Dutee Chand Journey: कुछ खिलाड़ी मैदान पर इतिहास रचते हैं, तो वहीं कुछ खिलाड़ियों की मैदान तक पहुँचने की जंग ही ऐतिहासिक हो जाती है।ऐसी ही एक कहानी है ओडिशा के जाजपुर जिले के चाका गोपालपुर गाँव से आने वाली दूती चंद की।जहाँ न बड़े स्टेडियम थे, न ऐसी सुविधाएँ थीं, जिनसे एक इंटरनेशनल एथलीट तैयार हो सके।दूती चंद के पिता बुनकर थे और माँ घर संभालती थीं। परिवार बड़ा था, कमाई सीमित थी, लेकिन दूती के अंदर अनाज से कहीं ज्यादा दौड़ की भूख थी।
बचपन और शुरुआती दौड़
बचपन में दूती अपनी बहनों के साथ खेतों और कच्ची सड़कों पर दौड़ा करती थीं। उनकी रफ्तार धीरे-धीरे लोगों की नजरों में आने लगी। गाँव की दौड़ से शुरू हुआ सफर जिला और राज्य स्तर तक पहुँच गया।जल्द ही कोचों ने भी उनकी प्रतिभा को पहचान लिया और दूती को प्रोफेशनल ट्रेनिंग मिलने लगी। अपनी मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने नेशनल लेवल पर एक अलग पहचान बना ली। लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी।

Dutee Chand Journey: करियर पर बड़ा संकट
साल 2014 में कॉमनवेल्थ गेम्स से ठीक पहले दूती चंद को हाइपरएंड्रोजेनिज्म पॉलिसी के तहत प्रतियोगिताओं से बाहर कर दिया गया। यह फैसला उनके करियर को खत्म कर सकता था।लेकिन दूती ने हार नहीं मानी। उन्होंने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। दो साल की लंबी लड़ाई के बाद फैसला उनके पक्ष में आया और वह दोबारा ट्रैक पर लौट आईं।

शानदार वापसी
वापसी के बाद दूती और भी मजबूत बनकर उभरीं।2018 एशियन गेम्स में उन्होंने 100 मीटर और 200 मीटर रेस में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। वह ग्लोबल स्तर पर स्प्रिंट इवेंट में गोल्ड जीतने वाली भारत की पहली एथलीट भी बनीं।जिस लड़की ने ओडिशा के एक छोटे से गाँव से दौड़ना शुरू किया था, उसने दुनिया को दिखा दिया कि असली जीत सिर्फ मेडल की नहीं, बल्कि हर उस रुकावट पर होती है, जो आपको रोकने की कोशिश करे।
ये थी दूती चंद की कहानी…एक ऐसी धाविका की, जिसने सिर्फ रेस नहीं जीती, बल्कि अपने हक के लिए लड़ी गई सबसे बड़ी दौड़ भी जीती।
Written by- Mahi Modi
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