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सोना-हीरा सब पड़ जाएंगे फीके, 1 ग्राम एंटीमैटर से खरीदा जा सकता है 41 करोड़ किलो सोना; जानिए दुनिया की 5 महंगी चीजें

एंटीमैटर से लाल हीरे तक, कितनी है कीमत?
एंटीमैटर से लाल हीरे तक, कितनी है कीमत?

Most Expensive Things: आमतौर पर सोना, हीरा और प्लैटिनम को दुनिया की सबसे कीमती चीजों में गिना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इनसे भी कई गुना महंगी चीजें दुनिया में मौजूद हैं? इनमें से कुछ को प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है, तो कुछ अंतरिक्ष से धरती पर लाई गई हैं। दुनिया की सबसे महंगी चीज एंटीमैटर है, जिसकी कीमत करीब 62.5 ट्रिलियन डॉलर यानी लगभग 6,000 लाख करोड़ रुपये प्रति ग्राम आंकी गई है। आइए जानते हैं दुनिया की ऐसी ही 5 बेहद महंगी चीजों के बारे में और समझते हैं कि आखिर इनकी कीमत इतनी ज्यादा क्यों है।

Most Expensive Things: फुलरीन- 1 ग्राम की कीमत करीब 1,500 करोड़ रुपये

फुलरीन एक खास तरह का नैनो मटेरियल है, जिसे वैज्ञानिक प्रयोगशाला में तैयार करते हैं। इसका पूरा नाम N@C60 यानी नाइट्रोजन एटम-बेस्ड एंडोहेड्रल फुलरीन है। यह बेहद छोटे आकार का अणु होता है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले कार्बन को वैक्यूम में गर्म किया जाता है। इससे कार्बन के 60 परमाणुओं से मिलकर फुटबॉल जैसी संरचना वाला C60 अणु बनता है, जिसे ‘बकीबॉल’ कहा जाता है। इसके बाद इस संरचना के अंदर नाइट्रोजन का एक परमाणु पहुंचाया जाता है। इसके लिए C60 की सतह पर नाइट्रोजन आयनों की बमबारी की जाती है।

यह प्रक्रिया काफी मुश्किल है। करीब 10 हजार C60 अणुओं पर बमबारी करने के बाद केवल एक N@C60 अणु तैयार होता है। इसके बाद उसे बाकी पदार्थों से अलग करना भी आसान नहीं होता। साल 1985 में ब्रिटिश वैज्ञानिक हेरॉल्ड क्रोटो ने C60 की खोज की थी। बाद में वैज्ञानिकों ने N@C60 यानी फुलरीन तैयार किया। साल 2004 में ब्रिटिश कंपनी ‘डिजाइनर कार्बन मैटेरियल्स’ ने इसे अलग करने की तकनीक विकसित की। कंपनी ने पहली बार फुलरीन का 200 माइक्रोग्राम का सैंपल 32 हजार डॉलर यानी करीब 30 लाख रुपये में बेचा था।

फुलरीन का उत्पादन भी बहुत सीमित है। कंपनी एक दिन में केवल आधा ग्राम अशुद्ध फुलरीन बना पाती है और इसे पूरी तरह शुद्ध करने में कई हफ्ते लग जाते हैं। इसकी खासियत यह है कि इसमें मौजूद नाइट्रोजन परमाणु और इलेक्ट्रॉन का मैग्नेटिक फील्ड आपस में प्रतिक्रिया करते हैं। वहीं, C60 की संरचना नाइट्रोजन को बाहरी चुंबकीय प्रभाव से बचाती है। इससे नियमित अंतराल पर बेहद सटीक ‘टिक’ जैसी आवाज पैदा होती है। यह तकनीक एटॉमिक क्लॉक में इस्तेमाल होने वाली व्यवस्था से मिलती-जुलती है। फिलहाल सैटेलाइट में इस्तेमाल होने वाली एटॉमिक क्लॉक का आकार जूते के डिब्बे जितना होता है, लेकिन फुलरीन की मदद से बेहद छोटी एटॉमिक क्लॉक बनाई जा सकती हैं। भविष्य में इन्हें मोबाइल फोन और कारों में भी लगाया जा सकता है।

