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पहलगाम हमले का 1 साल, गोलियों के बीच आदिल ने बचाईं जिंदगियां, खुद बन गया अमर कहानी

पहलगाम हमले का 1 साल, आदिल की बहादुरी
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Pahalgam Attack 1 Year: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुआ आतंकी हमला आज भी लोगों के दिलों में गहरा दर्द बनकर मौजूद है। इस घटना को एक साल हो चुका है, लेकिन उस दिन की यादें अब भी उतनी ही ताजा हैं। यह सिर्फ एक हमला नहीं था, बल्कि कई परिवारों के जीवन को पूरी तरह बदल देने वाली त्रासदी थी। इस हमले में २६ लोगों की जान गई थी, जिनमें आदिल हुसैन शाह भी शामिल थे। आदिल एक साधारण पोनीवाला था, जो पर्यटकों को घुड़सवारी कराकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। लेकिन उस दिन उसकी बहादुरी ने उसे हमेशा के लिए खास बना दिया। अब सरकार की मदद से उसके परिवार को नया घर मिल चुका है।

पहलगाम हमले का 1 साल, आदिल की बहादुरी
पहलगाम हमले का 1 साल, आदिल की बहादुरी

मुश्किल समय में मिला सहारा और साथ

कठिन समय में आदिल के परिवार को सरकार और कई नेताओं का सहयोग मिला, जिससे उन्हें संभलने में मदद मिली। खासकर एकनाथ शिंदे की सहायता को परिवार आज भी याद करता है। आदिल के पिता बताते हैं कि घटना के बाद शिंदे ने आर्थिक मदद देने के साथ-साथ घर बनवाने का वादा भी किया था, जिसे उन्होंने पूरा किया। परिवार को श्रीनगर बुलाकर उनसे मुलाकात कराई गई और उनकी टीम लगातार संपर्क में रही। उनके एक सहयोगी ने परिवार से कहा कि “मैं भी आपका आदिल हूं”, जिससे परिवार को भावनात्मक ताकत मिली। यह मदद सिर्फ आर्थिक नहीं थी, बल्कि दुख के समय एक मजबूत सहारा भी थी।

सरकारी सहायता से संभला परिवार

जम्मू-कश्मीर सरकार ने भी आदिल के परिवार की हर संभव मदद की। उसकी पत्नी को स्थायी सरकारी नौकरी दी गई, जिससे घर की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। साथ ही ५ से ७ लाख रुपये की आर्थिक सहायता भी दी गई। आदिल के छोटे भाई को वक्फ बोर्ड में नौकरी देकर उसे आत्मनिर्भर बनने का मौका मिला। परिवार इन सभी मददों के लिए आभारी है, लेकिन उनका कहना है कि इससे दिल का खालीपन कभी नहीं भर सकता।

Pahalgam Attack 1 Year: पर्यटकों को बचाते हुए दी जान

हमले के दौरान जब अचानक गोलियां चलने लगीं और चारों ओर अफरा-तफरी मच गई, तब ज्यादातर लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। वहां मौजूद कई मजदूर, घुड़सवार और होटल कर्मचारी भी सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए। लेकिन आदिल ने अलग रास्ता चुना। उसने अपनी जान की परवाह किए बिना उन पर्यटकों को बचाने की कोशिश की, जिन्हें वह लेकर गया था। साथ ही वह अन्य लोगों को भी सुरक्षित निकालने में जुटा रहा। इसी दौरान उसने एक आतंकी की राइफल पकड़ ली, लेकिन आतंकियों की गोली लगने से उसकी मौत हो गई। इस साहस ने उसे एक सच्चा हीरो बना दिया।

Pahalgam Attack 1 Year:  पहलगाम हमले का 1 साल, आदिल की बहादुरी
पहलगाम हमले का 1 साल, आदिल की बहादुरी

एक साल बाद भी ताजा हैं जख्म

एक साल बीत जाने के बाद भी आदिल का परिवार इस सदमे से उबर नहीं पाया है। उसके पिता सैयद हैदर शाह आज भी उसे याद करके भावुक हो जाते हैं। उनका कहना है कि चाहे कितनी भी मदद मिल जाए, बेटे की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। घर में लगी उसकी तस्वीरें हर दिन उसकी याद दिलाती हैं और दर्द को फिर से जगा देती हैं। उनके लिए हर दिन इस दुख के साथ जीना एक बड़ी चुनौती है।

परिवार की जिम्मेदारी निभाने वाला बड़ा बेटा

आदिल अपने परिवार का सबसे बड़ा सहारा था। वह घर की हर जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाता था और हमेशा खुश रहता था। उसके पिता बताते हैं कि उसे देखकर कभी नहीं लगता था कि वह इतना जिम्मेदार सदस्य है, क्योंकि उसका स्वभाव बहुत सरल और हंसमुख था। हर साल वह काम के लिए पहलगाम जाता था, लेकिन अब उसकी जगह सिर्फ उसकी यादें ही रह गई हैं।

इंसानियत सबसे ऊपर, यही है असली पहचान

अपने बेटे की कुर्बानी को याद करते हुए उसके पिता कहते हैं कि आदिल ने उस दिन धर्म या जाति नहीं देखी। उसने सिर्फ इंसानियत को महत्व दिया और दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी। यही कारण है कि आज वह सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन गया है। उसका बलिदान सिखाता है कि असली पहचान इंसानियत होती है, जो हर सीमा से ऊपर होती है।

दर्द भी है, गर्व भी है

आज उसके परिवार के साथ दो भावनाएं जुड़ी हैं गहरा दुख और गर्व। दुख इस बात का कि उन्होंने अपना बेटा खो दिया, और गर्व इस बात का कि उसने दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी। आदिल की बहादुरी हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएगी कि असली हीरो वही होता है, जो मुश्किल समय में दूसरों के लिए खड़ा होता है, चाहे उसे अपनी जान ही क्यों न गंवानी पड़े।

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