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राहुल की नजर UP पर नहीं MP पर क्यों? 12 दिन में दो दौरे, आदिवासी मुद्दा, केन-बेतवा और BJP का ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ वार

राहुल की नजर UP पर नहीं MP पर क्यों? 12 दिन में दो दौरे, आदिवासी मुद्दा, केन-बेतवा और BJP का ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ वार

RAHUL GANDHI BALAGHAT: अगले साल उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों में चुनावी हलचल तेज होने वाली है, लेकिन कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की हालिया सक्रियता मध्य प्रदेश में भी नजर आ रही है। 19 सितंबर को इंदौर के बाद 1 अक्टूबर को वह बालाघाट पहुंचे और बैगा आदिवासी परिवारों से मुलाकात की। बालाघाट में 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की मौत का मुद्दा पहले ही राजनीतिक विवाद का केंद्र बन चुका था। राहुल ने इसे लोकसभा में उठाने की बात कही, जबकि BJP ने उनके दौरे को ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ बताया।

सवाल यह है कि जब उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनावी मुकाबला होना है, तब राहुल का मध्य प्रदेश पर इतना फोकस क्यों दिखाई दे रहा है? क्या यह सिर्फ बालाघाट की एक घटना पर प्रतिक्रिया है या कांग्रेस 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले MP में जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है? और क्या आदिवासी मुद्दे के जरिए राहुल मध्य प्रदेश के साथ-साथ महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे इलाकों तक भी राजनीतिक संदेश पहुंचाना चाहते हैं?

सवाल 1: राहुल बालाघाट क्यों पहुंचे?

जवाब- बालाघाट के बैगा बहुल इलाकों में बच्चों की मौत का मामला कई महीनों से चर्चा में था। मीडिया रिपोर्टों में 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की बात सामने आई, जबकि सरकारी स्तर पर मौतों के कारणों में अलग-अलग स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख किया गया है। राहुल ने जगला गांव पहुंचकर मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात की और स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार तथा आदिवासी अधिकारों का मुद्दा उठाया। उन्होंने मामले को संसद में उठाने की बात भी कही। यानी राहुल का दौरा सिर्फ मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने इस घटना को आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और वन अधिकारों की बड़ी बहस से जोड़ दिया।  यही वह बिंदु है जहां बालाघाट एक स्थानीय प्रशासनिक मुद्दे से निकलकर कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनता दिखाई देता है।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: दो महीने बाद राहुल पहुंचे, सवाल क्यों उठा?

बालाघाट में बच्चों की मौत का मामला मई-जून से सामने आने लगा था। कांग्रेस और स्थानीय संगठनों की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे। इसके बाद राहुल ने सितंबर में सोशल मीडिया के जरिए मुद्दा उठाया और 1 अक्टूबर को खुद प्रभावित गांव पहुंचे। इसलिए राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है कि राहुल अब क्यों पहुंचे? इसका एक जवाब यह हो सकता है कि पहले स्थानीय और प्रदेश स्तर पर मामला उठता रहा, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व के मैदान में उतरने के बाद यह मुद्दा सीधे दिल्ली की राजनीति तक पहुंच गया। राहुल ने भी बालाघाट में कहा कि वह इस मुद्दे को लोकसभा में उठाएंगे।

सवाल 2: UP में चुनाव, फिर MP पर इतना फोकस क्यों?

जवाब- मध्य प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना है, जबकि 2027 में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। यानी विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले ही राज्य में बड़ा स्थानीय राजनीतिक मुकाबला होगा। इस नजरिए से राहुल का MP दौरा केवल तत्काल राजनीतिक मुद्दे की प्रतिक्रिया नहीं माना जा सकता। इसे 2027 के स्थानीय चुनावों से पहले संगठन और मुद्दों की जमीन तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। हालांकि यह कांग्रेस की घोषित रणनीति है। इसलिए इसे राजनीतिक विश्लेषण के रूप में ही देखना होगा।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: 12 दिन में दो दौरे क्या बताते हैं?

