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7वीं सदी का 700 एकड़ में फैला चित्तौड़गढ़ किला, जहां भीम के पैर से बना था ऐतिहासिक जलाशय

चित्तौड़गढ़ किला: शौर्य की धरती

Chittorgarh Fort: राजस्थान अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां कई भव्य मंदिर, किले और महल मौजूद हैं, जिनकी बनावट, सुंदरता और इंजीनियरिंग आज भी लोगों को आश्चर्य में डाल देती है। साथ ही ये स्थान वीरता और बलिदान की अमर कहानियों को भी अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन्हीं में से एक है चित्तौड़गढ़ किला, जो राजपूताना के शौर्य और गौरव का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

7वीं शताब्दी में बना विशाल किला

चित्तौड़गढ़ किला 7वीं शताब्दी में बनाया गया था और यह लगभग 700 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इसे राजपूतों की अदम्य हिम्मत और गौरव का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में भीम ने यहां अपने पैर से भूमि पर प्रहार किया था, जिससे एक जलाशय बना, जिसे आज भीमताल कुंड कहा जाता है। यह किला 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जिसकी लंबाई करीब 6 किलोमीटर और चौड़ाई लगभग 1500 मीटर है।

Chittorgarh Fort:  चित्तौड़गढ़ किला: शौर्य की धरती
चित्तौड़गढ़ किला: शौर्य की धरती

किले की भव्य संरचना और ऐतिहासिक इमारतें

किले की बाहरी दीवार लगभग 13 किलोमीटर लंबी है, जो पूरे परिसर को घेरती है। इस ऐतिहासिक किले में कुल 65 प्रमुख संरचनाएं मौजूद हैं, जिनमें 4 महल, 19 बड़े मंदिर, 20 जलाशय, कई स्मारक और विजय स्तंभ शामिल हैं। माना जाता है कि इसका निर्माण 7वीं शताब्दी में मौर्य वंश के राजा चित्रांगद ने करवाया था।

इस किले में प्रवेश के लिए सात शानदार द्वार बनाए गए हैं राम पोल, लक्ष्मण पोल, पाडल पोल, गणेश पोल, जोरला पोल, भैरों पोल और हनुमान पोल। इनमें सूर्य पोल सबसे प्रमुख और मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता है।

Chittorgarh Fort:  वीरता, युद्ध और बलिदान की ऐतिहासिक गाथाएं

चित्तौड़गढ़ किले ने इतिहास की कई बड़ी घटनाओं को देखा है। इसमें अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण, रानी पद्मिनी का जौहर और गोरा-बादल का बलिदान शामिल है। इन घटनाओं ने इस किले को वीरता और त्याग का प्रतीक बना दिया। राजपूत वीरों और वीरांगनाओं ने अपनी आन-बान और शान की रक्षा के लिए अद्भुत संघर्ष किया।

किले की आकर्षक वास्तुकला और लाइट एंड साउंड शो

चित्तौड़गढ़ किले की वास्तुकला बेहद खूबसूरत है। यहां की बारीक नक्काशी, विशाल स्तंभ और प्राचीन मंदिर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। शाम के समय होने वाला लाइट एंड साउंड शो किले के इतिहास को जीवंत कर देता है। इसमें युद्ध, जौहर और राजपूत वीरता की कहानियां रोशनी और ध्वनि के माध्यम से प्रस्तुत की जाती हैं। यह शो प्रतिदिन शाम 7 बजे से 8 बजे तक हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में होता है। 

किले के पास स्थित फोर्ट रोड मार्केट पर्यटकों के लिए खास आकर्षण है। यहां पारंपरिक राजस्थानी हस्तशिल्प, बांधनी कपड़े, कढ़ाई वाले परिधान, लकड़ी के खिलौने और मिट्टी के बर्तन आसानी से मिल जाते हैं।

चित्तौड़गढ़ किला: शौर्य की धरती
चित्तौड़गढ़ किला: शौर्य की धरती

प्राचीन नागरी गांव और बरोली मंदिर समूह

किले से लगभग 15 किलोमीटर दूर नागरी गांव स्थित है, जिसका इतिहास 443 ईसा पूर्व तक जाता है। इसे प्राचीन समय में माध्यमिका कहा जाता था और यह मौर्य व गुप्त काल में समृद्ध रहा। इसके अलावा, रावतभाटा का बरोली मंदिर समूह 9वीं शताब्दी की गुर्जर-प्रतिहार शैली का शानदार उदाहरण है।

राजपूताना गौरव का जीवंत प्रतीक

चित्तौड़गढ़ किला केवल एक पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि यह राजपूत संस्कृति, वीरता और बलिदान की जीवंत कहानी है। यह स्थान इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों को राजपूताना के गौरव को करीब से महसूस करने का अवसर देता है।

चित्तौड़गढ़ पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर का महाराणा प्रताप एयरपोर्ट (यूडीआर) है। वहीं निकटतम रेलवे स्टेशन चित्तौड़गढ़ जंक्शन (सीओआर) है।

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