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क्या सीजेपी ने मानी हार या चल रही है कोई नई चाल? अभिजीत दीपके की अपील के पीछे क्या है रणनीति

सीजेपी के प्रदर्शन पर ब्रेक, क्या है वजह?
सीजेपी के प्रदर्शन पर ब्रेक, क्या है वजह?

CJP Protest Strategy: मई 2026 में अपनी शुरुआत के बाद से कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) लगातार केंद्र सरकार और देश की राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाती रही है। हालांकि, विजयादशमी के मौके पर पार्टी के संस्थापक और संयोजक अभिजीत दीपके के एक संदेश के बाद उसके आंदोलन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। दीपके ने अपने समर्थकों से कुछ दिनों तक प्रदर्शन से दूर रहकर परिवार के साथ त्योहार मनाने की अपील की। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सीजेपी कमजोर पड़ रही है या फिर इसके पीछे कोई खास रणनीति है। आइए, पार्टी के अब तक के आंदोलनों, मौजूदा हालात और इस फैसले की संभावित वजहों को समझते हैं।

CJP Protest Strategy: दीपके की अपील, परिवार संग मनाएं त्योहार

दशहरे के दिन जारी करीब 16 मिनट के वीडियो में अभिजीत दीपके भावुक नजर आए। उन्होंने पिछले कुछ हफ्तों के संघर्ष का जिक्र करते हुए समर्थकों से कुछ समय के लिए अपने परिवार के साथ रहने और त्योहार मनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि सीजेपी के सदस्यों के साथ-साथ उनके परिवारों के लिए भी यह दौर काफी मुश्किल रहा है।दीपके ने पार्टी के दो सह-संयोजकों, आशुतोष रांका और सौरव दास की गैर-मौजूदगी पर भी दुख जताया। दोनों फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं। उन्होंने कहा कि आंदोलन में शामिल होना उनका अपना फैसला था, लेकिन इसकी कीमत उनके परिवारों को भी चुकानी पड़ रही है।दीपके ने समर्थकों से कहा कि वे कुछ दिनों तक अपने परिवारों के साथ समय बिताएं, क्योंकि त्योहार आने वाले हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि आशुतोष और सौरव इस समय अपने परिवारों के साथ नहीं हैं। इसलिए पार्टी के बाकी सदस्यों को उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानते हुए उनके साथ खड़े रहना चाहिए।

सीजेपी की शुरुआत से लेकर बड़े आंदोलनों तक का सफर

सीजेपी की स्थापना 16 मई 2026 को हुई थी। इसकी शुरुआत ऑनलाइन हुई, जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की ओर से व्यवस्था के कुछ लोगों के लिए कथित तौर पर ‘परजीवी’ और ‘कॉकरोच’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के बाद इस संगठन का गठन किया गया। शुरुआत के कुछ ही समय में इसके सोशल मीडिया खातों पर लाखों फॉलोअर्स हो गए। इस लोकप्रियता के कारण इसने कई स्थापित राजनीतिक दलों को भी पीछे छोड़ दिया।

CJP Protest Strategy: सीजेपी के प्रदर्शन पर ब्रेक, क्या है वजह?
सीजेपी के प्रदर्शन पर ब्रेक, क्या है वजह?
CJP Protest Strategy: नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आंदोलन

जून और जुलाई 2026 में सीजेपी ने नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू किया। 6 जून को अमेरिका से भारत लौटने के बाद अभिजीत दीपके ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन से दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। इस आंदोलन में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई।

36 दिनों तक चला अनशन, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई

28 जून को सोनम वांगचुक ने आमरण अनशन शुरू किया, जिसके बाद आंदोलन और तेज हो गया। यह अनशन 36 दिनों तक चला। इस दौरान प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। लेख के अनुसार, कार्रवाई के दौरान पैलेट गन का भी इस्तेमाल किया गया।

आंदोलन के दौरान सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता गया। इसके बाद 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। सीजेपी ने इसे अपनी बड़ी सफलता बताते हुए आंदोलन वापस लेने की घोषणा की।

CJP Protest Strategy: अगस्त में शुरू हुआ ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान

नीट आंदोलन के बाद सीजेपी ने अगस्त 2026 में अपने अभियान का दायरा बढ़ाया। संगठन ने देशभर में ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया। इसके तहत सरकारी और अन्य स्कूलों में खराब बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को उठाते हुए सरकार का ध्यान इन मुद्दों की ओर खींचने की कोशिश की गई।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ भी खोला मोर्चा

सितंबर के आखिरी दिनों में सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन करने का ऐलान किया। यह विरोध मतदाता सूची से जुड़ी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर था। इस तरह संगठन ने शिक्षा के मुद्दों के साथ चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर भी सरकार और संबंधित संस्थाओं को घेरने की कोशिश की।

