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सिंधु नदी पर बना अनोखा डैम, किसानों को मिलेगा 4 करोड़ लीटर पानी का फायदा

Ladakh news: लद्दाख में पानी की कमी से जूझ रहे किसानों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। लद्दाख प्रशासन ने सिंधु नदी पर एक खास तरह का ‘रॉक चेक डैम’ तैयार किया है, जिसका उद्घाटन बुधवार को लद्दाख के उपराज्यपाल Vinai Kumar Saxena ने लेह में किया। यह परियोजना “सिंधु जल समृद्धि अभियान” के तहत बनाई गई है और इसे इलाके में जल संकट दूर करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

क्या है रॉक चेक डैम?

यह डैम पारंपरिक सीमेंट-कंक्रीट वाले बांधों से बिल्कुल अलग है। इसे नदी के तल में मौजूद बड़े-बड़े पत्थरों को आपस में फंसाकर तैयार किया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह पानी के तेज दबाव को सह सकता है और गर्मियों में नदी का जलस्तर बढ़ने पर भी आसानी से नहीं बहता। एलजी वीके सक्सेना ने कहा कि इस मॉडल की सफलता को देखते हुए अब ऐसे तीन और चेक डैम बनाने की तैयारी की जा रही है।

Ladakh news: किसानों को कैसे मिलेगा फायदा?

इस डैम का मुख्य उद्देश्य खेती के लिए पानी उपलब्ध कराना है। दरअसल, लद्दाख के कई गांवों में ग्लेशियर से निकलने वाली नदियां होने के बावजूद बुवाई के समय पानी की भारी कमी हो जाती है। पारंपरिक पंपिंग सिस्टम भी कई बार काम नहीं कर पाते। अब यह रॉक चेक डैम नदी के बहाव को धीमा करके पानी को एक बड़े तालाब की तरह जमा करता है, जिससे किसान आसानी से सिंचाई के लिए पानी ले सकेंगे।

Ladakh news: सिर्फ 10 लाख रुपये में तैयार हुआ प्रोजेक्ट

यह पायलट प्रोजेक्ट लेह से करीब 45 किलोमीटर दूर के-थांग उपशी इलाके में तैयार किया गया। 200 फुट लंबे इस डैम को बनाने में 500 किलो से लेकर 10 मीट्रिक टन तक वजन वाले पत्थरों का इस्तेमाल हुआ। करीब 180 मीट्रिक टन पत्थरों से बने इस ढांचे की लागत सिर्फ 10 लाख रुपये बताई गई है, जो इसे बेहद कम खर्च वाला इंजीनियरिंग मॉडल बनाती है।

4 करोड़ लीटर पानी जमा होने का दावा

अधिकारियों के मुताबिक, इस डैम की वजह से नदी के ऊपरी हिस्से में लगभग 500 मीटर तक पानी जमा हो गया है। अनुमान है कि यहां करीब 40 मिलियन लीटर यानी लगभग 4 करोड़ लीटर पानी स्टोर हो चुका है। अब किनारों के पास पानी की गहराई 4 से 5 फुट तक पहुंच गई है, जबकि बीच में यह करीब 10 फुट हो गई है।

पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित

Ladakh news: इस परियोजना को पर्यावरण-अनुकूल मॉडल के तौर पर भी देखा जा रहा है। चूंकि इसमें सिर्फ स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए यह हिमालयी नदियों के प्राकृतिक संतुलन को नुकसान नहीं पहुंचाता। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल सफल रहता है तो भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट से निपटने के लिए इसे बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता है।