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उमर अब्दुल्ला की सरकार पर संकट क्यों? 25 विधायक बागी, इस्तीफे की चेतावनी; समझिए पूरा गणित

Jammu Kashmir Politics: जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार के सामने अपनी ही पार्टी के विधायकों की नाराजगी बड़ी चुनौती बनती दिख रही है। नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के करीब 25 विधायक नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। इन विधायकों ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के सामने अपनी मांगें रखी हैं। शुक्रवार को दोनों नेताओं की नाराज विधायकों के साथ बैठक प्रस्तावित है। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि मांगें नहीं मानी गईं तो कुछ विधायक इस्तीफा दे सकते हैं। ऐसे में सवाल है कि नाराजगी की वजह क्या है? क्या इससे उमर सरकार गिर सकती है? विधानसभा में बहुमत का गणित क्या कहता है? आइए समझते हैं पूरा मामला।

उमर अब्दुल्ला की सरकार पर संकट क्यों मंडरा रहा है?

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष की शुरुआत हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद तेज हुई। 27 अक्टूबर को मंत्रिमंडल विस्तार में चार विधायकों को मंत्री बनाया गया, लेकिन कई वरिष्ठ विधायक मंत्रिमंडल में जगह पाने से रह गए। इनमें नजीर अहमद गुरेजी और मुबारक गुल जैसे नाम शामिल थे। इसके बाद पार्टी के नाराज विधायकों ने बैठकों का दौर शुरू किया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 25 विधायकों ने नेतृत्व के सामने अपनी मांगें रखी हैं। इनमें मंत्रिमंडल में बदलाव, मुख्यमंत्री के सलाहकार को हटाने और सरकार के कामकाज में विधायकों की भूमिका बढ़ाने जैसी मांगें शामिल हैं।

पहले आई रिपोर्टों में विधायकों ने 14 दिन के भीतर मांगें पूरी नहीं होने पर राजभवन जाकर समर्थन वापस लेने की चेतावनी दी थी। अब 6 नवंबर की खबरों में दावा किया जा रहा है कि मांगें नहीं मानी गईं तो कुछ विधायक इस्तीफे का रास्ता अपना सकते हैं। हालांकि, अभी तक सभी 25 विधायकों के इस्तीफे की कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।

Jammu Kashmir Politics: नाराज विधायकों की प्रमुख मांगें क्या हैं?

नाराज विधायकों की मांगों का केंद्र सरकार और पार्टी संगठन में उनकी भूमिका को लेकर है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी प्रमुख मांगें हैं: मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को पद से हटाया जाए। उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी से सड़क निर्माण विभाग वापस लिया जाए या उन्हें पद से हटाया जाए।मंत्रिमंडल में व्यापक फेरबदल किया जाए और मंत्रियों के विभागों की समीक्षा हो। सरकार से जुड़े लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराई जाए।
महत्वपूर्ण फैसलों में पार्टी के वरिष्ठ और निर्वाचित विधायकों से सलाह ली जाए।

कुछ रिपोर्टों में विधायकों की नाराजगी को केवल मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने तक सीमित नहीं बताया गया है। उनका आरोप है कि सरकार और पार्टी के बड़े फैसले सीमित लोगों के बीच लिए जा रहे हैं। विधायकों की ओर से संगठन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की मांग भी सामने आई है। हालांकि, इन मांगों और आरोपों को लेकर पार्टी नेतृत्व की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही स्थिति और साफ होगी।

क्या 25 विधायक सचमुच इस्तीफा दे सकते हैं?

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम सवाल है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि मांगें पूरी नहीं होने पर 25 विधायक इस्तीफा दे सकते हैं। वहीं, इससे पहले आई रिपोर्टों में विधायकों की ओर से 14 दिन का अल्टीमेटम और समर्थन वापस लेने की चेतावनी दिए जाने की बात कही गई थी। इन दोनों बातों में अंतर समझना जरूरी है। पार्टी नेतृत्व से नाराजगी जताना, सरकार से समर्थन वापस लेना और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना तीन अलग-अलग राजनीतिक और संवैधानिक कदम हैं। अगर विधायक केवल पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाते हैं तो सरकार का बहुमत अपने आप खत्म नहीं होता। यदि वे समर्थन वापस लेते हैं, तब भी विधानसभा में सरकार को बहुमत साबित करना पड़ सकता है। वहीं, इस्तीफा देने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफों की जांच कर उन्हें स्वीकार करने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि उमर अब्दुल्ला सरकार गिरने वाली है। शुक्रवार की बैठक और उसके बाद विधायकों का रुख इस मामले में अहम होगा।

Jammu Kashmir Politics: उमर सरकार का बहुमत का गणित क्या है?

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 90 निर्वाचित सीटें हैं। इसके अलावा कानून के तहत पांच सदस्यों को मनोनीत करने का प्रावधान है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक ये पांचों मनोनीत सीटें फिलहाल खाली हैं। 2024 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को छह और CPI(M) को एक सीट मिली थी। सरकार को निर्दलीय और अन्य विधायकों का भी समर्थन हासिल है। इस तरह NC के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन 53 विधायकों तक बताया गया है।  अब समझिए 25 विधायकों के इस्तीफे की स्थिति में क्या हो सकता है:

स्थिति                                                    विधायकों की संख्या
कुल सीटें                                                          90
NC गठबंधन का बताया गया समर्थन                      53
25 विधायक इस्तीफा दें और स्वीकार हो जाएं         28 का संभावित गठबंधन समर्थन
इस्तीफों के बाद निर्वाचित सदस्यों की संख्या                65
65 की पूरी प्रभावी बहुमत का आंकड़ा                         33

