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ट्रंप ने जिसे बताया जिहादी, उसने रचा इतिहास: अमेरिका की सीनेट में पहली बार पहुंचा मुस्लिम, जानिए अब्दुल अल-सैयद की कहानी

ट्रंप के विरोध के बीच अब्दुल अल-सैयद की जीत
ट्रंप के विरोध के बीच अब्दुल अल-सैयद की जीत

Abdul El-Sayed: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है। उन्होंने 52% से ज्यादा वोट हासिल कर रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रॉजर्स को हराया। इस जीत के साथ ही वह अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं। खास बात यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें जिहादी और खतरनाक बताया था। उनके खिलाफ आतंकवादियों का समर्थन करने और मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध रखने जैसे आरोप भी लगाए गए थे। हालांकि, तमाम विरोध के बावजूद सैयद ने जीत हासिल की।

Abdul El-Sayed: मिस्र से आए प्रवासियों के बेटे हैं अब्दुल अल-सैयद

42 वर्षीय अब्दुल अल-सैयद पेशे से डॉक्टर और महामारी विशेषज्ञ हैं। उनके माता-पिता 1970 के दशक में मिस्र से अमेरिका आए थे। सैयद का जन्म 31 अक्टूबर 1984 को मिशिगन के डेट्रॉयट शहर में हुआ था। जब वह तीन साल के थे, तब उनके माता-पिता का तलाक हो गया। इसके बाद उनकी परवरिश पिता और सौतेली मां ने की।सैयद ने मिशिगन यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल साइंस की पढ़ाई की। वह महामारी विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर भी रह चुके हैं। बाद में उन्होंने सार्वजनिक सेवाओं में काम करना शुरू किया। साल 2015 में महज 30 साल की उम्र में उन्हें डेट्रॉयट हेल्थ डिपार्टमेंट का एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बनाया गया। इसके बाद 2018 में उन्होंने मिशिगन के गवर्नर का चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी ने किसी दूसरे उम्मीदवार को मौका दिया।सैयद का राजनीति में आने का पहले कोई इरादा नहीं था। उनकी चुनावी वेबसाइट के मुताबिक, उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उनका मानना है कि खराब राजनीति अमेरिकी लोगों की सेहत और जिंदगी को प्रभावित कर रही है। उनका कहना था कि अमेरिका में लोगों का जीवन इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए।

ट्रंप ने बताया जिहादी, आतंकवादियों का समर्थक होने के भी लगे आरोप

चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने अब्दुल अल-सैयद पर जमकर निशाना साधा। ट्रंप ने उन्हें जिहादी और आतंकवादियों का समर्थक बताया। उन्होंने कहा था, ‘अगर आप अश्वेत या यहूदी हैं और अब्दुल को वोट देते हैं, तो आप पागल हैं। वह एक जिहादी है, जो खतरनाक और हिंसक है।’टेक्सास के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज ने भी सैयद को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सैयद सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी में पहुंचते हैं, तो अमेरिकी नागरिकों की जान खतरे में पड़ सकती है। वहीं, उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी माइक रॉजर्स ने सवाल उठाया कि सैयद अमेरिका के साथ हैं या आतंकवादी संगठनों के साथ।दरअसल, इन आरोपों के पीछे सैयद के परिवार से जुड़ी कुछ पुरानी घटनाओं का हवाला दिया गया। उनकी बहन इमान अब्देलहादी ने 2012 में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की थी। इसमें उन्होंने बताया था कि उनकी मां 1970 के दशक में मिस्र के संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ी थीं और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं।

माता-पिता के तलाक के बाद सैयद की मां मिसौरी चली गई थीं। वहां उन्होंने इस्लामिक अमेरिकन रिलीफ एजेंसी (IARA) में नर्स के तौर पर काम किया। साल 2004 में एफबीआई ने आतंकवादी संगठनों से संबंध होने के संदेह में इस एजेंसी पर छापा मारा था। इस दौरान सैयद की मां से भी पूछताछ हुई थी। रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव प्रचार में इस मामले को भी मुद्दा बनाया।हालांकि, सैयद ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि उनकी परवरिश मां ने नहीं, बल्कि पिता और सौतेली मां ने की है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका मुस्लिम ब्रदरहुड से कोई संबंध नहीं है।

