Tahir Hussain: फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़े मामलों में अदालतों की कार्रवाई लगातार चर्चा में है। इसी कड़ी में दिल्ली की अदालत ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को एक दंगा मामले में दो साल की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि से समाज में शांति बनाए रखने की अपेक्षा होती है। ऐसे में उनकी कथित भूमिका को गंभीरता से क्यों लिया गया और बचाव पक्ष की दलीलों पर अदालत ने क्या रुख अपनाया, आइए पूरे मामले को समझते हैं।
दो साल की कैद और 10 हजार रुपये का जुर्माना
दिल्ली की अदालत ने 16 अक्टूबर 2026 को आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में दो साल की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। अदालत ने उन्हें दंगा करने और उसमें मदद करने से संबंधित अपराध में दोषी ठहराया था। यह मामला दयालपुर इलाके में हुई हिंसा से जुड़ा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने कड़कड़डूमा अदालत में सजा सुनाते हुए ताहिर हुसैन की भूमिका और उस समय उनके जनप्रतिनिधि होने के तथ्य को महत्वपूर्ण माना।
Tahir Hussain: जनप्रतिनिधि होने के कारण जिम्मेदारी ज्यादा
अदालत के अनुसार, वर्ष 2020 में ताहिर हुसैन निर्वाचित जनप्रतिनिधि थे। ऐसे व्यक्ति के शब्दों और कार्यों का लोगों पर प्रभाव पड़ सकता है। सांप्रदायिक तनाव के माहौल में उनसे शांति और सद्भाव बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा थी। अदालत ने माना कि उनकी भूमिका को सामान्य आरोपी की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उनके पद के साथ लोगों को प्रभावित करने की क्षमता और शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी भी जुड़ी थी। इसी पहलू को सजा तय करते समय गंभीर परिस्थिति माना गया।
मकान की छत से पत्थरबाजी का मामला
इस मामले में अदालत ने माना कि ताहिर हुसैन ने भीड़ को अपने मकान की छत का इस्तेमाल लोगों और आसपास की संपत्तियों पर पत्थर फेंकने के लिए करने दिया। अभियोजन पक्ष ने उनकी भूमिका को हिंसा में मदद करने के रूप में पेश किया। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 147 और धारा 109 के तहत उन्हें दोषी ठहराया। इसी मामले में 12 अन्य आरोपियों को बरी किया गया था। यह फैसला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई का हिस्सा है।
Tahir Hussain: बचाव पक्ष की दलील और अलग मामला
ताहिर हुसैन के बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि वह भीड़ का नेतृत्व नहीं कर रहे थे और उनके मकान पर भीड़ ने जबरन कब्जा कर लिया था। अदालत ने इन दलीलों को सजा कम करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। यह दंगा मामले में उनकी दूसरी दोषसिद्धि है। इससे पहले जुलाई 2026 में अंकित शर्मा हत्याकांड से जुड़े अलग मामले में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। दोनों मामले अलग हैं और उनके आरोप तथा न्यायिक निष्कर्षों को अलग-अलग समझना जरूरी है।








