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Mock arrest: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में INDIA ब्लॉक का यह कैसा प्रदर्शन?

Mock arrest: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में INDIA ब्लॉक का यह कैसा प्रदर्शन?
Mock arrest: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में INDIA ब्लॉक का यह कैसा प्रदर्शन?
Mock arrest: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में कथित धांधली का आरोप लगाते हुए विपक्षी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग पर अड़ी हुई हैं।इस मांग को लेकर निरंतर विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। खबर है कि इस बीच कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में एक ऐसा विरोध-प्रदर्शन हुआ जिसकी सर्वत्र चर्चा है। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल हो रहा है। इस प्रदर्शन में एक कार्यकर्ता को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का मुखौटा पहनाकर जेल की सलाखों के पीछे दिखाया गया। इतना ही नहीं मुखौटा लगाए कार्यकर्ता के हाथों में हथकड़ी भी नजर आई, यानी इंडिया गठबंधन ने मान लिया है कि SIR को लेकर दायर याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला जो भी आए, उनकी नजरों में ज्ञानेश कुमार दोषी हैं। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने

लोकतांत्रिक समाज में विरोध-प्रदर्शन की परंपरा रही। नेताओं और अधिकारियों के प्रति असंतोष जताने के लिए प्रदर्शनकारी उनके पुतले जलाते रहते हैं। तर्क दिया जा सकता है कि प्रतीकात्मक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त को सलाखों के पीछे या हथकड़ी में दिखाना प्रदर्शनकारियों के व्यापक असंतोष की परिणिति एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना होता है कि इस मुद्दे पर जनता में और भी दृष्टिकोण हो सकते हैं।खासकर तब और ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत होती है जब विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व जिम्मेदार राजनेता कर रहे हों। इस विरोध-प्रदर्शन की अगुवाई कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने की। इनके अलावा अभिनेता प्रकाश राज, CPI(M) के राज्य सचिव प्रकाश, CPI के राज्य सचिव सुंदरेश, CPI(ML) लिबरेशन के राज्य सचिव क्लिफ्टन डी’रोजारियो और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एन मंजप्पा समेत कई नेताओं ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई। 

जब कोई मामला विचाराधीन हो…
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है।इसके तहत कार्टून, व्यंग्य और विरोध प्रदर्शनों में प्रतीकात्मक मुखौटों या दृश्यों का उपयोग किया जाता रहा है।आलोचना करने वाले इसे विरोध दर्ज कराने का एक प्रतीकात्मक तरीका मानते हैं, लेकिन विरोध के दौरान यदि यह भी ध्यान रखा जाता कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ियों को लेकर दायर याचिकाओं पर अभी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आना बाकी है, तो ज्यादा उचित होता।कोई मामला अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद यदि प्रदर्शनकारी उस पर एक प्रकार से खुद ही निर्णय दे दें, तो यह विचित्र बात है।

Mock arrest: यह विरोधाभास क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भी याचिका दायर है, यानी राहुल गांधी भी उम्मीद रखते हैं कि कोर्ट से दूध का दूध और पानी का पानी होगा, फिर कर्नाटक के प्रदर्शनकारी कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त को पूरी तरह अपराधी ठहरा सकते हैं? यह वाकई विरोधाभास है।भारतीय न्यायशास्त्र का एक मूल सिद्धांत यह भी है कि जब तक किसी व्यक्ति का दोष साबित न हो जाए, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाता है। किसी को बिना कानूनी प्रक्रिया और अदालती फैसले के दोषी या कैदी के रूप में चित्रित करना मानहानि (Defamation) के दायरे में आ सकता है।फिर मुख्य चुनाव आयुक्त एक गरिमापूर्ण संवैधानिक पद है, अदालती फैसला आने से पहले सावर्वजनिक रूप से उनकी अपराधी जैसी छवि दिखाना इस पद की प्रतिष्ठा के विपरीत ही कहा जाएगा।