New Delhi: नेपाल में जनता का आक्रोश एक बार फिर आग उगल रहा है। नए प्रधानमंत्री बालेन शाह को सोचना होगा कि जिस जनता ने वर्षों पुराने राजनेताओं को दरकिनार कर बड़े उत्साह के साथ उन्हें सत्ता सौंपी थी, क्या कारण है कि आज वही जनता उनके खिलाफ सड़कों पर उतर चुकी है? जिस युवा पीढ़ी यानी ‘जेन ज़ी’ (Gen-Z) ने उन्हें अपना नायक चुना, जिसे आंदोलन से निकले अपने नायक से बड़ी उम्मीदें थी, आखिर वही युवा पीढ़ी आज सड़कों पर नई सरकार के खिलाफ क्यों आंदोलित है?
सूझबूझ का परिचय दें
बालेन शाह को जनता ने अपार समर्थन दिया, मगर वे यह समझने में भूल कर गये कि यह समर्थन उन्हें सिर्फ पांच साल के लिए नहीं है, बल्कि जनता ने उन्हें भविष्य के लिए एक ऐसे राजनेता के तौर पर भी चुना है, जो बड़ी सूझबूझ के साथ बेहतर फैसले ले। जनता ने उनमें भविष्य के लिए एक अच्छे राजनेता की छवि देखी है। बालेन शाह को इन जनभावनाओं और आकांक्षाओं को समझते हुए बड़े सोच-विचार के साथ अपने फैसले लेने चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि वे फैसले लेने में थोड़ा जल्दबाजी कर रहे हैं, इसके कारण आज नेपाल फिर से अशांत हो चला है।महज एक माह के भीतर ही नई सरकार के खिलाफ असंतोष पनप गया है।
ठीक है कि बालेन शाह ने सत्ता संभालने के साथ ही जन भावनाओं के अनुरूप भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के संदेश दिये।पूर्व प्रधानमंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं की संपत्तियों को उनकी सरकार जांच के दायरे में लाई, तो इसका हर जगह स्वागत हुआ।उनकी सरकार ने प्राइवेट स्कूलों को बंद कर सरकारी शिक्षा को मजबूत करने का निर्णय लिया, तो इसकी सराहना नेपाल ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशों में भी हुई।वीआईपी कल्चर और तड़क-भड़क को खत्म करने की उनकी अच्छी पहल को भला कौन नकार सकता है? सरकार संभालते ही उन्होंने काफी अच्छे फैसले लिये, लेकिन उन्हें यह भी अहसास होना चाहिए था कि कभी-कभी अति उत्साह में फैसले लेने की जल्दबाजी परेशानियां भी खड़ी कर देती है।
New Delhi: जमीनी हकीकतों से वाकिफ हों
सच तो यह है कि फैसले लेते वक्त उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए था कि सभी मोर्चे एक साथ खोलने की भूल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कार्रवाई और शिक्षा में सुधार के संकेत देकर जनता का दिल जीत लिया था, तो लोगों को विश्वास दिलाते कि वे नेपाल की जमीनी हकीकतों को भलीभांति समझते हुए राष्ट्र के विकास के नए रास्ते खोलने की दिशा में गंभीर प्रयास करेंगे। देश की समस्याओं को दूर करने के लिए वे अपने विश्वस्त सलाहकारों की सलाह लेकर आगे कदम बढ़ाते।विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों की राय लेकर बड़े धैर्य के साथ देश के आर्थिक विकास की संभावनाओं को तलाशते और जनता को भी विश्वास दिलाते कि सरकार सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रही है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के जिन राजनेताओं ने जनता को विश्वास में लेकर कार्य किये, जनता ने हर स्थिति में उनका साथ दिया।
New Delhi: कैसी हो कस्टम ड्यूटी