Abdul El-Sayed: जेडी वेंस ने भी साधा निशाना, जीत के बाद सैयद ने दिया जवाब

अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी 15 अक्टूबर को एक चुनावी रैली में सैयद पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अमेरिकी जनता उनसे बेहतर उम्मीदवार की हकदार है। वेंस ने सैयद को छोटा और धूर्त व्यक्ति बताते हुए कहा कि उन्हें अपना मुंह बंद रखना चाहिए और उस देश के प्रति आभार जताना चाहिए, जिसने उन्हें सब कुछ दिया है।हालांकि, 4 नवंबर को आए चुनाव नतीजों में सैयद ने रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रॉजर्स को हरा दिया। जीत के बाद अपने भाषण में उन्होंने जेडी वेंस को जवाब देते हुए कहा, ‘जेडी हबीबी, यह काफी मजेदार विडंबना है कि आपको ही मुझे शपथ दिलानी होगी।’ दरअसल, अमेरिका में नवनिर्वाचित सीनेटरों को शपथ दिलाने की जिम्मेदारी उप राष्ट्रपति की होती है। इस तरह सैयद ने अपनी जीत के साथ वेंस पर भी तंज कसा।

Abdul El-Sayed: अब्दुल अल-सैयद ने कैसे हासिल की ऐतिहासिक जीत?
अब्दुल अल-सैयद ने कैसे हासिल की ऐतिहासिक जीत?
चुनाव से दो दिन पहले अपनी ही पार्टी के नेता ने किया विरोध

अमेरिका में किसी पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार बनने के लिए पहले पार्टी के भीतर चुनाव होते हैं, जिन्हें प्राइमरी इलेक्शन कहा जाता है। अगस्त 2026 में हुए प्राइमरी चुनाव में अब्दुल अल-सैयद ने चार बार की सांसद हेली स्टीवन्स को करीब 15,000 वोटों से हराया और डेमोक्रेटिक पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार बने। हेली स्टीवन्स ने सैयद को हराने के लिए 4.2 करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च किए थे।लेकिन मिडटर्म चुनाव प्रचार के आखिरी रविवार को हेली स्टीवन्स ने ऐसा कदम उठाया, जिससे राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं। वह रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रॉजर्स के साथ चर्च पहुंचीं और कहा, ‘मैं उस व्यक्ति के साथ आई हूं, जिसे मैं अमेरिकी सीनेट के चुनाव में वोट देने वाली हूं।’ चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में हेली के इस बयान को सैयद के विरोध के तौर पर देखा गया। इससे उनकी जीत की संभावनाओं पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही थी।हालांकि, चुनाव जीतने के बाद सैयद ने दावा किया कि उन्हें हराने के लिए उनकी अपनी पार्टी के लोगों ने भी 7 करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च किए थे।

Abdul El-Sayed: मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए सीनेट तक पहुंचना क्यों रहा मुश्किल?

अमेरिका में अब तक किसी मुस्लिम उम्मीदवार के सीनेट तक नहीं पहुंचने के पीछे दो प्रमुख वजहें मानी जाती रही हैं। पहली वजह देश में मुस्लिम आबादी का कम होना है। अमेरिका की 35 करोड़ से ज्यादा आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 1.34% यानी करीब 45 लाख से भी कम बताई जाती है। वहीं, अमेरिका के हर राज्य से सीनेट में केवल दो प्रतिनिधि चुने जाते हैं। ऐसे में कम आबादी वाले समुदाय के उम्मीदवार के लिए चुनाव जीतना आसान नहीं होता।दूसरी वजह 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका में मुसलमानों को लेकर बना माहौल है। इन हमलों के बाद मुस्लिम समुदाय के प्रति डर और संदेह बढ़ा। कई बार मुस्लिम उम्मीदवारों को उनके नाम और धर्म के आधार पर विदेशी, हिंसक या जिहादी बताकर निशाना बनाया गया। अब्दुल अल-सैयद को भी चुनाव प्रचार के दौरान इसी तरह के आरोपों का सामना करना पड़ा।

