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हर वर्ष भगवान जगन्नाथ जाते हैं अपनी मौसी के घर, आखिर कौन थीं रानी गुंडीचा? क्या हैं पौराणिक कथाएं और मान्यताएं

भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन थीं?

Jagannath Rath Yatra: पुरी में हर साल की भांति आज विश्व की सबसे बड़ी सांस्कृतिक एवं धार्मिक यात्रा निकलने जा रही है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर सारे जगत के नाथ कहलाने वाले भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ दिव्य रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर जाने के लिए निकलते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माने जाने वाले भगवान जगन्नाथ जिस गुंडिचा मौसी से मिलने के लिए उनके घर जाते हैं, आखिर उनकी कहानी क्या है? आइए जानते हैं।

क्या है पूरी कथा

हिंदू मान्यता के अनुसार पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर और उसमें विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियों का निर्माण मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था। मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न ने श्रीमंदिर का निर्माण करवाने के बाद जब मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए योग्य पुरोहित की खोज प्रारंभ की, तो उन्हें पता चला कि यह कार्य तो सिर्फ ब्रह्मा जी ही कर सकते हैं। इसके बाद जब इंद्रद्युम्न ब्रह्मलोक जाने को तैयार हुए, तो उन्हें नारद मुनि ने बताया कि ब्रह्मा जी से मिलकर पृथ्वी पर वापस आने में कई युग लग जाएंगे। तब रानी गुंडिचा ने राजा इंद्रद्युम्न के लौटने तक समाधि लेकर तप करने का संकल्प लिया।

क्या है मान्यता?

मान्यता है कि एक समुद्री तूफान के आने के बाद मंदिर प्रकट हुआ और हनुमान जी की मदद से श्रीमंदिर की वास्तविकता सिद्ध हुई। उधर गुंडिचा को जब अपने पति यानी राजा इंद्रद्युम्न के लौटने का अहसास हुआ, तो उनकी समाधि टूट गई। जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उनके सामने एक युवा दंपत्ति था, जो उन्हें देवी मानकर पूज रहा था। तब देवी गुंडिचा ने उन्हें बताया कि वे उनकी पूर्वज हैं। इसके बाद रानी गुंडिचा राजा इंद्रद्युम्न से मिलने के लिए श्रीमंदिर पहुंचीं।

राजा ने मांगा यह वरदान

मान्यता है कि इसके बाद स्वयं ब्रह्मा जी ने यज्ञ आदि करवाकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा राजा-रानी के हाथों से करवाई। यज्ञ और पूजन के बाद भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और सुभद्रा के साथ प्रकट हुए और उन्होंने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडिचा को आशीर्वाद देते हुए वर मांगने को कहा। तब राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ से निवेदन किया कि आपके मंदिर के निर्माण और पूजन में योगदान देने वाले सभी श्रमिकों, सेवकों और पुजारियों को हमेशा सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता रहे और मेरी पत्नी, जिसने इस कार्य के लिए मातृत्व सुख का त्याग कर दिया।

ऐसे बनीं मौसी

राजा इंद्रद्युम्न के इस निवेदन पर भगवान जगन्नाथ ने रानी गुंडिचा से कहा कि आपने मेरी प्रतीक्षा एक मां की तरह की है, इसलिए आप मेरी मां जैसी हैं। इसलिए आज से आप मेरी मौसी हैं। और इसलिए वह हर वर्ष उनसे मिलने जाते हैं। जिस स्थान पर रानी ने तप किया था, वह अब गुंडिचा मंदिर के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री जगन्नाथ वहां स्वयं हर वर्ष पहुंचते हैं।

Written by – Anushka

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