CJP Protest Strategy: आशुतोष रांका और सौरव दास की गिरफ्तारी से बढ़ी मुश्किलें

सीजेपी के आंदोलन पर फिलहाल ब्रेक लगने के पीछे एक बड़ी वजह संगठन के नेतृत्व से जुड़ी समस्याएं मानी जा रही हैं। आशुतोष रांका और सौरव दास की गिरफ्तारी के बाद यह संकट और गहरा गया है।अभिजीत दीपके ने अपने वीडियो संदेश में भी स्वीकार किया कि सीजेपी के प्रदर्शनों की योजना बनाने और उनकी रणनीति तैयार करने में रांका और दास की अहम भूमिका थी। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचना से बाहर किए जाने के बावजूद वहां तिरंगा लेकर प्रवेश करने के मामले में पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया था। फिलहाल वे न्यायिक हिरासत में हैं।

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16 अक्टूबर का तिरंगा मार्च क्यों नहीं हो पाया सफल?

16 अक्टूबर को प्रस्तावित तिरंगा मार्च भी सीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। उस समय अभिजीत दीपके खुद हिरासत में ले लिए गए थे, जबकि आशुतोष रांका और सौरव दास जेल में थे। संगठन ने दावा किया था कि उसके पास आगे बढ़ने के लिए एक वैकल्पिक योजना यानी ‘प्लान बी’ मौजूद है।हालांकि, कनॉट प्लेस में मार्च का नेतृत्व करने के लिए कोई बड़ा पदाधिकारी सामने नहीं आया। इससे संगठन के सामने नेतृत्व की कमी की समस्या साफ दिखाई दी। पार्टी के प्रमुख चेहरों की गैर-मौजूदगी में आंदोलन को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।ऐसे में माना जा रहा है कि दीपके को उम्मीद होगी कि दिवाली तक दोनों सह-संयोजकों को जमानत मिल जाए। उनके बाहर आने के बाद संगठन अपनी आगे की रणनीति पर नए सिरे से काम कर सकता है।

CJP Protest Strategy: ‘रेजिम चेंज’ की बहस से दूरी बनाना भी हो सकता है वजह

सीजेपी के प्रदर्शन रोकने के फैसले के पीछे मौजूदा राजनीतिक माहौल को भी एक वजह माना जा रहा है। हाल ही में यूरोप, खासकर फ्रांस में शिक्षा सुधारों और किराए की ऊंची दरों को लेकर शुरू हुए प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया था। इन घटनाओं के दौरान दुकानों में आगजनी और लूटपाट की खबरें भी सामने आई थीं।भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत सहित कई नेताओं ने भी देश को अस्थिर करने की कोशिश करने वाली कथित विदेशी ताकतों और बांग्लादेश जैसी सत्ता परिवर्तन की स्थितियों को लेकर चेतावनी दी है।ऐसे माहौल में सीजेपी के प्रदर्शनों की तुलना अंतरराष्ट्रीय विरोध आंदोलनों और सत्ता परिवर्तन से जुड़ी चर्चाओं से की जाने लगी। माना जा रहा है कि संगठन इस बात को समझ रहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में कोई बड़ा या उग्र प्रदर्शन उसके लिए राजनीतिक और कानूनी मुश्किलें बढ़ा सकता है।इसलिए दिवाली तक आंदोलन रोकना विवादों से बचने और सुरक्षा एजेंसियों की सख्ती के बीच कुछ समय पाने का एक तरीका हो सकता है। हालांकि, यह संगठन की रणनीति को लेकर एक संभावित आकलन है, न कि उसके फैसले के पीछे बताई गई कोई निश्चित वजह।

सीजेपी का ब्रेक, कमजोरी या नई रणनीति?

अब तक के घटनाक्रम को देखें तो अभिजीत दीपके की ओर से समर्थकों को कुछ समय के लिए प्रदर्शन रोकने की अपील को मौजूदा परिस्थितियों में रणनीतिक कदम के तौर पर भी देखा जा सकता है। संगठन के प्रमुख नेताओं की गैर-मौजूदगी, उनके परिवारों पर पड़ रहा दबाव और मौजूदा राजनीतिक माहौल ने सीजेपी के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।फिलहाल संगठन ने अपने आक्रामक रुख को कुछ समय के लिए धीमा करने का संकेत दिया है। लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि सीजेपी कमजोर पड़ गई है या उसने स्थायी रूप से आंदोलन छोड़ने का फैसला कर लिया है।अब सबकी नजर दिवाली के बाद के घटनाक्रम पर रहेगी। यदि आशुतोष रांका और सौरव दास को जमानत मिलती है, तो संगठन अपनी रणनीति में बदलाव कर सकता है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि सीजेपी दोबारा बड़े आंदोलनों के साथ मैदान में उतरती है या अपनी आगे की दिशा बदलती है।