कैलिफोर्नियम-252: 1 ग्राम की कीमत करीब 253 करोड़ रुपये

कैलिफोर्नियम-252 (Cf-252) एक बेहद रेडियोएक्टिव पदार्थ है, जो प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता। इसे न्यूक्लियर रिएक्टर में दूसरे परमाणुओं पर न्यूट्रॉन की बमबारी करके तैयार किया जाता है। इसे पहली बार साल 1950 में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की रेडिएशन लैब में बनाया गया था। इसी वजह से इसका नाम कैलिफोर्नियम रखा गया। फिलहाल अमेरिका की ‘ओक रिज नेशनल लैबोरेटरी’ और रूस का ‘रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ एटॉमिक रिएक्टर्स’ इसका उत्पादन करते हैं। इन दोनों संस्थानों में भी एक साल में 1 ग्राम से कम कैलिफोर्नियम-252 तैयार होता है।

यह पदार्थ बहुत ज्यादा रेडिएशन छोड़ता है, इसलिए इसे खास सुरक्षा वाले मजबूत कंटेनरों में रखा जाता है। बाजार में इसकी कीमत करीब 2.7 करोड़ डॉलर यानी लगभग 253 करोड़ रुपये प्रति ग्राम है। इसकी रेडिएशन क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका सिर्फ 1 माइक्रोग्राम हर मिनट करीब 13.9 करोड़ न्यूट्रॉन छोड़ सकता है। इसका रेडिएशन इंसानों के लिए जानलेवा हो सकता है, लेकिन नियंत्रित तरीके से इसका इस्तेमाल कई जरूरी कामों में किया जाता है।

कैलिफोर्नियम-252 का इस्तेमाल न्यूक्लियर रिएक्टर में चेन रिएक्शन शुरू करने के लिए न्यूट्रॉन के स्रोत के रूप में किया जाता है। इसके अलावा इंडस्ट्री में मशीनों के अंदर छिपी खराबी और बारीक दरारों का पता लगाने के लिए न्यूट्रॉन रेडियोग्राफी तकनीक में भी इसका उपयोग होता है। चिकित्सा क्षेत्र में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। न्यूट्रॉन शरीर की कोशिकाओं को नष्ट कर सकते हैं, इसलिए इनकी मदद से कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने की कोशिश की जाती है। इस उपचार को ‘न्यूट्रॉन ब्रैकीथेरेपी’ कहा जाता है।

Most Expensive Things: बेन्नू एस्टेरॉयड- 1 ग्राम की कीमत करीब 90 करोड़ रुपये

बेन्नू नाम का क्षुद्रग्रह भी दुनिया की सबसे महंगी चीजों में शामिल है। साल 2023 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के OSIRIS-REx मिशन ने इस क्षुद्रग्रह से पत्थर और मिट्टी जैसे नमूने धरती पर पहुंचाए थे। वैज्ञानिक बेन्नू को सौरमंडल की शुरुआत का एक तरह का ‘टाइम कैप्सूल’ मानते हैं, क्योंकि इसके नमूने करीब 4.5 अरब साल पुराने हैं। इस मिशन के लिए 8 सितंबर 2016 को OSIRIS-REx अंतरिक्ष यान रवाना किया गया था। 20 अक्टूबर 2020 को इस यान ने बेन्नू की सतह को छूकर वहां से नमूने इकट्ठा किए। इसके बाद 24 सितंबर 2023 को सैंपल से भरा कैप्सूल अमेरिका के यूटा रेगिस्तान में उतरा।

धरती पर लौटने के बाद वैज्ञानिकों को सैंपल वाले कंटेनर के दो पेंच खोलने में परेशानी हुई। आखिरकार नासा ने खास स्टील के औजारों की मदद से 10 जनवरी 2024 को इन पेंचों को खोला। इसके बाद वैज्ञानिकों को कुल 121.6 ग्राम सैंपल मिला, जिसका वजन लगभग दो टेनिस गेंदों के बराबर था।

