New Delhi: संसद में महिला आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन विधेयक का गिर जाना पश्चिम बंगाल के मौजूदा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) समेत कांग्रेस और वाम दलों के लिए काफी दिक्कतें खड़ी कर सकता है। भाजपा और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे पर मुखर हैं।विपक्षी पार्टियों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। एनडीए इस रणनीति में दिखाई देता है कि महिला आरक्षण को आगामी लोकसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनाया जाए।हालांकि लोकसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन फिलहाल बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने टीएमसी सहित कांग्रेस और वाम दलों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर ही दी है।इन दलों के सामने अब मतदाताओं को यह समझाने की अहम चुनौती है कि वे एनडीए के मुकाबले कैसे महिलाओं को ज्यादा महत्व दे सकते हैं ?
क्या हैं ‘दीदी’ की दिक्कतें ?
जानकारों का मानना है कि संसद में महिला आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन विधेयक के गिरने का फायदा भाजपा को पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु में मिल सकता है।पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल तथा तमिलनाडु में 23 अप्रैल को वोटिंग होगी। इन दोनों राज्यों में एनडीए गठबंधन विपक्ष को महिला विरोधी बताकर जमकर निशाने साध रहा है।हालांकि टीएमसी, कांग्रेस और वाम दल भाजपा के हमलों का यह कहकर जवाब दे रहे हैं कि वह महिला आरक्षण की आड़ में भेदभावपूर्ण परिसीमन की प्रक्रिया लागू करना चाहती थी, लेकिन अब देखना है कि वे अपनी बात से जनता को समझाने में कितना सफल हो पाते हैं ? उन्हें यह मुद्दा इसलिए भी हल्के में नहीं लेना होगा कि बंगाल में महिला मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है। राज्य में 2021 में 81.75% महिलाओं ने मतदान किया, जो पुरुषों (81.37%) के मुकाबले अधिक था। ऐसे में महिला आरक्षण को लेकर भाजपा की भावनात्मक अपील उनके लिए खासकर ‘दीदी’ के लिए वाकई दिक्कतें खड़ी कर सकती है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी की टीएमसी ने ‘बंगाल को अपनी बेटी चाहिए’ का नारा दिया था। इस चुनाव में भाजपा सवाल उठा सकती है कि आखिर बंगाल की बेटियों को महत्व देने की बात करने वाली ममता बनर्जी महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व देने के पक्ष में क्यों नहीं हैं ?
New Delhi: भाजपा का दांव
देश की चुनावी राजनीति में महिला वोटर काफी महत्व रखते हैं। शायद यही वजह रही कि केंद्र की मोदी सरकार ने महिलाओं पर विशेष फोकस रखा।महिलाओं पर केंद्रित कई कानून और योजनाएं इस बात के प्रमाण हैं । जैसे कि तीन तलाक कानून और उज्ज्वला योजना के जरिये मोदी सरकार ने महिलाओं के एक बहुत बड़े वर्ग को प्रभावित किया। सरकार के इन दो कदमों से उसके पक्ष में एक बड़ा वोट बैंक विकसित हुआ। राज्यों में भी भाजपा और और उसकी सहयोगी पार्टियां महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं घोषित करती रही हैं। बिहार विधानसभा चुनाव को ही ले लीजिए, वहां चुनाव से पहले महिलाओं को कारोबार शुरू करने के लिए दो लाख रुपये तक की राशि देने की योजना शुरू की गई, तो इसका एनडीए को फायदा भी मिला।पश्चिम बंगाल चुनाव में भी भाजपा ने टीएमसी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की काट में महिलाओं को 36000 रुपये वार्षिक देने का दांव चला है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में महिलाओं को ₹3,000 मासिक सहायता, मुफ्त बस यात्रा और मातंगिनी हाजरा के नाम पर महिला बटालियन जैसे वादों से ममता के लिए चुनौती खड़ी की है।
New Delhi: आसान नहीं इस अस्त्र की काट
भाजपा का साफ संदेश है कि वह महिलाओं के हित में सोचने वाली पार्टी है।अब टीएमसी, कांग्रेस और वाम दलों को देखना है कि वे कैसे भाजपा के इस धारदार चुनावी अस्त्र की काट कर पाते हैं ? बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन सहित तमाम छोटे-बड़े नेता महिला आरक्षण के मुद्दे पर जोरदार हमले कर रहे हैं। जो भी हो बंगाल में भाजपा ने इन दलों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, खासकर ममता बनर्जी के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्य के लोगों की बहुत बड़ी संख्या इस मुद्दे पर भाजपा से सहमत हो सकती है।








