर्दन काटकर सजा दी जाती है। यह वहां मौत की सजा देने का पारंपरिक और आम तरीका रहा है। दूसरा तरीका गोली मारना है। साल 2013 में सऊदी अरब ने क्षेत्रीय गवर्नरों को यह अनुमति दी थी कि वे मौत की सजा पाए दोषियों का सिर कलम करने के बजाय उन्हें गोली मारने का तरीका चुन सकते हैं। तीसरा तरीका फांसी देना है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत कम किया जाता है।इसके अलावा, वहां के कानून में पत्थर मारकर मौत की सजा देने का भी उल्लेख है। हालांकि, मानवाधिकार संगठन रिप्रीव के मुताबिक, हाल के समय में इस तरीके से सजा दिए जाने का कोई मामला सामने नहीं आया है।
बांग्लादेश और सऊदी अरब के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
इस मामले के बाद सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और मर्यादा को लेकर सख्त चेतावनी जारी की है। मंत्रालय ने कहा कि सऊदी अरब अल्लाह के पवित्र घरों यानी मस्जिदों की सुरक्षा और सम्मान बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। धार्मिक स्थलों का अपमान करने या कानून तोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ बिना किसी रियायत के कानूनी कार्रवाई की जाएगी।इस बयान से सऊदी अरब में रहने वाले विदेशी नागरिकों और वहां आने वाले लोगों को स्पष्ट संदेश दिया गया है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी सजा मिल सकती है।
मानवाधिकार संगठन रिप्रीव के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में सऊदी अरब में मौत की सजा पाने वाले लोगों में 56.7 प्रतिशत विदेशी नागरिक थे, जबकि देश की कुल आबादी में विदेशियों की हिस्सेदारी लगभग 41.6 प्रतिशत है।जहां तक बांग्लादेश और सऊदी अरब के रिश्तों का सवाल है, वहां बड़े बदलाव की आशंका कम मानी जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक और रोजगार संबंध हैं। सऊदी अरब में 35 लाख से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिक काम करते हैं। किसी भी दूसरे देश की तुलना में सऊदी अरब में बांग्लादेशी कामगारों की संख्या सबसे ज्यादा है।पिछले साल सऊदी अरब में रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों ने अपने देश में 5.58 अरब डॉलर की रकम भेजी थी। यह बांग्लादेश को मिलने वाले कुल रेमिटेंस यानी विदेशों से भेजे गए धन का 16.33 प्रतिशत था। हालांकि, बांग्लादेशी अधिकारियों ने इस मामले में अपना विरोध दर्ज कराया है। ऐसे में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर यह मुद्दा उठ सकता है, लेकिन उनके मजबूत आर्थिक संबंधों को देखते हुए बड़े बदलाव की आशंका कम है।
Saudi Death Penalty: सऊदी अरब में इतनी ज्यादा मौत की सजाएं क्यों दी जाती हैं?
सऊदी अरब में मौत की सजा दिए जाने के आंकड़े लगातार चर्चा में रहे हैं। पिछले 11 साल में वहां कुल 1,956 लोगों को मौत की सजा दी गई। यानी हर साल औसतन लगभग 178 लोगों को मृत्युदंड दिया गया। अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के शुरुआती नौ महीनों में ही 175 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी थी।सऊदी अरब में मौत की सजा की संख्या अधिक होने के पीछे दो बड़ी वजहें बताई जाती हैं। पहली वजह ड्रग्स से जुड़े मामलों में भी मौत की सजा देना है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, जनवरी 2014 से जून 2025 के बीच सऊदी अरब में ड्रग्स से जुड़े मामलों में 597 लोगों को मौत की सजा दी गई। इनमें से करीब तीन-चौथाई लोग विदेशी नागरिक थे। साल 2025 में दी गई कुल 356 मौत की सजाओं में से 240 ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए थीं। इन 240 मामलों में 188 दोषी विदेशी नागरिक थे।दूसरी वजह कानून में जजों को मिलने वाले व्यापक अधिकार हैं। सऊदी अरब में व्यापक लिखित दंड संहिता का अभाव और ताजीर के तहत मिलने वाले अधिकार सजा तय करने में जजों की भूमिका को अहम बनाते हैं। इसके अलावा, वहां यह धारणा भी प्रचलित है कि कड़ी सजा देने से लोगों में कानून तोड़ने का डर बना रहता है और समाज में कानून-व्यवस्था कायम रखने में मदद मिलती है।
मानवाधिकार संगठन रिप्रीव की मुख्य कार्यकारी अधिकारी माया फोआ के मुताबिक, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कई बार मौत की सजा की संख्या कम करने की बात कह चुके हैं। हालांकि, उनके शासनकाल में मृत्युदंड के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। माया फोआ के अनुसार, 2015 से पहले के पांच वर्षों में सऊदी अरब में हर साल औसतन करीब 71 लोगों को मौत की सजा दी जाती थी। इसके मुकाबले बाद के वर्षों में मृत्युदंड की संख्या लगभग पांच गुना बढ़ गई।इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि धार्मिक स्थलों की मर्यादा बनाए रखने के लिए कानून का पालन जरूरी है, लेकिन क्या ऐसे आरोपों में मौत की सजा देना उचित है? इसके साथ ही, किसी विदेशी नागरिक को मौत की सजा देने से पहले उसके देश के दूतावास को जानकारी नहीं देना और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
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