China Egypt Relations: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इन दिनों मिस्र के दौरे पर हैं। पहली नजर में यह यात्रा चीन और मिस्र के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों को मजबूत करने की एक सामान्य कोशिश लग सकती है। लेकिन इसके पीछे की तस्वीर काफी बड़ी है।अमेरिका के सबसे बड़े वैश्विक प्रतिद्वंद्वी चीन के संबंध अब अमेरिका के एक बेहद महत्वपूर्ण मिडिल ईस्ट सहयोगी मिस्र के साथ तेजी से मजबूत हो रहे हैं। चीन ऐसे समय में इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जब मिडिल ईस्ट की राजनीति और शक्ति का संतुलन लगातार बदल रहा है।
मिडिल ईस्ट में अपनी अलग छवि बनाना चाहता है चीन
शी जिनपिंग की कोशिश चीन को मिडिल ईस्ट में शांति और स्थिरता लाने वाली ताकत के तौर पर पेश करने की है। इसके उलट अमेरिका पिछले कई दशकों से इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों में शामिल रहा है। ईरान के साथ छह महीने तक चला युद्ध इसका सबसे नया उदाहरण है।वॉशिंगटन स्थित कार्नेगी मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के निदेशक अमर हमजावी ने इस साल कैथरीन सेल्फ के साथ लिखे एक पेपर में चीन और अमेरिका की रणनीति की तुलना की थी। उनके मुताबिक, चीन लगातार अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ यानी बिना सैन्य ताकत के अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जबकि अमेरिका की सॉफ्ट पावर को खुद अमेरिका की नीतियों से नुकसान पहुंच रहा है।
China Egypt Relations: 10 साल बाद मिस्र पहुंचे शी जिनपिंग
शी जिनपिंग मंगलवार शाम मिस्र की राजधानी काहिरा पहुंचे। उनके स्वागत के लिए एयरपोर्ट को चीन और मिस्र के झंडों से सजाया गया था। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी और सैन्य गार्डों ने रेड कार्पेट समारोह में शी का स्वागत किया।दोनों देशों के नेता बुधवार को महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत करने वाले हैं। शी जिनपिंग गीजा के पिरामिडों के पास बने ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम का दौरा भी करेंगे।शी मिस्र में तीन दिन रहेंगे। करीब 10 साल बाद यह उनकी पहली मिस्र यात्रा है। साथ ही, 2022 में सऊदी अरब की यात्रा के बाद यह मिडिल ईस्ट का उनका पहला दौरा है। दूसरी ओर, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी पिछले कुछ वर्षों में कई बार चीन की यात्रा कर चुके हैं।

मिस्र के लिए चीन क्यों बन रहा है जरूरी?
मिस्र चीन के साथ बढ़ते रिश्तों को अपनी रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत और विविध बनाने के तरीके के तौर पर देखता है। इसका सीधा मतलब है कि काहिरा केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता और चीन के साथ भी अपने संबंध मजबूत करना चाहता है।2023 में मिस्र को BRICS में शामिल होने का न्योता मिला था। इस समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे बड़े उभरते देश शामिल हैं। BRICS को पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाले G7 जैसे संस्थानों के संभावित संतुलन के तौर पर भी देखा जाता है।इसके एक साल बाद मिस्र और चीन ने बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव यानी BRI के तहत सहयोग के कई समझौते किए।
China Egypt Relations: चीन ने मिस्र में अरबों डॉलर लगाए
BRI शी जिनपिंग की प्रमुख वैश्विक योजनाओं में से एक है। इसके तहत चीन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सड़क, रेल, ऊर्जा और दूसरी बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश करता है।चीन अब तक मिस्र में 10 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश कर चुका है। इसमें काहिरा के पूर्वी हिस्से में बनाया जा रहा एक बिजनेस हब और नील डेल्टा में औद्योगिक क्षेत्रों के लिए इलेक्ट्रिक रेल लाइन जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार करीब 20 अरब डॉलर का है। इसकी तुलना में 2025 में अमेरिका और मिस्र के बीच व्यापार 15.7 अरब डॉलर रहा।हालांकि, इन आंकड़ों के बावजूद मिस्र अमेरिकी सुरक्षा रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। मिस्र और अमेरिका के नेताओं के बीच भी लंबे समय से करीबी संबंध हैं।
चीन की नजर सिर्फ मिस्र पर नहीं
मिडिल ईस्ट में चीन की रणनीति केवल मिस्र तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बीजिंग ने इस क्षेत्र के अलग-अलग देशों के बीच संबंध सुधारने और अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने की लगातार कोशिश की है।2023 में चीन ने ईरान और सऊदी अरब के बीच राजनयिक संबंध दोबारा स्थापित कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।ईरान चीन का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी और तेल सप्लायर है। वहीं, सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका का प्रमुख सहयोगी रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच समझौता कराने में चीन की भूमिका ने दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया।इससे यह संकेत मिला कि चीन अब मिडिल ईस्ट में प्रभाव के मामले में अमेरिका को चुनौती देने की क्षमता दिखाना चाहता है।हालांकि, बाद में सऊदी अरब और ईरान के रिश्तों में फिर तनाव देखने को मिला। ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के दौरान सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों को भी निशाना बनाया। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था।
China Egypt Relations: फिलिस्तीन मुद्दे पर भी चीन की सक्रियता
