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अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, लेकिन जीवनभर साथ रहती है’ – मोहन भागवत का बड़ा संदेश

MOHAN BHAGWAT NEWS: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मातृत्व, भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मातृत्व केवल परिवार तक सीमित विषय नहीं, बल्कि सृष्टि के निर्माण, विकास और पालन-पोषण का मूल आधार है। उन्होंने कहा कि जीवन में अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन जरूर होती है, लेकिन वही व्यक्ति के साथ जीवनभर रहती है।

‘मातृत्व सृष्टि का आधार’

मोहन भागवत ने कहा कि मातृत्व जैसे विषय पर पुरुषों का बोलना अपने आप में विरोधाभास है, क्योंकि यह मूल रूप से महिलाओं के अनुभव और अधिकार से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि मातृत्व के बिना सृष्टि की रचना, उसका विकास और पालन-पोषण संभव नहीं है।

‘मनुष्य की विचार शक्ति उसे अलग बनाती है’

उन्होंने कहा कि प्रकृति ने सभी जीवों को जीवन दिया है, लेकिन मनुष्य को सोचने और विचार करने की विशेष क्षमता प्रदान की है। यही विचार-शक्ति उसे अन्य प्रजातियों से अलग बनाती है और चुनौतियों का समाधान खोजने में सक्षम बनाती है।

MOHAN BHAGWAT NEWS: इतिहास से सीखने की जरूरत

भारतीय इतिहास और संस्कृति का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि विदेशी आक्रमणों और बदलती परिस्थितियों के कारण समाज को कई बदलाव अपनाने पड़े, जो मूल भारतीय परंपराओं का हिस्सा नहीं थे। उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन आवश्यक हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।

‘अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक’

उन्होंने कहा कि जीवन में सीखने के कई माध्यम होते हैं। यदि मार्गदर्शन उपलब्ध हो तो व्यक्ति सहज रूप से आगे बढ़ता है, लेकिन कई बार अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक बन जाता है। अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी वही जीवनभर व्यक्ति का मार्गदर्शन करती है।

MOHAN BHAGWAT NEWS: मां का स्नेह जीवनभर सहारा देता है

भागवत ने कहा कि मां का स्नेह केवल बचपन तक सीमित नहीं होता। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह कई बार मां की बातों का विरोध करता है, लेकिन मां का रिश्ता सबसे स्थायी और भावनात्मक होता है। जीवन के हर चरण में व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है और मां वही स्थान होती है, जहां वह बिना किसी संकोच के अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है।

‘मातृत्व को सामाजिक आधार के रूप में देखें’

अपने संबोधन के अंत में सरसंघचालक ने कहा कि समाज को मातृत्व को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन के आधार के रूप में स्वीकार करना चाहिए। उनके अनुसार परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

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