आम लोगों की समस्याओं को बनाया चुनावी मुद्दा

कई विवादों और विरोध के बावजूद सैयद की जीत के पीछे तीन बड़ी वजहें मानी जा रही हैं। पहली वजह यह रही कि उन्होंने चुनाव प्रचार में आम लोगों की जरूरतों और आर्थिक समस्याओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने मुख्य रूप से तीन मुद्दे उठाए। इनमें इजराइल को दी जाने वाली सैन्य सहायता बंद करना, अरबपतियों पर टैक्स लगाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पैसा जुटाना और अमेरिकी नागरिकों से वसूले जाने वाले टैक्स का सही इस्तेमाल करना शामिल था।सैयद की चुनावी वेबसाइट पर कहा गया कि वह ऐसी सरकार बनाने के लिए काम करेंगे, जो आम अमेरिकी नागरिकों के हितों को प्राथमिकता दे। उनका कहना था कि सरकार को इलॉन मस्क, डोनाल्ड ट्रंप और उनके अरबपति दोस्तों के बजाय आम जनता के लिए काम करना चाहिए।चुनाव से दो दिन पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था, ‘यह एक करोड़ लोगों का राज्य है, जो अपनी सरकार से बेहतर व्यवहार के हकदार हैं। मेरा ध्यान उन 99,99,998 लोगों पर है, जिनके बारे में आप लोग बात नहीं कर रहे हैं।’ इस बयान के जरिए उन्होंने आम नागरिकों की समस्याओं को चुनाव के केंद्र में रखने की कोशिश की।

Abdul El-Sayed: धार्मिक आरोपों से आगे रखे आम मुद्दे

सैयद की जीत की दूसरी वजह उनका चुनाव प्रचार करने का तरीका रहा। उन्होंने अपने धर्म को चुनाव का मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया और अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का जवाब देते हुए लोगों का ध्यान रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित रखा। धार्मिक पहचान को लेकर उठाए गए सवालों पर उन्होंने कहा था कि उनका नाम और धर्म इस बात की वजह नहीं है कि लोगों को पेट्रोल या किराने का सामान खरीदने में परेशानी हो, वे डॉक्टर के पास न जा सकें या साफ हवा और पानी के लिए परेशान रहें।इसके अलावा, इजराइल को लेकर उनके विरोधी रुख के कारण मिशिगन के कुछ यहूदी मतदाता उनसे दूर हो रहे थे। ऐसे में सैयद ने यहूदी धर्मगुरुओं के साथ बैठकें कीं। इन बैठकों के जरिए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध इजराइल सरकार की नीतियों से है, न कि यहूदी समुदाय से।

डेमोक्रेटिक पार्टी की लहर से मिला फायदा

सैयद की जीत के पीछे तीसरी बड़ी वजह डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में बना चुनावी माहौल रहा। चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति और उनके प्रशासन के फैसलों को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ रही थी। इस दौरान उनकी अप्रूवल रेटिंग गिरकर महज 38% रह गई थी। कई ओपिनियन पोल भी शुरुआत से ही डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलने का संकेत दे रहे थे।इसके अलावा, मिशिगन में रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति भी मजबूत नहीं रही है। साल 1994 के बाद से यहां किसी रिपब्लिकन उम्मीदवार ने सीनेट की सीट नहीं जीती थी। ऐसे राजनीतिक माहौल का फायदा भी अब्दुल अल-सैयद को मिला। उन्होंने तमाम विरोध और आरोपों के बावजूद जीत हासिल की और अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बनकर इतिहास रच दिया।