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अब सिर्फ वोट बैंक नहीं बनेगा ‘अब्दुल’! क्या ओवैसी बिगाड़ेंगे अखिलेश का खेल, एम-वाई और पीडीए का क्या होगा?

अखिलेश के पीडीए फॉर्मूले को ओवैसी देंगे चुनौती?
अखिलेश के पीडीए फॉर्मूले को ओवैसी देंगे चुनौती?

Owaisi vs Akhilesh: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक गतिविधियां तेज होती जा रही हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन) भी लगातार चुनावी तैयारियों में जुटी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक ओवैसी जनसभाएं कर रहे हैं। इन सभाओं में उनका निशाना भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनका पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला है।ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या ओवैसी 2027 के चुनाव में अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं? आइए, इसे प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के जरिए समझते हैं।

Owaisi vs Akhilesh: यूपी में मुस्लिम वोटों का कितना महत्व?

2011 की जनगणना के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 19.3% है। राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 120 से 140 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनाव के नतीजों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। इनमें लगभग 57 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30% से अधिक है, जिससे इन क्षेत्रों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।पश्चिमी यूपी के सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद और रामपुर के अलावा रुहेलखंड, तराई और पूर्वांचल के आजमगढ़ तथा मऊ जैसे इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं का खास प्रभाव है। ऐसे में इन मतदाताओं का समर्थन हासिल करना राजनीतिक दलों के लिए काफी अहम माना जाता है।

ओवैसी के निशाने पर अखिलेश यादव

असदुद्दीन ओवैसी अपनी रैलियों में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि सपा मुसलमानों का इस्तेमाल केवल वोट हासिल करने के लिए करती है। उनके मुताबिक, चुनाव के दौरान मुस्लिम कार्यकर्ताओं से झंडे उठवाए जाते हैं और सभाओं में भीड़ जुटाई जाती है, लेकिन जब नेतृत्व और अधिकारों में हिस्सेदारी देने की बात आती है, तो पार्टी पीछे हट जाती है।रामपुर में हुई रैलियों के दौरान ओवैसी ने सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान के प्रति सहानुभूति भी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि मुश्किल समय में समाजवादी पार्टी ने अपने बड़े मुस्लिम नेताओं का साथ नहीं दिया। इन बयानों के जरिए ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की भूमिका पर सवाल खड़े करने की कोशिश कर रहे हैं।

Owaisi vs Akhilesh: पीडीए में ‘ए’ का मतलब क्या सिर्फ वोट?

अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को एक साथ लाने पर आधारित है। ओवैसी इसी फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि इसमें अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को शामिल तो किया गया है, लेकिन उन्हें उचित राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं मिल रही है।2022 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर जीत और हार का अंतर केवल 1,000 से 5,000 वोटों के बीच था। ऐसे में अगर एआईएमआईएम मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है और 3,000 से 10,000 तक वोट हासिल कर लेती है, तो चुनावी नतीजे प्रभावित हो सकते हैं। इसका नुकसान समाजवादी पार्टी को और फायदा बीजेपी को मिलने की संभावना जताई जा रही है।

सपा के मुस्लिम-यादव समीकरण पर असर

समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चुनावी ताकत उसका मुस्लिम-यादव यानी एम-वाई समीकरण रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा सपा के समर्थन में रहा था।अगर 2027 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है, तो सपा के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पार्टी की सत्ता में वापसी की कोशिशों पर भी इसका असर पड़ सकता है।दूसरी ओर, हालिया निकाय चुनावों में एआईएमआईएम ने 5 नगर पालिका अध्यक्ष पदों और 83 से अधिक पार्षद सीटों पर जीत हासिल की थी। इन नतीजों को पार्टी की स्थानीय स्तर पर बढ़ती राजनीतिक मौजूदगी और स्वीकार्यता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

Owaisi vs Akhilesh: यूपी चुनाव 2027, मुस्लिम वोटों का क्या होगा गणित?
यूपी चुनाव 2027: मुस्लिम वोटों का क्या होगा गणित?
Owaisi vs Akhilesh: तीसरा राजनीतिक विकल्प बनाने की तैयारी में ओवैसी

इंडिया गठबंधन से बाहर रहने के बाद ओवैसी उत्तर प्रदेश में एक अलग राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वह चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी जैसी छोटी लेकिन प्रभावशाली पार्टियों के साथ मिलकर दलित, मुस्लिम और पिछड़े समुदायों को एक मंच पर लाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।एआईएमआईएम ने बहराइच, श्रावस्ती, आजमगढ़, रामपुर, संभल, कानपुर की सीसामऊ सीट और प्रयागराज जैसे क्षेत्रों में चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। पार्टी इन इलाकों में अपने उम्मीदवारों को लेकर भी काम कर रही है। अगर यह रणनीति सफल होती है, तो ओवैसी प्रदेश की राजनीति में तीसरे विकल्प के रूप में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं।

ओवैसी को रोकने के लिए सपा की रणनीति

समाजवादी पार्टी ओवैसी की राजनीति को अपने लिए चुनौती मान रही है। पार्टी उन्हें बीजेपी की ‘बी-टीम’ बताने की कोशिश करती रही है। सपा का आरोप है कि एआईएमआईएम मुस्लिम मतदाताओं के वोट बांटकर अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचाती है।इस चुनौती से निपटने के लिए सपा अपने प्रमुख मुस्लिम विधायकों और नेताओं को आगे कर रही है। पार्टी की कोशिश है कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच यह संदेश दिया जाए कि उनके हितों की रक्षा करने और उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने में समाजवादी पार्टी की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है।

Owaisi vs Akhilesh: अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले के सामने चुनौती

अखिलेश यादव 2027 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए पीडीए और संविधान की रक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं। उनकी रणनीति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को एकजुट रखने की है, ताकि बीजेपी के खिलाफ वोटों का बंटवारा न हो।हालांकि, अगर ओवैसी अपनी पार्टी के लिए बड़ी संख्या में सीटें जीतने में सफल नहीं भी होते हैं, तब भी वह कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी भूमिका सरकार बनाने वाले दल के बजाय चुनावी समीकरण बिगाड़ने वाले यानी ‘गेमस्पॉयलर’ की हो सकती है।अगर ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं के 5 से 10% वोट अपनी ओर खींचने में कामयाब रहते हैं, तो समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती बढ़ सकती है। खासकर उन सीटों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है, जहां जीत और हार का अंतर कम रहता है। ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी को चुनावी फायदा मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है।कुल मिलाकर, 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम की भूमिका कितनी प्रभावशाली होगी, यह उसके उम्मीदवारों, जनसमर्थन और मुस्लिम मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा। हालांकि, इतना तय है कि ओवैसी की सक्रियता समाजवादी पार्टी के लिए अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखने की चुनौती बढ़ा सकती है।