France Protests: श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और भारत से शुरू हुए छात्र आंदोलनों की चर्चा अब यूरोप के कई देशों तक पहुंच गई है। स्पेन, फ्रांस, पुर्तगाल और बेल्जियम जैसे देशों में भी विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। फ्रांस में स्थिति खास तौर पर गंभीर हो गई है, जहां प्रदर्शन के दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं सामने आई हैं। सितंबर में कुछ स्कूलों के छात्रों से शुरू हुआ यह आंदोलन अक्टूबर तक कई हिस्सों में फैल गया। हालात बिगड़ने के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को वीडियो जारी करके लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करनी पड़ी।
France Protests: राष्ट्रपति मैक्रों ने क्या कहा?
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रविवार को एक वीडियो जारी कर प्रदर्शनकारियों से हिंसा रोकने और शांति बनाए रखने की अपील की। देश को संबोधित करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि फ्रांस के लोग अपने ही देश के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश में जो कुछ हो रहा है, उसे किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता। मैक्रों ने यह भी कहा कि हिंसा की घटनाओं को लेकर सभी को शर्म महसूस हो रही है।शनिवार और रविवार को हुई हिंसक घटनाओं के बाद राष्ट्रपति के खिलाफ लोगों का गुस्सा भी सामने आया। हालांकि, मैक्रों ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे लोगों की शिकायतें जायज हैं। उनकी मांगों और उन लोगों की गतिविधियों को एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए, जो तोड़फोड़ और हिंसा कर रहे हैं।

फ्रांस में विरोध प्रदर्शन की वजह क्या है?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के पीछे महंगाई, शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक असमानता, सरकारी खर्च और राजनीति से जुड़ी समस्याओं को लेकर लोगों में लंबे समय से बना असंतोष है। ईंधन और रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों के दाम बढ़ने से लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। इसके अलावा, स्कूलों में शिक्षकों की कमी और सार्वजनिक सेवाओं की खराब स्थिति भी लोगों की नाराजगी की प्रमुख वजहों में शामिल हैं।इन समस्याओं को लेकर लोगों का गुस्सा अब सड़कों पर दिखाई दे रहा है। प्रदर्शनकारी सरकार से इन मुद्दों पर ध्यान देने और समस्याओं का समाधान करने की मांग कर रहे हैं।
France Protests: स्कूलों से शुरू हुआ आंदोलन बड़े शहरों तक पहुंचा
रॉयटर्स के अनुसार, पेरिस, मार्सेई, लियोन, बोर्डो और लिमोज जैसे बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन का असर सबसे ज्यादा देखने को मिल रहा है। इस आंदोलन की शुरुआत पेरिस के उत्तरी इलाकों में स्थित कुछ स्कूलों से हुई थी। वहां छात्रों और उनके परिवारों ने शिक्षकों की कमी को लेकर शिकायतें की थीं। शिक्षकों की पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण पढ़ाई प्रभावित हो रही थी।इसके अलावा, स्कूलों की इमारतों और कक्षाओं की खराब हालत भी नाराजगी की वजह बनी। शुरुआत में इन समस्याओं को लेकर विरोध किया गया, लेकिन धीरे-धीरे आंदोलन तेज होता गया और कुछ जगहों पर इसने हिंसक रूप ले लिया।