इस गणित के मुताबिक, यदि 25 विधायक वास्तव में इस्तीफा देते हैं और उनके इस्तीफे स्वीकार हो जाते हैं, तो गठबंधन का समर्थन 53 से घटकर 28 रह सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए बहुमत साबित करना मुश्किल हो सकता है। लेकिन यहां एक कानूनी और प्रक्रियागत बात समझना जरूरी है। विधानसभा में सरकार का बहुमत फ्लोर टेस्ट में तय होता है। इसमें सदन की प्रभावी सदस्य संख्या, रिक्तियां और मतदान के समय उपस्थित सदस्यों की स्थिति महत्वपूर्ण होती है। इसलिए 33 का आंकड़ा 65 की पूरी सदस्य संख्या के आधार पर संभावित बहुमत का गणित है, इसे हर परिस्थिति में फ्लोर टेस्ट का अंतिम आंकड़ा नहीं मानना चाहिए।

आगा रूहुल्लाह मेहदी के इस्तीफे से NC की मुश्किलें क्यों बढ़ीं?

नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए विधायकों की नाराजगी के बीच श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी का पार्टी छोड़ना भी बड़ा घटनाक्रम है। उन्होंने 3 नवंबर को पार्टी और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देने का ऐलान किया था। रूहुल्लाह ने पार्टी नेतृत्व पर चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनाव के दौरान जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे, अनुच्छेद 370 की बहाली और लोगों के अधिकारों की रक्षा को लेकर जो वादे किए थे, उन पर अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।

Jammu Kashmir Politics
                                                                    Jammu Kashmir Politics

उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की। 6 नवंबर को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही श्रीनगर लोकसभा सीट रिक्त हो गई।  रूहुल्लाह का पार्टी छोड़ना और विधायकों की नाराजगी दो अलग-अलग घटनाएं हैं, लेकिन दोनों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के अंदरूनी मतभेदों को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।

Jammu Kashmir Politics: कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी में नाराजगी क्यों बढ़ी?

27 अक्टूबर को हुए कैबिनेट विस्तार में नेशनल कॉन्फ्रेंस के चार विधायकों को मंत्री बनाया गया। इनमें अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू शामिल थे। वहीं, निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया।

इस विस्तार में कुछ वरिष्ठ विधायकों को मंत्री पद नहीं मिला। इनमें नजीर अहमद गुरेजी और मुबारक गुल के नाम की चर्चा थी। इसके बाद पार्टी के भीतर यह सवाल उठने लगा कि मंत्री पद और विभागों का बंटवारा किन आधारों पर किया गया। राजनीतिक दलों में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद असंतोष होना नई बात नहीं है, लेकिन जब बड़ी संख्या में विधायक एक साथ नेतृत्व के सामने मांगें रखते हैं तो यह संगठनात्मक चुनौती बन जाती है। उमर अब्दुल्ला के सामने भी यही चुनौती है कि वे नाराज विधायकों को साथ लेकर सरकार और पार्टी दोनों में संतुलन बनाए रखें।

पांच साल में तीन बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में कैसे हुई टूट?

देश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई बड़े क्षेत्रीय दलों के भीतर बगावत और विभाजन देखने को मिले हैं। शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के घटनाक्रम इसके उदाहरण हैं।

शिवसेना: जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ बगावत की। उनके साथ पार्टी के बड़ी संख्या में विधायक आ गए। इसके बाद महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और शिंदे ने BJP के समर्थन से सरकार बनाई। बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न दिया।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी: जुलाई 2023 में अजित पवार ने शरद पवार से अलग होकर अपने समर्थक विधायकों के साथ महाराष्ट्र की सरकार में शामिल होने का फैसला किया। इसके बाद NCP दो गुटों में बंट गई। चुनाव आयोग ने अजित पवार के गुट को पार्टी का नाम और घड़ी चुनाव चिह्न दिया।

तृणमूल कांग्रेस: 2026 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद TMC के भीतर बड़ा विवाद सामने आया। ममता बनर्जी और बागी गुट के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा। आयोग ने अंतरिम आदेश में दोनों गुटों को पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया और अलग-अलग नाम तथा चुनाव चिह्न आवंटित किए। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि क्षेत्रीय दलों के भीतर नेतृत्व, सत्ता में हिस्सेदारी और संगठनात्मक फैसलों को लेकर मतभेद कभी-कभी बड़े राजनीतिक संकट में बदल सकते हैं। हालांकि हर पार्टी में टूट की वजह और उसका राजनीतिक परिणाम अलग होता है।

Jammu Kashmir Politics: क्या उमर अब्दुल्ला सरकार गिर जाएगी?

फिलहाल सरकार गिरने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर नाराजगी जरूर सामने आई है, लेकिन विधायकों की मांगों, पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया और समर्थन वापसी की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला के सामने सबसे बड़ी चुनौती नाराज विधायकों को मनाने और पार्टी में एकजुटता बनाए रखने की है। यदि बातचीत से विवाद सुलझ जाता है तो सरकार पर तत्काल संकट टल सकता है। लेकिन अगर बड़ी संख्या में विधायक समर्थन वापस लेते हैं या उनके इस्तीफे स्वीकार हो जाते हैं, तो सरकार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना पड़ सकता है।

यानी फिलहाल जम्मू-कश्मीर की राजनीति में असली परीक्षा उमर अब्दुल्ला की सरकार के बहुमत से ज्यादा नेशनल कॉन्फ्रेंस के अंदरूनी प्रबंधन और नेतृत्व की है। शुक्रवार की बैठक के बाद ही साफ होगा कि यह नाराजगी बातचीत से खत्म होती है या राज्य की राजनीति में एक नया संकट खड़ा करती है।

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