19 सितंबर को राहुल गांधी इंदौर पहुंचे थे। वहां उन्होंने ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इसके करीब 12 दिन बाद 1 अक्टूबर को उनका दूसरा MP दौरा बालाघाट में हुआ। यह लगातार दो दौरे इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दोनों कार्यक्रमों का सामाजिक आधार अलग था। इंदौर में छात्र और युवा मुद्दा। बालाघाट में आदिवासी, स्वास्थ्य और ग्रामीण संकट। यानी राहुल की MP यात्रा को सिर्फ एक क्षेत्रीय मुद्दे तक सीमित करके देखना मुश्किल है। एक तरफ शहरी और युवा वर्ग से संवाद है तो दूसरी तरफ आदिवासी बेल्ट में सीधा संपर्क।

सवाल 3: फिर UP कहां है?

उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के राजनीतिक कार्यक्रमों से बाहर नहीं है। लेकिन UP और MP की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। UP में कांग्रेस का राजनीतिक आधार मुख्य रूप से गठबंधन की राजनीति और समाजवादी पार्टी के साथ संबंधों से भी जुड़ा हुआ है। वहीं मध्य प्रदेश में कांग्रेस और BJP के बीच सीधा विधानसभा मुकाबला है। 2023 के विधानसभा चुनाव में BJP ने 230 में से 163 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस 66 सीटों पर रही। इसलिए मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सामने संगठन, स्थानीय नेतृत्व और BJP के साथ सीधे मुकाबले की चुनौती है। यही वजह है कि राहुल के MP दौरों को सिर्फ अगले विधानसभा चुनाव की तारीख से जोड़ना अधूरा होगा।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: सवाल 4: आदिवासी मुद्दा राहुल के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों?

जवाब-  2011 की जनगणना के मुताबिक मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति आबादी राज्य की कुल आबादी का करीब 21 फीसदी है। आधिकारिक जनगणना आंकड़ों में MP की अलग-अलग जनजातियों और जिलों का विस्तृत डेटा उपलब्ध है। विधानसभा की 230 सीटों में 47 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में इन 47 ST आरक्षित सीटों में BJP ने 24 और कांग्रेस ने 22 सीटें जीती थीं, जबकि एक सीट भारत आदिवासी पार्टी के खाते में गई। यानी सिर्फ आरक्षित सीटों को देखें तो भी यह राज्य की राजनीति का बड़ा हिस्सा है। इसके अलावा कई सामान्य सीटों पर भी आदिवासी मतदाताओं की संख्या चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए आदिवासी मुद्दा कांग्रेस और BJP दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

RAHUL GANDHI BALAGHAT
                                                       RAHUL GANDHI BALAGHAT
2018 से 2023 तक आदिवासी सीटों का समीकरण कैसे बदला?

2018 में ST आरक्षित सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन 2023 के मुकाबले बेहतर था। 2023 में BJP ने 24 ST सीटें जीतकर कांग्रेस के 22 के मुकाबले मामूली बढ़त बनाई। यानी आदिवासी राजनीति में कोई एकतरफा तस्वीर नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस अगर आदिवासी अधिकार, वन अधिकार, जमीन, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे उठाती है तो उसका लक्ष्य सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं माना जा सकता।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: सवाल 5: बालाघाट से आदिवासी राजनीति का दायरा कितना बड़ा है?

बालाघाट मध्य प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित है और महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ़ की सीमाओं से जुड़ा क्षेत्र है। राजनीतिक तौर पर इसका महत्व इसलिए भी है कि यह इलाका मध्य भारत के बड़े आदिवासी भूगोल का हिस्सा है। राहुल ने बालाघाट में बच्चों की मौत के साथ-साथ वन अधिकार, जमीन, मनरेगा, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे उठाए। इस तरह एक स्थानीय स्वास्थ्य संकट को आदिवासी अधिकारों की व्यापक राजनीति से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। कांग्रेस ने भी राहुल के दौरे को आदिवासी अधिकारों से जोड़कर पेश किया।

सवाल 6: केन-बेतवा से बालाघाट तक क्या एक ही राजनीतिक लाइन है?