पिछले 2-3 दिनों में बढ़ीं हिंसा की घटनाएं
शुरुआत में शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा यह आंदोलन पिछले 2-3 दिनों में काफी उग्र हो गया। 16, 17 और 18 अक्टूबर को फ्रांस के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा की कई घटनाएं हुईं, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई।पेरिस और मार्सेई में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने दुकानों में तोड़फोड़ करने और सामान लूटने की कोशिश की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने भी बल प्रयोग किया। इन घटनाओं के बाद आंदोलन को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
France Protests: हिंसा में सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान
अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस के गृह मंत्रालय ने बताया कि इस आंदोलन में करीब 5.5 लाख लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें से ज्यादातर लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रख रहे थे। हालांकि, कुछ समूहों और संगठनों ने आंदोलन का समर्थन करते हुए पुलिस और सार्वजनिक संपत्ति को निशाना बनाया।पिछले तीन दिनों में हुई हिंसक घटनाओं के दौरान कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की गई। इससे सार्वजनिक संपत्ति को हजारों करोड़ रुपये के बराबर नुकसान पहुंचने की बात कही गई है। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव ने हालात को और बिगाड़ दिया है।
लिमोज में ऐतिहासिक टाउन हॉल का क्लॉक टावर आग में गिरा
फ्रांस के लिमोज शहर में रविवार को हिंसा की एक बड़ी घटना सामने आई। यहां प्रदर्शनकारियों ने ऐतिहासिक टाउन हॉल में आग लगा दी, जिससे इमारत पर लगा क्लॉक टावर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। आग इतनी तेजी से फैली कि टावर जलने के बाद गिर गया।रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आग लगने से टाउन हॉल की इमारत को भी भारी नुकसान पहुंचा और उसका बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया। घटना के बाद इलाके में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया।एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि टाउन हॉल में आग लगाने की घटना से संकेत मिलता है कि प्रदर्शनकारी इमारत के अंदर मौजूद लोगों की जान लेना चाहते थे। वहीं, टाउन हॉल वाले क्षेत्र के एक अधिकारी ने कहा कि अगर इमारत की मरम्मत नहीं कराई गई, तो वह अपने पद से इस्तीफा दे देंगे।

France Protests: दुकानों को नुकसान पहुंचाने वालों से वसूली जाएगी भरपाई
फ्रांस के अर्थव्यवस्था मंत्री रोलैंड लेस्क्योर ने हिंसा के दौरान नुकसान झेलने वाले कारोबारियों की मदद करने का भरोसा दिया है। उन्होंने बयान जारी कर कहा कि जो लोग तोड़फोड़ करते हैं, उन्हें नुकसान की भरपाई करनी होगी और संपत्ति की मरम्मत का खर्च भी उठाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश में अराजकता फैलाने वाले हिंसक लोगों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।फ्रांसीसी समाचार चैनल बीएफएमटीवी को एक अधिकारी ने बताया कि एक कंपनी की 50 दुकानों को नुकसान पहुंचा है। इनमें से 20 दुकानों में लूटपाट की गई। हालांकि, इस नुकसान की अनुमानित लागत के बारे में रिपोर्ट में स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया गया है, बल्कि इसे करोड़ों यूरो का बताया गया है।
क्या 2027 के राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा आंदोलन का असर?
फ्रांस में चल रहे हिंसक विरोध प्रदर्शन को अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने कहा था कि विपक्षी दल अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले छात्रों के गुस्से का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।इस तरह की चर्चाओं की एक वजह यह भी है कि ‘येलो वेस्ट’ आंदोलन के चर्चित कार्यकर्ता जेरोम रोड्रिग्स ने शनिवार को होने वाले प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए सोशल मीडिया के जरिए लोगों से अपील की थी।
रोड्रिग्स ने एक वीडियो जारी कर कहा था कि इन विरोध प्रदर्शनों के जरिए उन लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए, जो सम्मान के साथ जीवन जीना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों की परेशानियों का जिक्र किया, जिन्हें अब हर खर्च का हिसाब रखना पड़ता है और खाने की जरूरत पूरी करने तथा गाड़ी चलाने के खर्च के बीच चुनाव करना पड़ता है।उन्होंने कहा, “गुस्से की कोई राजनीतिक पार्टी नहीं होती। खाली फ्रिज की भी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं होती।”इस तरह फ्रांस में बढ़ता विरोध अब केवल शिक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया है। हिंसक घटनाओं, सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान और आगामी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हो रही चर्चाओं ने इस आंदोलन को और महत्वपूर्ण बना दिया है।