समझ में नहीं आता कि भारत से आने वाले 100 रुपये से अधिक के सामान पर अनिवार्य शुल्क यानी कस्टम ड्यूटी लगाने का फैसला बालेन शाह का खुद का था या फिर उनके सलाहकारों का था? यदि यह फैसला उनके सलाहकारों का था, तो वे जान लें कि सलाहकार उनकी नाव डुबाकर ही मानेंगे। यदि यह फैसला बालेन ने खुद लिया, तो फिर यही माना जा सकता है कि या तो उनमें अनुभव की कमी है, या फिर वे नेपाल की जमीनी हकीकतों से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं। उन्हें सोचना चाहिए था कि नेपाल के सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत से सामान खरीदते हैं। वे न सिर्फ भारत से सामान खरीदते हैं, बल्कि वर्षों से उनके भारत के साथ रोटी-बेटी के रिश्ते भी चले आ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड के सीमांत धार्चूला क्षेत्र को ही ले लीजिए। धारचूला में नेपाल के कई बच्चों की शिक्षा-दीक्षा तक हुई है।यहां महाकाली नदी के एक ओर पिथौरागढ़ का धारचूला क्षेत्र है, तो दूसरी तरफ नेपाल का दार्चूला। यदि महाकाली नदी भौगोलिक रूप से दोनों क्षेत्रों को विभक्त करती भी है, तो सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बांधती भी है। ये दोनों क्षेत्र भावनात्मक और सांस्कृतिक तौर पर गहराई से जुड़े हुए हैं।सोचने वाली बात है कि यदि धारचूला के कोई मां-बाप परंपरा के अनुसार अपनी बेटी को उसके ससुराल दार्चुला के लिए विदाई के समय सौ रुपए की कोई वस्तु उपहार में देते हैं, तो महाकाली के पार उसे यह साबित करना पड़ेगा कि यह वस्तु मार्केट से नहीं खरीदी गई है, बल्कि उपहार में मिली है।आखिर इसकी क्या गारांटी है कि उसे साबित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्या ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी आसानी से उसकी बात मान लेंगे? बालेन शाह सरकार सौ रुपए के सामान पर टैक्स लेने के बजाय यह निर्णय लेती कि एक लाख से अधिक के सामान पर शुल्क लिया जाएगा, तो बात समझ में आती। इसे राजस्व अर्जित करने के तौर पर लिया जाता, लेकिन सरकार ने तो उस आम जनता को ही नाराज कर दिया, जो किसी भी तरह जीवन यापन करती आ रही है। जिसे की सरकार से बड़ी आशाएं थी।
New Delhi: गलत सलाहकारों से दूर रहें
देश में विरोध का दूसरा बड़ा कारण छात्र संघों की नाराजगी है।कोई भी सरकार किसी छात्र या छात्र संघ के दिमाग की अभिभावक नहीं हो सकती, सरकार तय नहीं कर सकती कि छात्र संघों को किसी राजनीतिक पार्टी से संबद्ध रहना चाहिए या नहीं। यह उनकी स्वतंत्रता और विचार पर निर्भर है कि वे किस पार्टी की नीतियों में विश्वास करें। आखिर विचार के प्रवाह को कौन रोक सकता है? कॉलेजों और यूनिवर्सिटी कैंपस में राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संघों की गतिविधियों पर रोक लगाने की सलाह जिसने भी सरकार को दी, वह सरकार का हितैषी नहीं हो सकता। बालेन शाह को ऐसे सलाहकारों से दूर रहने की जरूरत है। अब जब नेपाल में छात्र और आम लोग सड़कों पर हैं, तो उन्हें समय रहते बड़ी सूझबूझ के साथ स्थिति को शांत करने के लिए तत्काल ठोस निर्णय लेना होगा। साथ ही जनता का भरोसा फिर से हासिल करना होगा कि आगे उनकी सरकार जो भी करेगी उचित ही करेगी। उन्हें यह याद रखना होगा कि जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ उन्हें अपार समर्थन दिया है। यह समर्थन सिर्फ पांच साल के लिए नहीं, बल्कि इस आशा के साथ दिया गया है कि उन्हें राजनीति में बहुत लंबी पारी खेलनी है। जब जनता चाह रही है कि वे लंबी पारी खेलें, भविष्य के प्रखर नेता बनें, तो फिर वे जल्दबाजी में ऐसे फैसले लेने की भूल न करें जिनसे आम लोगों की उम्मीदें टूटें और उन्हें आंदोलन के लिए विवश होना पड़े।