इस सैंपल की कीमत नासा के पूरे मिशन पर हुए खर्च के आधार पर आंकी गई है। इस मिशन पर करीब 1.16 अरब डॉलर यानी लगभग 10 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। शुरुआत में वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि वे बेन्नू से केवल 60 ग्राम सैंपल ला पाएंगे, लेकिन उन्हें 121.6 ग्राम नमूना मिला। यानी अनुमान से दोगुने से भी ज्यादा सैंपल धरती पर पहुंचा। इसी वजह से इसकी प्रति ग्राम अनुमानित कीमत घटकर करीब 90 करोड़ रुपये रह गई।

बेन्नू के नमूनों की जांच में वैज्ञानिकों को कार्बन से जुड़े कई नए यौगिक और पानी वाले खनिज मिले हैं। जनवरी 2025 में वैज्ञानिकों ने बताया कि इनमें डीएनए बनाने के लिए जरूरी सभी तत्वों के साथ अमीनो एसिड और शुगर भी मौजूद हैं। नासा के मुताबिक, इन नमूनों के अध्ययन से जीवन की शुरुआती प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिल सकती है। साथ ही, ऐसी तकनीक विकसित करने का रास्ता भी खुल सकता है, जिससे धरती की ओर आने वाले क्षुद्रग्रहों का रास्ता बदला जा सके। फिलहाल 200 से ज्यादा रिसर्चर इन नमूनों पर काम कर रहे हैं। नासा इनका कम से कम 70 प्रतिशत हिस्सा भविष्य की पीढ़ियों के वैज्ञानिक शोध के लिए सुरक्षित रखेगा।

लाल हीरा: 1 कैरेट की कीमत करीब 25 करोड़ रुपये

हीरे कई रंगों में पाए जाते हैं, लेकिन लाल हीरा सबसे दुर्लभ रंगीन हीरों में गिना जाता है। पूरी दुनिया में अब तक करीब 30 लाल हीरे ही मिले हैं। ये ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की कुछ खदानों में पाए गए हैं। इनमें से ज्यादातर का वजन 1 कैरेट यानी 0.2 ग्राम से भी कम है। दुनिया के करीब 95 प्रतिशत गुलाबी और लाल हीरे पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की अर्गाइल खदान से मिले हैं। साल 1980 के दशक से इस खदान में करीब 86.5 करोड़ कैरेट कच्चे हीरे निकाले गए, लेकिन इनमें लाल हीरों की संख्या बेहद कम थी। साल 2020 में इस खदान को बंद कर दिया गया।

लाल हीरे की सबसे बड़ी खासियत उसका रंग है। आमतौर पर पीले हीरे में नाइट्रोजन और नीले हीरे में बोरॉन जैसे तत्व पाए जाते हैं, लेकिन लाल हीरे में ऐसी कोई अशुद्धि नहीं मिली है, जो उसके रंग की वजह हो। वैज्ञानिकों का मानना है कि हीरा बनने के दौरान उसके क्रिस्टल की संरचना में बदलाव या मुड़ाव आ जाता है। इसी वजह से जब उस पर रोशनी पड़ती है, तो वह लाल दिखाई देता है। हीरे की कीमत उसकी दुर्लभता, रंग और क्रिस्टल की साफ-सफाई यानी क्लैरिटी के आधार पर तय होती है। लाल हीरे की अनुमानित कीमत करीब 4.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 44.42 करोड़ रुपये प्रति ग्राम है।

मई 2024 में जिनेवा में हुई नीलामी के दौरान 1.56 कैरेट का ‘अर्गाइल फीनिक्स’ नाम का लाल हीरा बेचा गया था। इसे ज्वैलर लॉरेंस ग्राफ ने करीब 40 करोड़ रुपये में खरीदा था। इस हिसाब से इसकी कीमत लगभग 25.4 करोड़ रुपये प्रति कैरेट बैठती है। वहीं, दुनिया का सबसे बड़ा लाल हीरा ब्राजील में मिला था। तराशने के बाद इसका वजन 5.11 कैरेट यानी करीब 1 ग्राम था। साल 2001 में लंदन के मशहूर मौसेफ ज्वैलर्स ने इसे खरीदा था, हालांकि इसकी खरीद की कीमत सार्वजनिक नहीं की गई थी।