यहीं राहुल की हालिया गतिविधियों का दूसरा सिरा सामने आता है। केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर प्रभावित परिवारों, खासकर पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े सवालों पर बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में संसद में बताया था कि केन-बेतवा परियोजना के पहले चरण में 1,913 परियोजना प्रभावित परिवारों में 648 परिवार अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि प्रभावित परिवारों के लिए भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास-पुनर्स्थापन की प्रक्रिया राज्य सरकारों द्वारा की जा रही है। जल शक्ति मंत्रालय ने अलग से उन दावों को गलत और भ्रामक बताया है जिनमें कहा गया था कि प्रभावित परिवारों को मुआवजा या पुनर्वास नहीं मिला। यानी यहां भी आदिवासी, जमीन, विस्थापन और अधिकार का मुद्दा सामने आता है। इसीलिए राहुल की राजनीति में केन-बेतवा और बालाघाट को एक साथ देखने वाले लोग दोनों को आदिवासी अधिकारों के व्यापक मुद्दे से जोड़ते हैं। हालांकि यह कहना कि दोनों घटनाओं के पीछे राहुल की कोई एक घोषित राजनीतिक रणनीति है, अभी अनुमान होगा।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: सवाल 7: राहुल ने खुद इन मुद्दों को कैसे जोड़ा?

राहुल के बालाघाट दौरे में बच्चों की मौत से आगे जाकर आदिवासी अधिकारों की बात हुई। उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ जमीन, वन अधिकार और रोजगार से जुड़े सवाल उठाए। उनका आरोप था कि आदिवासी क्षेत्रों में सरकार बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफल रही है। BJP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उनके दौरे को राजनीतिक मकसद से जोड़कर देखा। यानी एक तरफ “आदिवासी अधिकार और सरकारी जवाबदेही” राहुल के भाषण का आधार रहा, तो दूसरी तरफ BJP ने “राजनीतिक दौरा” कहकर इसकी राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाया।

सवाल 8: BJP इसे ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ क्यों कह रही है?

BJP ने राहुल गांधी के बालाघाट दौरे पर तीखी प्रतिक्रिया दी। मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने इसे राजनीतिक स्टंट बताया, जबकि BJP प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राहुल के दौरे के बाद कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड और बालाघाट क्षेत्र में नक्सलवाद के मुद्दे को सामने रखा। BJP का तर्क मूल रूप से यह है कि राहुल गांधी घटना के काफी समय बाद इलाके में पहुंचे और अब इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। वहीं कांग्रेस का कहना है कि राहुल ने प्रभावित परिवारों से मिलकर उनकी आवाज राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का काम किया है। इस तरह बालाघाट का मूल मुद्दा- बच्चों की मौत और स्वास्थ्य व्यवस्था अब कांग्रेस बनाम BJP की राजनीतिक बहस में बदल गया है।

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RAHUL GANDHI BALAGHAT: सवाल 9: क्या BJP राहुल के दौरे से दबाव में है?

लेकिन इतना जरूर है कि राहुल के दौरे के बाद BJP ने तुरंत राजनीतिक जवाब दिया। राहुल ने जहां सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए, वहीं BJP ने उनके दौरे की मंशा और कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड को मुद्दा बनाया। यानी दोनों दलों के बीच राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई तेज हुई है। क्या यह दबाव है या सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया-इसका आकलन आने वाले महीनों में संगठनात्मक गतिविधियों और चुनावी राजनीति से ज्यादा स्पष्ट होगा।

2027 के स्थानीय चुनाव क्यों महत्वपूर्ण हो सकते हैं?

मध्य प्रदेश में 2027 में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। इसके बाद 2028 में विधानसभा चुनाव होंगे। इसलिए कांग्रेस के लिए 2027 सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं होंगे। ये यह परखने का मौका भी होंगे कि वह BJP के खिलाफ जमीनी संगठन कितना मजबूत कर पाती है। अगर कांग्रेस आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य, वन अधिकार, रोजगार, जमीन और विस्थापन जैसे मुद्दों पर लगातार अभियान चलाती है, तो उसका असर स्थानीय चुनावी राजनीति में दिखाई दे सकता है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन मुद्दों का चुनावी लाभ किसे मिलेगा।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: राहुल की रणनीति में MP का ‘आदिवासी कार्ड’ कितना बड़ा है?

