G7 Summit: जी -7 के मुख्य औद्योगिक देश, जो अपने को लोकतांत्रिक मानते हैं, उनका सम्मेलन फ्रांस में हो रहा है, वहां हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गये हैं, जी-7 के सम्मेलन का सार निकल रहा है कि रूस पर तेल का सैंक्सन फिर से लगाया जाए, ताकि यूक्रेन को नाटो में संरक्षण दिया जाता रहे। रूस को यह पसंद नहीं, क्योंकि कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहा यूक्रेन नाटो के ग्रिप में है। मुख्य लड़ाई यही है कि सीमा के पास यूक्रेन या तो स्वतंत्र रहे, या फिर रूस के फेडरेशन का हिस्सा बना रहे, पर यूरोपियन यूनियन येन-केन प्रकारेण ही नाटो में सम्मिलित करने की पूर्ण कोशिश कर रही है। यह स्थिति ऐसी ही बनी हुई है- जैसे दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्त होने पर यूरोप, पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बंटकर बर्लिन की दीवार के रूप में खडा रहा। उसी दौरान रूस से अपने को सुरक्षित करने के लिए नार्थ अटलांटिक संगठन यानी नाटो संगठन खड़ा किया गया था, वही नाटो यूरोप के नक्शे को बांट रहा है। ट्रंप भी जी-7 के सम्मिट में फिर यूक्रेन को अपनी तरफ करने के लिए, रूस के साथ ऐसी हरकतें कर रहा है कि उसका तेल कहीं न बिके सके और वह अपनी अर्थ व्यवस्था को न संभाल सके। तब ही रूस को सरंडर करवाने की कोशिश में अमेरिकी राष्ट्रपति है।
चीन के साथ रूस का सैनिक प्रशिक्षण का आरोप!
यूरोपियन यूनियन के शीर्ष कूटनीतिक अधिकारी बता रहे हैं कि चीन रूस के सैनिकों को प्रशिक्षण दे रहा है। उनका मानना है कि यूक्रेन को सबक सिखाने के लिए चीन अपनी सैन्य शक्ति का प्रशिक्षण रूस की सेना को दे रहा है। इस खतरे को यूरोपियन यूनियन भांप रही है। इसलिए चीन और रूस की दोस्ती को यूरोप के लिए खतरे की घंटी की तरह देख रही है। यूरोपियन यूनियन का एक सर्वोच्च प्रतिनिधि काजा कलास संदेह पैदा कर रहे हैं। उनका मानना है कि रायटर्स ने पिछले महीने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें कहा गया था कि चीन रूस के 200 सैनिकों को अपने यहां पिछले वर्ष प्रशिक्षण दें चुका है और उनमें से कुछ यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित हुए हैं। यूरोपियन खुपिया एजेंसी की रिपोर्ट है कि प्रशिक्षण का मुख्य उद्येश्य था कि ड्रोेन के द्वारा हमले कैसे किये जाएं। यह सहमति रूसी और चीनी आफिसर्स के बीच बीजिंग में हस्ताक्षर के साथ बनी।
इस तरह से देखा जाए, तो विश्व में आपसी गुटबाजी कम नहीं हुई है। वैसे भी जी-7 सम्मेलन जब बना था, तब उसका मकसद ही यही था कि सिर्फ लोकतंत्र में आस्था रखने वाले देश ही, जो उद्योग संपन्न देश हों, वे ही जी-7 के सदस्य बन सकते हैं। चीन और रूस को यूरोपियन यूनियन लोकतंत्रात्मक देशों मे नहीं गिनते। ऐसे परिस्थिति में ट्रंप का सुझाव यूक्रेन को रूस के खेमे में जाने से रोकना है।
लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल
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