Most Expensive Things: एंटीमैटर – 1 ग्राम की कीमत करीब 6,000 लाख करोड़ रुपये

दुनिया की सबसे महंगी चीज एंटीमैटर है। इसकी कीमत इतनी ज्यादा है कि सोना, हीरा और प्लैटिनम भी इसके सामने काफी सस्ते लगते हैं। दुनिया में मौजूद लगभग हर चीज पदार्थ यानी मैटर से बनी है। पदार्थ के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन होते हैं। लेकिन प्रकृति में इन कणों के उल्टे गुणों वाले जोड़ीदार कण भी मौजूद हैं, जिन्हें एंटीपार्टिकल कहा जाता है। जैसे इलेक्ट्रॉन का जोड़ीदार पॉजिट्रॉन, प्रोटॉन का एंटीप्रोटॉन और न्यूट्रॉन का एंटीन्यूट्रॉन होता है। जिस तरह सामान्य परमाणुओं से मैटर बनता है, उसी तरह एंटीपार्टिकल से एंटी-परमाणु बनते हैं और इनसे एंटीमैटर तैयार होता है।

सोना, हीरा और प्लैटिनम जैसी चीजें खदानों से निकाली जा सकती हैं, लेकिन एंटीमैटर इस तरह प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दुर्लभ न्यूक्लियर प्रतिक्रियाओं के दौरान बनता है या फिर वैज्ञानिक इसे प्रयोगशालाओं में तैयार करते हैं। यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च यानी सर्न (CERN) के वैज्ञानिक अब तक केवल 10 नैनोग्राम एंटीमैटर ही बना पाए हैं। नासा के मुताबिक, 1 ग्राम एंटीमैटर तैयार करने की अनुमानित लागत करीब 6,000 लाख करोड़ रुपये हो सकती है। यह साल 2025 में अमेरिका की जीडीपी से करीब दोगुनी थी। इतनी रकम में करीब 41 करोड़ किलोग्राम 24 कैरेट सोना खरीदा जा सकता है।

एंटीमैटर बनाना बेहद मुश्किल और खर्चीला काम है। इसे तैयार करने में इसके अंदर मौजूद ऊर्जा से करीब 1 अरब गुना ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। एक अनुमान के मुताबिक, 1 ग्राम एंटीमैटर बनाने में करीब 2.5 करोड़ अरब यूनिट बिजली खर्च हो सकती है। यह भारत की कुल बिजली आपूर्ति के करीब 15,404 साल के बराबर है।

इतनी महंगी चीज होने के बावजूद एंटीमैटर का इस्तेमाल विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में किया जाता है। एंटीमैटर से जुड़े पॉजिट्रॉन का उपयोग पीईटी स्कैन में होता है। इस तकनीक की मदद से शरीर के अंदर की जांच करके कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाने में मदद मिलती है। इसके अलावा वैज्ञानिक एंटीमैटर को भविष्य के संभावित ईंधन के रूप में भी देखते हैं।

एंटीमैटर की सबसे खास बात इसकी ऊर्जा पैदा करने की क्षमता है। जब सामान्य पदार्थ और एंटीमैटर एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो दोनों नष्ट होकर ऊर्जा में बदल जाते हैं। आइंस्टीन के प्रसिद्ध फॉर्मूले E = mc² के मुताबिक, 1 ग्राम एंटीमैटर और 1 ग्राम सामान्य पदार्थ के मिलने से करीब 1.8 × 10¹⁴ जूल ऊर्जा पैदा हो सकती है। यह ऊर्जा हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से करीब 3 गुना ज्यादा होगी। यही वजह है कि एंटीमैटर को दुनिया का सबसे महंगा पदार्थ माना जाता है और वैज्ञानिकों के लिए यह शोध का एक बेहद महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।