Supreme Court: भारत में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की न्यूनतम उम्र तय करने और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सख्त नियम बनाने पर बहस तेज हो गई है। 16 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर के एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल की याचिका पर केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगा। याचिका में बच्चों को साइबर बुलिंग, यौन शोषण, अनुचित सामग्री और सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बचाने के लिए कानूनी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट को लेकर एक अन्य याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है।
क्या सरकार बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की उम्र तय कर सकती है?
केंद्र सरकार कानून और लागू नियमों के दायरे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए उम्र संबंधी शर्तें और बच्चों की सुरक्षा के प्रावधान बना सकती है। इसके लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन या नए वैधानिक नियमों की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, भारत में 18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लागू कोई सामान्य, देशव्यापी प्रतिबंध घोषित नहीं किया गया है। उम्र की सीमा तय करना, अकाउंट बनाने पर रोक लगाना और माता-पिता की सहमति अनिवार्य करना अलग-अलग नियामक विकल्प हैं।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ और याचिका किसने दाखिल की?
16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इंदौर स्थित एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल और उसके निदेशक की जनहित याचिका पर केंद्र सरकार तथा संबंधित संस्थाओं को नोटिस जारी किए। याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए व्यापक और प्रभावी नियामक ढांचा बनाने की मांग की गई है। अदालत ने मामले को बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट से जुड़ी पहले से लंबित याचिका के साथ जोड़ते हुए अगली सुनवाई 7 दिसंबर 2026 के लिए निर्धारित की। इस स्तर पर अदालत ने देशभर में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का अंतिम आदेश नहीं दिया है।
नाबालिगों के अकाउंट पर पहले क्या कह चुका है सुप्रीम कोर्ट?
सितंबर 2026 में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया अकाउंट बनाने और चलाने पर सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई थी। अदालत ने केंद्र सरकार से मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत कदम उठाने पर विचार करने को कहा। सुनवाई के दौरान 18 वर्ष की उम्र और नाबालिगों की अनुबंध करने की क्षमता से जुड़े कानूनी सवाल भी उठे। यह कार्यवाही बच्चों के अकाउंट पर लागू होने वाले नियमों की समीक्षा से संबंधित है; इसे अपने आप में देशव्यापी प्रतिबंध लागू होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
Supreme Court: मौजूदा कानून बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर क्या कहता है?
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act) में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है। कानून के तहत बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को प्रोसेस करने के लिए सामान्यतः माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सत्यापन योग्य सहमति आवश्यक है, हालांकि लागू नियमों में निर्धारित अपवाद भी हो सकते हैं। यह प्रावधान अपने आप में सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता। वहीं, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 11 अनुबंध करने की कानूनी पात्रता से संबंधित है। नाबालिगों की अनुबंध क्षमता और सोशल मीडिया अकाउंट के नियमों के बीच संबंध ही मौजूदा कानूनी बहस का प्रमुख हिस्सा है।
Supreme Court: आगे क्या होगा और बच्चों के लिए कौन-से नियम बन सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों में उम्र की पुष्टि, माता-पिता की सहमति, अकाउंट बनाने की पात्रता और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी जैसे मुद्दों पर विचार हो सकता है। इंदौर के स्कूल की याचिका में बच्चों की उम्र के आधार पर सोशल मीडिया तक पहुंच सीमित करने और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। अब संबंधित पक्षों के जवाब और आगे की सुनवाई के बाद मामले में अगली कानूनी कार्रवाई स्पष्ट होगी। फिलहाल, 7 दिसंबर 2026 की सुनवाई महत्वपूर्ण है। जब तक सक्षम प्राधिकारी कोई लागू नियम या अदालत कोई बाध्यकारी आदेश जारी नहीं करती, तब तक प्रस्तावित प्रतिबंधों को लागू कानून नहीं माना जा सकता।
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