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होर्मुज जलडमरूमध्य पर टकराव: चीन की चिंता, अमेरिका की नाकाबंदी और ईरान की भूमिका

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Iran crisis: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र बन गया है। चीन ने ईरान से साफ कहा है कि इस अहम समुद्री रास्ते से जहाजों की आवाजाही बिना किसी रुकावट जारी रहनी चाहिए। चीन, जो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, अमेरिकी नाकाबंदी से पैदा हो रहे संभावित ऊर्जा संकट को लेकर चिंतित नजर आ रहा है।

 क्या हो रहा है होर्मुज में?

युद्ध से पहले हर दिन करीब 135 जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरते थे। लेकिन हालात बिगड़ने के बाद फारस की खाड़ी में करीब 900 जहाज फंस गए। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के बाद अब तक 279 जहाज यहां से गुजर चुके हैं, जिनमें से 22 पर हमले भी हुए हैं।

Iran crisis: किन देशों के जहाज बने निशाना?

हमलों का दायरा कई देशों तक फैला है। संयुक्त अरब अमीरात के जलक्षेत्र में 8 जहाज, ओमान में 6, इराक और कतर में 2-2, जबकि बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब और ईरान के जलक्षेत्र में 1-1 जहाज पर हमला हुआ है।

Iran crisis: अमेरिका की क्या भूमिका है?

संयुक्त राज्य अमेरिका ने ओमान की खाड़ी में 12 से ज्यादा सैन्य पोत तैनात किए हैं। अमेरिकी सेना ड्रोन, रडार और गश्ती विमानों के जरिए पूरे इलाके पर नजर बनाए हुए है। नाकाबंदी अब तीसरे दिन में पहुंच चुकी है, जिससे तनाव और बढ़ गया है। गुरुवार को दो ऐसे जहाज, जो अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान से जुड़े बताए जा रहे हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य पार करके फारस की खाड़ी में पहुंच गए। इसे समुद्री रास्तों में बदलाव और नाकाबंदी को चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।

 क्या ईरान जहाजों से जुर्माना वसूल सकता है?

अंतरराष्ट्रीय कानून इस पर साफ दिशा देता है। संयुक्त राष्ट्र के तहत बना UNCLOS (समुद्री कानून) कहता है कि जलडमरूमध्य से जुड़े देश 12 समुद्री मील तक अपने क्षेत्र में नियम बना सकते हैं, लेकिन वे जहाजों की आवाजाही को पूरी तरह रोक नहीं सकते।

कानून की असली चुनौती क्या है?

Iran crisis: UNCLOS नियम तो देता है, लेकिन उसे लागू कराने का कोई मजबूत वैश्विक सिस्टम नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण (हैम्बर्ग), अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (हेग), ये संस्थाएं फैसले तो दे सकती हैं, लेकिन उन्हें लागू कराने की ताकत सीमित है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का संकेत है। चीन, अमेरिका और ईरान के बीच खींचतान का असर पूरी दुनिया की तेल सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

 

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