चीन लंबे समय से इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता आया है। अरब देशों में इसे मिडिल ईस्ट में स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।2023 में हमास के इजरायल पर हमले और गाजा युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले शी जिनपिंग ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की मेजबानी की थी।इस दौरान चीन ने फिलिस्तीनी अथॉरिटी के साथ ‘रणनीतिक साझेदारी’ की घोषणा भी की थी।इस तरह चीन खुद को केवल आर्थिक ताकत के तौर पर नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट के विवादों में संभावित मध्यस्थ के रूप में भी पेश करने की कोशिश कर रहा है।
स्वेज नहर ने बढ़ाई मिस्र की रणनीतिक अहमियत
शी जिनपिंग की मिस्र यात्रा में स्वेज नहर का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण है।ईरान युद्ध के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे समय में मिस्र के नियंत्रण वाली स्वेज नहर ऊर्जा की आपूर्ति को बाहर ले जाने के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई है।जकार्ता स्थित ‘सेंटर ऑफ इकोनॉमिक एंड लॉ स्टडीज’ के मिडिल ईस्ट विशेषज्ञ मुहम्मद जुल्फिकार रहमत के मुताबिक, चीन के पास उस देश के साथ अपने संबंध मजबूत करने की बड़ी वजह है, जिसके नियंत्रण में यह खुला और महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है।रहमत के अनुसार, शी जिनपिंग मिस्र को व्यापक अरब और अफ्रीकी दुनिया तक पहुंच बनाने के एक आधार के रूप में देखते हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका के पास पहले की तुलना में इस क्षेत्र पर ध्यान देने के लिए कम समय है।खास बात यह भी है कि चीन और मिस्र के बीच सैन्य सहयोग भी बढ़ रहा है। दोनों देशों ने हाल ही में कई दिनों तक हवाई सैन्य अभ्यास किया था।
China Egypt Relations: ईरान से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है चीन
मिस्र पहुंचने से पहले शी जिनपिंग ने शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO की दो दिवसीय बैठक में हिस्सा लिया था।SCO 10 देशों का राजनीतिक और सुरक्षा संगठन है। इसे अमेरिकी वैश्विक प्रभाव के संभावित संतुलन के तौर पर भी देखा जाता है।किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुई इस बैठक में रूस, भारत, पाकिस्तान और ईरान के नेताओं ने भी हिस्सा लिया था।शी का मिस्र दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान के वित्तीय संबंधों पर अपना ‘आर्थिक हमला’ और तेज कर दिया है।अमेरिकी प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान को उसके बचे हुए आर्थिक साझेदारों से भी अलग करना है। लेकिन इस रणनीति के सामने चीन एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।चीन ईरान से काफी बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। ईरान के तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा चीन को जाता है। हालांकि, यह व्यापार आमतौर पर अप्रत्यक्ष माध्यमों से होता है।बीजिंग का कहना है कि ईरान के साथ उसका व्यापार हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप रहा है।
अमेरिका के लिए क्या है सबसे बड़ी चुनौती?
इन सभी घटनाक्रमों का सबसे बड़ा संकेत यह है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका का सबसे प्रभावशाली बाहरी शक्ति बने रहना अब पहले जितना आसान नहीं हो सकता।अमेरिका के पास अभी भी इस क्षेत्र में मजबूत सैन्य मौजूदगी, पुराने गठबंधन और मिस्र, सऊदी अरब तथा इजरायल जैसे महत्वपूर्ण साझेदार हैं।लेकिन चीन भी अब पीछे नहीं है। बीजिंग पैसा, व्यापार, बुनियादी ढांचा, कूटनीति और धीरे-धीरे सैन्य सहयोग के जरिए मिडिल ईस्ट में अपनी अलग जगह बना रहा है।इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरी दुनिया में शक्ति के संतुलन यानी वर्ल्ड ऑर्डर पर भी असर पड़ सकता है।
China Egypt Relations: क्या दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है?
अगर मिडिल ईस्ट के देश अमेरिका के साथ-साथ चीन के साथ भी मजबूत संबंध बनाने लगते हैं, तो दुनिया केवल दो बड़े शक्ति केंद्रों में बंटने के बजाय कई ताकतों वाली बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ सकती है।चीन के लिए मिस्र कई कारणों से बेहद महत्वपूर्ण है। मिस्र अरब दुनिया का एक बड़ा देश है और इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। यह अफ्रीका और यूरोप के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर मौजूद है और स्वेज नहर भी इसी के नियंत्रण में है।इसलिए मिस्र के साथ मजबूत संबंध चीन को व्यापार, ऊर्जा, समुद्री रास्तों और कूटनीति चारों क्षेत्रों में फायदा पहुंचा सकते हैं।
क्या अमेरिका को चीन की बढ़ती नजदीकी से चिंता होनी चाहिए?
अमेरिका के लिए चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन अब उसके पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्र में केवल आर्थिक निवेश तक सीमित नहीं है। वह कूटनीतिक और सैन्य साझेदारी भी मजबूत कर रहा है।हालांकि, मिस्र का चीन के करीब जाना यह साबित नहीं करता कि काहिरा अमेरिका से दूरी बना रहा है।फिलहाल मिस्र की रणनीति दोनों बड़ी ताकतों के साथ संबंध बनाए रखने और अपने विकल्प बढ़ाने की दिखाई देती है।यही अमेरिका के लिए सबसे बड़ा संदेश है। मिडिल ईस्ट में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए केवल सैन्य ताकत अब पर्याप्त नहीं होगी।चीन जिस तरह निवेश, व्यापार और कूटनीति को एक साथ इस्तेमाल कर रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए अमेरिका को भी अपनी आर्थिक और कूटनीतिक मौजूदगी मजबूत करनी होगी।