इसे सिर्फ ‘आदिवासी कार्ड’ कहना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता। बालाघाट में बच्चों की मौत का मामला स्वास्थ्य और कुपोषण से जुड़ा है। केन-बेतवा का मामला विस्थापन और पुनर्वास से जुड़ा है। इंदौर का कार्यक्रम छात्रों और युवाओं से जुड़ा था। इन तीनों को जोड़ने पर राहुल की MP में हालिया सक्रियता के तीन अलग-अलग सामाजिक मुद्दे सामने आते हैं- युवा, आदिवासी और ग्रामीण/वंचित समुदाय। राजनीतिक तौर पर कांग्रेस इन मुद्दों को BJP सरकार की जवाबदेही के सवाल से जोड़ रही है।

तो क्या 2028 की तैयारी अभी से शुरू हो गई?

कांग्रेस की तरफ से ऐसा कोई औपचारिक ऐलान नहीं है कि राहुल गांधी के ये दौरे 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी हैं। लेकिन राजनीतिक कैलेंडर को देखें तो 2027 के स्थानीय चुनाव और उसके बाद 2028 का विधानसभा चुनाव सामने हैं। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व का किसी राज्य में लगातार जाना, स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मंच देना और सामाजिक समूहों से सीधे संवाद करना सामान्य तौर पर संगठनात्मक और राजनीतिक सक्रियता का संकेत माना जा सकता है। यही वजह है कि राहुल के 12 दिन में दो MP दौरे को केवल दो अलग-अलग कार्यक्रमों के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: BJP के लिए असली चुनौती क्या है?

बालाघाट की घटना में BJP सरकार के सामने पहला सवाल प्रशासनिक है- स्वास्थ्य व्यवस्था, बच्चों की मौत, जांच और प्रभावित परिवारों को सहायता। दूसरा सवाल राजनीतिक है- विपक्ष इस मुद्दे को कितना बड़ा बना पाता है। और तीसरा सवाल संगठनात्मक है- क्या कांग्रेस आदिवासी इलाकों में इस मुद्दे को लंबे समय तक जिंदा रख पाती है? BJP ने जवाब देना शुरू कर दिया है। राहुल के दौरे को राजनीतिक बताने के साथ पार्टी ने कांग्रेस के रिकॉर्ड और राहुल की राजनीति पर हमला किया है। इससे साफ है कि बालाघाट की लड़ाई अब सिर्फ एक जिले की प्रशासनिक कहानी नहीं रह गई है।

राहुल के लिए भी चुनौती आसान नहीं

राहुल गांधी के लिए MP में लगातार सक्रिय होना एक बात है, लेकिन इसका संगठनात्मक असर दूसरी। कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि राष्ट्रीय नेतृत्व के दौरे के बाद स्थानीय संगठन भी उसी मुद्दे को लगातार उठा सकता है। सिर्फ राहुल का दौरा और बयान किसी राज्य की राजनीति बदलने के लिए पर्याप्त नहीं होते। उसके बाद स्थानीय नेताओं, संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि बालाघाट दौरे के बाद असली परीक्षा कांग्रेस की फॉलो-अप राजनीति की होगी।

RAHUL GANDHI BALAGHAT: UP में चुनाव, लेकिन MP में अभी से जमीन?

राहुल गांधी का मध्य प्रदेश पर हालिया फोकस एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर जरूर बनाता है। 19 सितंबर को इंदौर और 1 अक्टूबर को बालाघाट12 दिनों में दो दौरे। एक तरफ छात्र और युवा, दूसरी तरफ बैगा आदिवासी परिवार। केन-बेतवा परियोजना से जुड़े विस्थापन और पुनर्वास के सवाल।

इन मुद्दों के जरिए कांग्रेस MP में BJP सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठा रही है। दूसरी तरफ BJP राहुल के दौरों को राजनीतिक मकसद से जोड़कर पलटवार कर रही है।इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या राहुल की MP में बढ़ती सक्रियता 2028 की तैयारी का शुरुआती संकेत है, या फिलहाल यह अलग-अलग मुद्दों पर विपक्ष के नेता के तौर पर उनकी सक्रियता भर है? इसका जवाब अभी राजनीति नहीं, आने वाले महीनों की गतिविधियां देंगी।

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