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एआई खा रहा है लोगों की सोचने समझने की क्षमता, जी हुजूरी का परिणाम हानिकारक

Artificial intelligence: आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। जब भी AI से जुड़े खतरों की बात होती है, तो लोगों को अक्सर नौकरियां जाने या हॉलीवुड फिल्मों जैसे ‘किलर रोबोट्स’ का ख्याल आता है, लेकिन हाल ही में, शोधकर्ताओं ने एक ऐसे खतरे की ओर इशारा किया है जो बिना शोर मचाए हम पर हावी हो रहा है। जी हां, हमारी स्वतंत्र रूप से सोचने, तर्क करने और सही फैसले लेने की क्षमता का धीरे-धीरे कम होना।
ऑक्सफोर्ड, एमआईटी, कॉर्नेल और कार्नेगी मेलन जैसी दुनिया की जानी-मानी यूनिवर्सिटीज के 30 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने एक नई रिसर्च पब्लिश की है। उन्होंने इस नए खतरे को “एपिस्टेमिक रिस्क” का नाम दिया है। इसका अर्थ यह है कि अगर इंसान अपने सोचने समझने की शक्ति को खो देगा तो वैज्ञानिक विकास और एआई को संभालने की जरूरत पड़ सकती है।

Artificial intelligence: एआई के आगे झुकने वाली समस्या

रिसर्च में एआई की “जी हुजूरी” करने की आदत पर भी गंभीर चिंता जताई गई है। एआई मॉडल्स को इस तरह से बनाया और ट्रेन किया जाता है कि वे यूजर को खुश रखें। ऐसे में, वे यूजर की गलत बातों या मान्यताओं पर सवाल उठाने के बजाय, बस उसमें ‘हां में हां’ मिलाते हैं। इंटरनेट पर एआई द्वारा तैयार किया गया कंटेंट बड़ी तेजी से भरता जा रहा है। जब भविष्य के एआई मॉडल इसी कंटेंट को पढ़कर सीखेंगे, तो मशीनों का मशीनों से सीखने का एक लूप बन जाएगा। इससे दुनिया में विचारों, नजरियों और अभिव्यक्ति की विविधता खत्म होने का डर है।

वैज्ञानिकों के द्वारा बताए गए समाधान क्या हैं?

Artificial intelligence: इन तमाम चिंताओं और चेतावनियों के बावजूद, वैज्ञानिकों का यह बिल्कुल नहीं कहना है कि एआई के विकास को रोक देना चाहिए। इसके बजाय, वे इन 3 समाधानों पर जोर देते हैं: जिम्मेदार डिजाइन: एआई सिस्टम्स को ज्यादा समझदारी से डिजाइन किया जाए ताकि वे इंसानी सोच को चुनौती दे सकें, न कि सिर्फ चापलूसी करें। शिक्षा में बदलाव: शिक्षा प्रणाली में ऐसे तरीके अपनाए जाएं जो इंसानों की ‘तर्क करने की शक्ति’ को मजबूत करें। तत्काल एक्शन: एआई से होने वाले इन मानसिक और सामाजिक खतरों पर तुरंत ध्यान देकर जरूरी कदम उठाए जाएं, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

 

Written By: Anushka Pandey

 

 

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